
नई दिल्ली: झारखंड में 16 मई को शुरू हुई जनगणना प्रक्रिया के साथ ही एक नई बहस ने जन्म ले लिया है। राज्य के आदिवासी समुदायों के बीच एक अपील तेजी से फैली कि वे धर्म के कॉलम में खुद को 'हिंदू' न लिखें। इसके बजाय, उनसे अपनी पारंपरिक आस्था 'सरना' या फिर 'अन्य' का विकल्प चुनने को कहा गया।
इसके ठीक एक हफ्ते बाद 24 मई को नई दिल्ली में एक बड़ा आदिवासी सम्मेलन आयोजित हुआ। इस संघ-समर्थित कार्यक्रम में एक जोरदार मांग उठी कि जो आदिवासी ईसाई या इस्लाम धर्म अपना चुके हैं, उन्हें अनुसूचित जनजाति (एसटी) की सूची से बाहर यानी 'डीलिस्ट' कर दिया जाना चाहिए।
इन दो हालिया घटनाओं ने आदिवासियों की धार्मिक पहचान से जुड़े एक पुराने विवाद को फिर से हवा दे दी है। यह मुद्दा केवल झारखंड तक सीमित नहीं है, बल्कि देश के अन्य हिस्सों में भी इसकी गूंज सुनाई दे रही है। 'डीलिस्टिंग' का सीधा मतलब यह है कि धर्म परिवर्तन कर चुके आदिवासियों को मिलने वाले एसटी आरक्षण और फायदों को खत्म कर दिया जाए। इस मांग को उठाने वालों में मुख्य रूप से आदिवासी हिंदू शामिल हैं।
दूसरी तरफ सरना समुदाय के आदिवासियों का तर्क इससे बिल्कुल अलग है। यह समुदाय खुद को न तो हिंदू मानता है और न ही ईसाई। उनका कहना है कि अगर धर्म को ही एसटी का दर्जा छीनने का आधार बनाया जा रहा है, तो यह नियम हिंदू धर्म अपनाने वाले आदिवासियों पर भी समान रूप से लागू होना चाहिए।
इस पूरी बहस ने अब संवैधानिक अधिकारों और आरक्षण की बुनियादी अवधारणाओं पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यह विवाद ऐसे समय में गहराया है जब हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम टिप्पणी की थी। अदालत ने साफ किया था कि ईसाई या इस्लाम धर्म अपनाने वाले दलितों को अनुच्छेद 341 के तहत अनुसूचित जाति (एससी) का लाभ नहीं मिल सकता।
हालांकि, एसटी समुदाय से जुड़े अनुच्छेद 342 में धर्म का कोई स्पष्ट जिक्र नहीं है। यही संवैधानिक अंतर अब आदिवासी पहचान और धर्मांतरण की इस पूरी बहस के केंद्र में आ गया है।
नई दिल्ली में 24 मई को हुए कार्यक्रम का आयोजन अखिल भारतीय वनवासी कल्याण आश्रम से जुड़े जनजातीय सुरक्षा मंच (जेएसएम) ने किया था। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने भी इस सम्मेलन में हिस्सा लिया था, जहां पूर्वोत्तर के कई आदिवासी समूहों ने डीलिस्टिंग की मांग का जोरदार समर्थन किया।
इसी कार्यक्रम के दौरान अमित शाह ने 'वनवासी' शब्द का इस्तेमाल किया, जिस पर झारखंड में भारी विरोध प्रदर्शन हुए। प्रदर्शनकारियों का तर्क था कि 'वनवासी' (जंगल में रहने वाले) शब्द आदिवासी पहचान को केवल भूगोल तक सीमित कर देता है। इसके विपरीत 'आदिवासी' (मूल निवासी) शब्द उनके भूमि और ऐतिहासिक अधिकारों का प्रतिनिधित्व करता है।
डीलिस्टिंग की इस मांग के विरोध में छत्तीसगढ़ के जशपुर जिले में भी एक विशाल रैली निकाली गई। इसका आयोजन सरना समुदाय और क्रिश्चियन आदिवासी महासभा ने मिलकर किया था। झारखंड और छत्तीसगढ़ के कई आदिवासी कार्यकर्ताओं ने ईसाई आदिवासियों के प्रति अपना खुला समर्थन जताया और खुद को आरएसएस के करीबी माने जाने वाले संगठनों से पूरी तरह अलग कर लिया।
