वाराणसी कस्टोडियल डेथ मामला: 29 साल बाद मिला न्याय, झूठी कहानी गढ़ने वाले दरोगा और डॉक्टर समेत तीन को जेल

वाराणसी में 29 साल पहले हुई पुलिस हिरासत में मौत के मामले में न्यायालय का फैसला आया है, जिसमें फर्जी कहानी रचने वाले डॉक्टर और पुलिसकर्मियों को जेल की सजा सुनाई गई है।
Varanasi custodial death
वाराणसी में 29 साल पुराने कस्टडी डेथ मामले में ऐतिहासिक फैसला। फर्जी कहानी गढ़ने वाले दरोगा और डॉक्टर को अदालत ने सुनाई कड़ी सजा।(Ai Image)
Published on

उत्तर प्रदेश: वाराणसी की एक अदालत ने 29 साल पुराने एक पुलिस कस्टडी डेथ (हिरासत में मौत) के मामले में अपना ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। सोमवार को कोर्ट ने सुंदरपुर पुलिस चौकी के तत्कालीन प्रभारी, मामले के विवेचक और पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टर को इस जघन्य अपराध के लिए दोषी ठहराते हुए सजा सुनाई है।

सीबी-सीआईडी के वरिष्ठ अभियोजन अधिकारी गंगा शरण ने इस फैसले की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश/विशेष न्यायाधीश (भ्रष्टाचार निवारण) अमित कुमार तिवारी की अदालत ने यह सजा मुकर्रर की है।

अदालत ने फर्जी पोस्टमार्टम रिपोर्ट बनाने वाले 70 वर्षीय डॉ. केके जैन को पांच साल की कैद और 40,000 रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई है। वहीं, 70 वर्षीय सेवानिवृत्त सब-इंस्पेक्टर नरेंद्र प्रताप सिंह को 10 साल की जेल और 31,000 रुपये का जुर्माना तथा 85 वर्षीय विवेचक राधेश्याम सिंह को छह महीने की सजा और 1,000 रुपये का जुर्माना लगाया गया है।

न्यायालय ने अपने आदेश में यह भी स्पष्ट किया है कि दोषियों द्वारा जमा की जाने वाली जुर्माने की कुल राशि का 50 प्रतिशत हिस्सा मृतक के परिवार को बतौर मुआवजा दिया जाएगा।

यह पूरा मामला 5 फरवरी 1997 का है। जनसा थाना क्षेत्र के बखारिया गांव के रहने वाले 42 वर्षीय राजेंद्र प्रसाद सिंह अपने बेटे की दवा लेने के लिए सिटी बस से ककरमत्ता से सुंदरपुरा जा रहे थे। इसी यात्रा के दौरान बस में सीट को लेकर उनका एक सहयात्री से विवाद हो गया था।

अभियोजन पक्ष के अनुसार, सुंदरपुर पुलिस चौकी के तत्कालीन प्रभारी ने राजेंद्र को साथी यात्री दयाराम की जेब से 100 रुपये चुराने के झूठे आरोप में हिरासत में ले लिया। आरोप है कि उसी शाम पुलिस चौकी की बैरक में बेरहमी से की गई प्रताड़ना के कारण राजेंद्र की मौत हो गई।

अपनी करतूत छिपाने के लिए तत्कालीन चौकी प्रभारी ने मृतक राजेंद्र के खिलाफ ही लंका थाने में चोरी का मुकदमा दर्ज करा दिया। इस मामले की जांच राधेश्याम को सौंपी गई, जिसने अपनी मनगढ़ंत रिपोर्ट में यह साबित करने की कोशिश की कि राजेंद्र ने आत्महत्या की है।

पुलिस ने दावा किया कि राजेंद्र ने सीलिंग फैन (छत के पंखे) से लटककर फांसी लगा ली है। कबीरचौरा स्थित एसएसपीजी मंडलीय अस्पताल में तैनात डॉ. जैन की देखरेख में शव का पोस्टमार्टम किया गया। डॉ. जैन ने अपनी रिपोर्ट में मौत का कारण फांसी की वजह से दम घुटना बताया, लेकिन उन्होंने शव की उस स्थिति का कोई जिक्र नहीं किया जो फांसी लगाने पर स्वाभाविक रूप से होती है।

