हाईकोर्ट के आदेश के बावजूद की गिरफ्तारी, अब यूपी सरकार देगी 5 लाख का हर्जाना, थानेदार पर भी गिरेगी गाज

इलाहाबाद हाईकोर्ट का यूपी पुलिस की मनमानी पर कड़ा प्रहार, गिरफ्तारी पर रोक के बावजूद युवक को जेल भेजने पर सरकार को 5 लाख रुपये हर्जाना देने का निर्देश।
इलाहाबाद हाईकोर्ट
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प्रयागराज: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश पुलिस की एक बड़ी लापरवाही और मनमानी पर सख्त रुख अपनाया है। अदालत ने यूपी सरकार को निर्देश दिया है कि वह एक ऐसे व्यक्ति को पांच लाख रुपये का मुआवजा दे, जिसे गिरफ्तारी पर रोक के बावजूद पुलिस ने अवैध रूप से हिरासत में रखा था।

जस्टिस सिद्धार्थ और जस्टिस विनय कुमार द्विवेदी की पीठ ने इस मामले की सुनवाई की। अदालत ने इस स्थिति पर गहरी नाराजगी जताते हुए कहा कि यह दुर्भाग्यपूर्ण चलन अब एक नियम बनता जा रहा है।

इसके साथ ही पीठ ने संबंधित एसएचओ के खिलाफ आधिकारिक कर्तव्य में लापरवाही बरतने, अदालत के आदेश का उल्लंघन करने और घोर अनुशासनहीनता के आरोप में अनुशासनात्मक कार्रवाई का आदेश दिया है।

यह कड़ा आदेश आरोपी अनिल सोनी द्वारा दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण (हेवियस कॉर्पस) याचिका पर पारित किया गया। अपनी याचिका में सोनी ने बताया था कि उत्तर प्रदेश के सिद्धार्थनगर में एक महिला ने उनके खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 69 (छल-कपट से यौन संबंध बनाना) और एससी/एसटी एक्ट के तहत एफआईआर दर्ज कराई थी। इस महिला के साथ उनका पिछले दो साल से प्रेम प्रसंग चल रहा था।

इस एफआईआर को चुनौती देते हुए अनिल सोनी ने पहले भी हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। एक अप्रैल को हाईकोर्ट की एक अन्य पीठ ने इस मामले में सुनवाई करते हुए उनकी गिरफ्तारी पर स्पष्ट रूप से रोक लगाने का अंतरिम आदेश पारित किया था।

गिरफ्तारी पर रोक का यह आदेश हाईकोर्ट की आधिकारिक वेबसाइट पर अपलोड कर दिया गया था, लेकिन इसके बावजूद संबंधित एसएचओ ने सोनी को गिरफ्तार कर लिया। पीड़ित ने बताया कि गिरफ्तारी वाले दिन उनके भाई ने एसएचओ को अंतरिम आदेश की जानकारी देने के लिए एक नोटरीकृत हलफनामा भी तैयार किया था।

यहां तक कि उनके वकील ने सीयूजी (CUG) मोबाइल नंबर पर एसएचओ से संपर्क किया था, फिर भी मनमानी करते हुए उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया।

अदालत ने सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की सफाई को सिरे से खारिज कर दिया। पीठ ने इस बात पर जोर दिया कि गिरफ्तारी पर रोक का अंतरिम आदेश सरकारी वकील और शिकायतकर्ता के वकील की मौजूदगी में पारित किया गया था। इसलिए, सभी संबंधित पक्ष इस आदेश से पूरी तरह वाकिफ थे।

पीठ ने इस बात को भी बेहद गंभीरता से लिया कि वर्तमान याचिका दायर होने और जवाब मांगे जाने के बाद भी याचिकाकर्ता को जेल से रिहा नहीं किया गया।

अदालत ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि या तो सरकारी वकील पुलिस अधिकारियों को अदालत के आदेशों की सूचना नहीं देते हैं, या फिर पुलिस अधिकारी अदालत के आदेशों के प्रति असम्मानजनक रवैया रखते हुए दुर्भावनापूर्ण तरीके से काम करते हैं।

इस मामले की अगली सुनवाई 13 जुलाई तय की गई है। अदालत ने 29 मई को दिए गए अपने आदेश में सिद्धार्थनगर के पुलिस अधीक्षक (एसपी) को निर्देश दिया है कि वह याचिकाकर्ता को मुआवजे के भुगतान और एसएचओ के खिलाफ शुरू की गई अनुशासनात्मक कार्रवाई की जानकारी देते हुए एक अनुपालन हलफनामा दाखिल करें।

अदालत ने सख्त चेतावनी दी है कि ऐसा न करने की स्थिति में सिद्धार्थनगर के एसपी को हाईकोर्ट में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होना पड़ेगा।

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