डीलिस्टिंग की इस पूरी अवधारणा की जड़ें एक प्रमुख आदिवासी नेता और इंदिरा गांधी कैबिनेट में पूर्व केंद्रीय मंत्री रहे बाबा कार्तिक उरांव से जुड़ी हैं। साल 1962 में कार्तिक उरांव ने एसटी के लिए आरक्षित लोहरदगा सीट से अपना पहला लोकसभा चुनाव लड़ा और हार गए।
चुनाव हारने के बाद उन्होंने पटना उच्च न्यायालय में यह तर्क देते हुए एक याचिका दायर की कि उनके प्रतिद्वंद्वी ने ईसाई धर्म अपना लिया है। उनका दावा था कि वह व्यक्ति अब उरांव समुदाय का आदिवासी नहीं रहा और उसे अयोग्य घोषित किया जाना चाहिए।
पटना हाईकोर्ट ने कार्तिक उरांव की दलील को खारिज करते हुए कहा कि 'उरांव' मुख्य रूप से एक जनजाति और जातीय पहचान है, महज कोई धर्म नहीं। अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि ईसाई उरांव अभी भी अपने कबीले की व्यवस्था को मानते हैं और वे 'पहले उरांव और बाद में ईसाई' हैं। इसी फैसले का हवाला देते हुए डीलिस्टिंग के विरोधी आज भी तर्क देते हैं कि एसटी पहचान तय करने में धर्म की कोई भूमिका नहीं होनी चाहिए।
हालांकि यह मामला यहीं शांत नहीं हुआ। अगस्त 1967 में, जब कार्तिक उरांव केंद्र सरकार में मंत्री थे, तब लोकसभा में जातियों और जनजातियों की सूची में बदलाव के लिए एक संशोधन विधेयक पेश किया गया। मार्च 1968 में इसे संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) के पास भेजा गया।
समिति ने 17 नवंबर 1969 को अपनी रिपोर्ट में ईसाई और मुस्लिम धर्म अपनाने वाले आदिवासियों को एसटी श्रेणी से बाहर करने का प्रस्ताव रखा। लेकिन सरकार ने इस पर अपनी असहमति जताई और संसद ने इसे कभी पारित नहीं किया।
आजकल आरएसएस और भाजपा से जुड़े कई आदिवासी समूह कार्तिक उरांव का हवाला देकर यह दावा करते हैं कि आदिवासी मूल रूप से हिंदू हैं। उनका कहना है कि ईसाई बनने के बाद उन्हें एसटी के संवैधानिक अधिकार नहीं मिलने चाहिए। लेकिन, खुद कार्तिक उरांव के विचार इससे काफी अलग थे।
अपनी किताब 'बीस वर्ष की काली रात' में उन्होंने आदिवासी आस्था को 'आदि धर्म' बताया है, जो हिंदू धर्म से भी पहले का है। उन्होंने सवाल उठाया था कि आदिवासियों को हिंदू समाज के किस वर्ण (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र) में रखा जाएगा। हालांकि, यह सच है कि वह धर्मांतरित ईसाइयों को एसटी का लाभ देने के खिलाफ जरूर थे।
कार्तिक उरांव की बेटी और कांग्रेस नेत्री गीतश्री उरांव का मानना है कि उनके पिता की विरासत और लेखनी को आदिवासी समुदायों को गुमराह करने के लिए तोड़ा-मरोड़ा जा रहा है। झारखंड की पूर्व शिक्षा मंत्री और अखिल भारतीय आदिवासी विकास परिषद की राष्ट्रीय महिला अध्यक्ष गीतश्री उरांव ने एक मीडिया बातचीत में बताया कि उनके पिता कभी ईसाई समुदाय से नफरत नहीं करते थे।
उन्होंने स्पष्ट किया कि उनके पिता एक धर्मनिरपेक्ष इंसान थे जो संसाधनों के समान वितरण में विश्वास रखते थे। उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि आरएसएस से जुड़े संगठनों को आदिवासियों के हिंदू रीति-रिवाजों को अपनाने पर कोई आपत्ति नहीं होती, लेकिन वे उनके ईसाई धर्म अपनाने का कड़ा विरोध करते हैं।
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