
लखनऊ: जेल या पुलिस हिरासत में होने वाली मौतों (कस्टोडियल डेथ) के मामलों को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने एक बेहद अहम आदेश पारित किया है। अदालत ने शुक्रवार को उत्तर प्रदेश सरकार को निर्देश दिया है कि वह ऐसे मामलों में मृतक के परिजनों को दिए जाने वाले मुआवजे के लिए एक स्पष्ट दिशा-निर्देश (गाइडलाइन) तैयार करे।
कोर्ट ने सरकार को सुझाव दिया है कि यह मुआवजा मोटर वाहन दुर्घटना दावों की तर्ज पर तय किया जा सकता है, जिसमें मृतक की उम्र, उसकी आय और उस पर आश्रित लोगों की संख्या को आधार बनाया जाता है।
'मानवीय गरिमा का खुला उल्लंघन है कस्टोडियल टॉर्चर'
इस मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस शेखर बी. सराफ और जस्टिस मंजीव शुक्ला की खंडपीठ ने सख्त टिप्पणी की। बेंच ने कहा, "हिरासत में दी जाने वाली यातनाएं मानवीय गरिमा का खुला उल्लंघन हैं और यह इंसान के आत्मसम्मान को पूरी तरह नष्ट कर देती हैं। जांच प्रणाली से इस तरह के टॉर्चर को खत्म करने की तमाम सिफारिशों के बावजूद, पुलिस कस्टडी और जेलों में यातनाओं और मौतों के मामले लगातार सामने आ रहे हैं।"
पीलीभीत के युवक की मौत: पीड़ित परिवार को 10 लाख का मुआवजा
अपनी इस ऐतिहासिक टिप्पणी के साथ ही हाईकोर्ट ने यूपी सरकार को निर्देश दिया कि वह जेल हिरासत में जान गंवाने वाले एक युवक के परिजनों को 10 लाख रुपये का मुआवजा अदा करे। अदालत ने यह फैसला पीलीभीत निवासी प्रेमा देवी की ओर से दायर एक रिट याचिका को स्वीकार करते हुए सुनाया। प्रेमा देवी के बेटे की फरवरी 2024 में हिरासत के दौरान मौत हो गई थी।
क्या है पूरा मामला?
याचिकाकर्ता प्रेमा देवी के अनुसार, उनके बेटे पर साल 2016 में पीलीभीत की पूरनपुर पुलिस ने रेप और पॉक्सो (POCSO) एक्ट के तहत मामला दर्ज किया था। इस मामले में गिरफ्तारी के बाद वह 3 साल और 10 महीने तक जेल में बंद रहा। अंततः 12 फरवरी 2024 को उसे जमानत मिल गई।
हालांकि, जमानत मिलने के बाद अगली सुनवाई पर वह ट्रायल कोर्ट में पेश नहीं हो सका, जिसके कारण उसके खिलाफ वारंट जारी कर दिया गया और उसे दोबारा गिरफ्तार कर लिया गया। इसके कुछ ही दिन बाद, 20 फरवरी 2024 को जेल में उसकी मौत हो गई। इस घटना की एक न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा जांच की गई। जांच रिपोर्ट में दावा किया गया कि मृतक के शरीर पर चोट के कोई निशान नहीं थे और उसने आत्महत्या की है।
कोर्ट ने खारिज की आत्महत्या की दलील
हाईकोर्ट की बेंच ने मजिस्ट्रेट की इस जांच रिपोर्ट को मानने से साफ इनकार कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि युवक की मौत उस वक्त हुई जब वह राज्य के अधिकारियों की कस्टडी और नियंत्रण में था। जजों ने कहा, "रिकॉर्ड पर मौजूद सबूत बिना किसी संदेह के यह साबित करते हैं कि यह संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिले मौलिक अधिकारों का सीधा उल्लंघन है।"
अदालत ने अपने फैसले में यह भी जोड़ा, "कस्टोडियल हिंसा और मौतें कानून के शासन की मूल भावना पर सीधा प्रहार हैं। राज्य, जो कि अपनी हिरासत में मौजूद व्यक्तियों के जीवन और स्वतंत्रता का रक्षक है, उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए एक सख्त और अहस्तांतरणीय (Non-delegable) कर्तव्य से बंधा हुआ है।"
संसद में भी गूंज चुका है कस्टोडियल डेथ का मुद्दा
गौरतलब है कि पुलिस कस्टडी में मौतों के आंकड़े इससे पहले संसद में भी चिंता का विषय बन चुके हैं। 1 अगस्त 2023 को लोकसभा में सांसद थिरुमावलवन थोल द्वारा पूछे गए एक सवाल के लिखित जवाब में केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने आंकड़े पेश किए थे। इन आंकड़ों के मुताबिक, उत्तर प्रदेश में साल 2021-22 के दौरान 8 कस्टोडियल डेथ दर्ज की गईं थीं, जबकि साल 2022-23 में यह मामले बढ़कर 10 हो गए थे।
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