डॉक्टर ने गले पर मिले निशानों का कोई माप भी दर्ज नहीं किया। इसके बाद हद तो तब हो गई जब पुलिस ने मृतक के परिजनों को बिना कोई सूचना दिए उसी दिन हरिश्चंद्र घाट पर शव का आनन-फानन में अंतिम संस्कार कर दिया।

इन झूठी रिपोर्टों और वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के ढुलमुल रवैये से निराश होकर राजेंद्र की पत्नी शशीमा देवी ने 11 फरवरी 1997 को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) का दरवाजा खटखटाया। एनएचआरसी ने मामले की गंभीरता को समझते हुए इसका संज्ञान लिया और जांच सीबी-सीआईडी को सौंप दी।

सीबी-सीआईडी की जांच में पुलिस की कहानी का सबसे बड़ा झूठ सामने आया। जांच टीम ने पाया कि पुलिस चौकी की जिस बैरक में राजेंद्र के फांसी लगाने का दावा किया गया था, वहां कोई सीलिंग फैन था ही नहीं।

अपनी गहन जांच पूरी करने के बाद सीबी-सीआईडी के इंस्पेक्टर श्रीकांत पांडेय ने 15 अप्रैल 1998 को लंका थाने में एक अर्जी दी। इसके बाद 22 अप्रैल को तत्कालीन लंका थानाध्यक्ष हसन अब्बास समेत आठ लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया।

लंबी तफ्तीश के बाद 14 अक्टूबर 2004 और फिर 2011 में कुल 11 लोगों के खिलाफ कोर्ट में चार्जशीट दाखिल की गई। इस बहुचर्चित मामले की कानूनी सुनवाई 7 दिसंबर 2005 को शुरू हुई, जिसमें मृतक की पत्नी सहित 12 गवाहों से अदालत में पूछताछ की गई।

इन 11 आरोपियों में से दो तत्कालीन अपर नगर मजिस्ट्रेट अवध मणि त्रिपाठी और कवींद्र नारायण सिंह को अदालत ने आरोप तय करने के स्तर पर ही बरी कर दिया। वहीं, इंस्पेक्टर हसन अब्बास और कांस्टेबल शुभ नारायण सिंह, मंगरू पांडेय तथा चंद्रमा चौधरी की लंबी कानूनी प्रक्रिया के दौरान मौत हो गई।

इसके बाद डॉ. जैन, राधेश्याम, नरेंद्र और कांस्टेबल श्रीनिवास शुक्ला व अनिरुद्ध यादव के खिलाफ मुकदमा चलता रहा। अंततः अदालत ने सबूतों के अभाव में श्रीनिवास और अनिरुद्ध को बरी कर दिया, जबकि बाकी तीन को उनके अपराध की सख्त सजा दी गई।

Varanasi custodial death
आदिवासी डीलिस्टिंग विवाद: क्या धर्म बदलने से छिन जाएगा एसटी का अधिकार?
Varanasi custodial death
"कब तक डरेंगे, देश किसी एक पार्टी का नहीं"-CJP फाउंडर अभिजीत दीपके 6 जून को भारत लौटेंगे
Varanasi custodial death
बोकारो का कोयला विवाद बना जानलेवा: गर्भवती दलित महिला की दर्दनाक मौत, लीपापोती के आरोपों के बीच 6 गिरफ्तार

द मूकनायक की प्रीमियम और चुनिंदा खबरें अब द मूकनायक के न्यूज़ एप्प पर पढ़ें। Google Play Store से न्यूज़ एप्प इंस्टाल करने के लिए यहां क्लिक करें.

द मूकनायक की मदद करें

‘द मूकनायक’ जनवादी पत्रकारिता करता है. यह संविधान, लोकतंत्र और सामाजिक न्याय पर चलने वाला मीडिया समूह है. अगर आप भी चाहते हैं कि ‘द मूकनायक’ हमेशा हाशिए पर खड़े लोगों की आवाज़ बुलंद करता रहे, बेजुबानों की पीड़ा दिखाते रहे तो सपोर्ट करें.

यहां सपोर्ट करें
The Mooknayak - आवाज़ आपकी
www.themooknayak.com