जलगांव/मुंबई: कहते हैं कि अगर इरादे मजबूत हों, तो अभावों के बीच भी रास्ते निकल ही आते हैं। महाराष्ट्र के जलगांव जिले के एक बेहद छोटे से गांव 'नागझीरी' के रहने वाले 26 वर्षीय शंकर अरुण भिल ने इस कहावत को सच कर दिखाया है। एक ऐसे समुदाय से जहां शिक्षा का स्तर न के बराबर है और परिवार दिहाड़ी मजदूरी पर निर्भर है, वहां से निकलकर शंकर अब अमेरिका की प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटी में पीएचडी करने जा रहे हैं।
बीबीसी की एक विशेष रिपोर्ट के अनुसार, शंकर का चयन अमेरिका की 'यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया, सैन डिएगो' (University of California San Diego) में हुआ है, जहां वे एथेनिक स्टडीज (Ethnic Studies) में डॉक्टरेट करेंगे।
शंकर की यह उपलब्धि इसलिए भी खास है क्योंकि उन्हें यूनिवर्सिटी की तरफ से भारी-भरकम स्कॉलरशिप मिली है। बीबीसी से बात करते हुए शंकर बताते हैं, "मेरी यूनिवर्सिटी ने मुझे 9 महीने के लिए 71,000 डॉलर की फंडिंग दी है। भारतीय करेंसी में यह करीब 70 से 75 लाख रुपये बैठती है।"
शंकर के मुताबिक, पहले दो साल उनका कोर्स वर्क चलेगा, जिसके बाद एग्जाम और फिर रिसर्च का काम शुरू होगा। पहले 9 महीनों की फेलोशिप के बाद, दूसरे साल से उन्हें यूनिवर्सिटी में काम (Assistantship) करना होगा।
शंकर का सफर कांटों भरा रहा है। उनका गांव नागझीरी इतना छोटा है कि वहां मुश्किल से 20-25 घर हैं और आबादी 100 लोगों के करीब है। वहां के ज्यादातर लोग ईंट-भट्टों या गन्ने के खेतों में दिहाड़ी या बंधुआ मजदूरी करते हैं।
जब शंकर 11वीं कक्षा में थे, तब उनके पिता का निधन हो गया था। शंकर अपनी सफलता का पूरा श्रेय अपनी मां, सिंधुबाई भिल को देते हैं। सिंधुबाई ने बताया कि हालात चाहे कितने भी खराब रहे हों, उन्होंने बच्चों की पढ़ाई नहीं रोकी। उस दौर में वह रोज मात्र 25 रुपये कमाती थीं। आज बेटे की कामयाबी पर वह खुश भी हैं और भावुक भी, क्योंकि बेटा उनसे बहुत दूर जा रहा है।
शंकर ने अपनी रिसर्च के लिए एक ऐसा विषय चुना है जो उनके अपने जीवन और समुदाय के दर्द से जुड़ा है। वे इस बात पर रिसर्च करेंगे कि आखिर "आदिवासियों की जमीन गैर-आदिवासियों के हाथों में कैसे चली गई?"
शंकर बीबीसी को बताते हैं, "हमारे भील समुदाय की जमीन बहुत छोटी-छोटी वजहों से चली गई। कभी 1 रुपये के लिए, कभी 1000 रुपये के कर्ज पर, तो कभी 10,000 रुपये के लिए। मेरी दादी और मेरी मां की जमीन भी इसी तरह छिन गई। मैं समझना चाहता हूं कि यह प्रक्रिया क्या थी? क्या इसमें सरकार की भी कोई भूमिका थी?"
शंकर ने अपनी बातचीत में समाज की उस सोच पर भी प्रहार किया जो आदिवासी छात्रों की सफलता को केवल 'आरक्षण' से जोड़ती है। शंकर ने स्पष्ट किया कि, उन्होंने मास्टर्स अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी (बेंगलुरु) से किया, जो एक निजी संस्थान है और वहां आरक्षण नहीं है। अब वे अमेरिका जा रहे हैं, वहां भी कोई आरक्षण नहीं है।
उनका कहना है कि उनकी सफलता उनकी मेहनत का नतीजा है, न कि किसी कोटे का। उन्होंने 'बहुजन इकोनॉमिक्स' ग्रुप के मेंटरशिप प्रोग्राम की भी सराहना की, जिसने उन्हें विदेश में पढ़ने के लिए गाइड किया।
शंकर ने अपने समुदाय के युवाओं को एक ही मूलमंत्र दिया— शिक्षा। उन्होंने कहा, "हमारे पास न तो पारिवारिक पूंजी है, न मजबूत सामाजिक नेटवर्क और न ही व्यापार खड़ा करने के संसाधन। हमारे लिए आगे बढ़ने का एकमात्र रास्ता सिर्फ और सिर्फ 'एजुकेशन' है।"
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