
प्रयागराज: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक बेहद अहम फैसला सुनाते हुए कहा है कि दो वयस्कों के बीच लंबे समय तक सहमति से बने शारीरिक संबंधों को सिर्फ इसलिए बलात्कार नहीं कहा जा सकता क्योंकि शादी का वादा पूरा नहीं हुआ। अदालत ने स्पष्ट किया कि जब विवाद मुख्य रूप से दीवानी और वित्तीय प्रकृति का हो, तो इसे रेप का मामला नहीं माना जा सकता। इसी के साथ हाईकोर्ट ने दो आपराधिक अपीलों को स्वीकार करते हुए आरोपी को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 376 (बलात्कार) और एससी/एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम के आरोपों से बरी कर दिया है।
जस्टिस संतोष राय की पीठ ने प्रयागराज के विशेष न्यायाधीश (एससी/एसटी एक्ट) के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें आरोपी सौरभ पाल सिंह की आरोपमुक्ति (डिस्चार्ज) अर्जी खारिज कर दी गई थी और उसके खिलाफ आरोप तय किए गए थे।
इस मामले में अक्टूबर 2020 में एक अनुसूचित जाति की महिला द्वारा एफआईआर दर्ज कराई गई थी, जो इलाहाबाद विश्वविद्यालय से पीएचडी कर रही थी। शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया था कि आरोपी ने उसके साथ करीबी संबंध बनाए, शादी का वादा किया और इस भरोसे पर लंबे समय तक उसके साथ शारीरिक संबंध स्थापित किए।
महिला का यह भी आरोप था कि आरोपी ने रेस्तरां का व्यवसाय शुरू करने के बहाने उसका एटीएम कार्ड, छात्रवृत्ति के पैसे, आभूषण और 15 लाख रुपये ले लिए। एफआईआर के मुताबिक, बिजनेस स्थापित होने के बाद आरोपी ने शादी से इनकार कर दिया और बातचीत बंद कर दी। इसके अलावा, आरोपी की पत्नी और परिवार के सदस्यों पर महिला को जातिसूचक गालियां देने और धमकाने का भी आरोप लगाया गया था।
शिकायतकर्ता के अनुसार, आरोपी ने उसे 5-5 लाख रुपये के दो चेक दिए थे, लेकिन दोनों बाउंस हो गए। मामले में चार्जशीट दाखिल होने के बाद, आरोपी ने ट्रायल कोर्ट में दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 227 के तहत आरोपमुक्त करने की अर्जी दाखिल की थी। जब इसे खारिज कर दिया गया, तो उसने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया और तर्क दिया कि रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री, भले ही पूरी तरह से सच मान ली जाए, कथित अपराधों को साबित नहीं करती है।
हाईकोर्ट ने एफआईआर, सीआरपीसी की धारा 161 और 164 के तहत दर्ज बयानों और अन्य सबूतों की जांच के बाद अभियोजन पक्ष के मामले में काफी विसंगतियां पाईं। अदालत ने गौर किया कि मजिस्ट्रेट के सामने धारा 164 के तहत दिए गए बयान में महिला ने खुद स्वीकार किया था कि उनके बीच कोई रोमांटिक रिश्ता नहीं था और उन्होंने शारीरिक संबंध इसलिए बनाए क्योंकि वे दोस्त या परिचित थे। वहीं, महिला के धारा 161 के तहत दिए गए पहले बयान में बताया गया था कि शारीरिक संबंध 2014 से ही मौजूद थे।
अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के 'दीपक गुलाटी बनाम स्टेट ऑफ हरियाणा (2013)', 'प्रमोद सूर्यभान पवार बनाम स्टेट ऑफ महाराष्ट्र (2019)' और 'येदला श्रीनिवास राव बनाम स्टेट ऑफ आंध्र प्रदेश (2006)' के फैसलों का हवाला दिया। कोर्ट ने दोहराया कि शादी के झूठे वादे के आधार पर बलात्कार का आरोप तभी टिक सकता है, जब यह साबित हो कि वादा शुरुआत से ही झूठा था और गलत नीयत से किया गया था।
पीठ ने टिप्पणी की कि एफआईआर और धारा 164 के बयान में शुरुआत से ही गलत नीयत से किए गए झूठे वादे का कोई जिक्र नहीं है। इसके अलावा, बलात्कार के कथित कृत्य की कोई विशिष्ट तारीख, समय या परिस्थिति भी नहीं बताई गई है। ऐसे में प्रथम दृष्टया आईपीसी की धारा 376 के आवश्यक तत्व स्थापित नहीं होते हैं।
अदालत ने यह भी माना कि एससी/एसटी अधिनियम के तहत अपराध केवल इसलिए नहीं बनता क्योंकि शिकायतकर्ता अनुसूचित जाति से है। अभियोजन पक्ष को यह साबित करना होता है कि कथित अपराध विशेष रूप से पीड़िता की जाति के कारण किया गया था। कोर्ट को मामले में जातिगत आधार पर अपराध करने की मंशा का कोई सबूत नहीं मिला।
6 जुलाई को दिए गए अपने फैसले में हाईकोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने आरोपमुक्ति अर्जी खारिज करते हुए बिना न्यायिक दिमाग लगाए यांत्रिक रूप से काम किया था और जांच के दौरान जुटाई गई सामग्री प्रथम दृष्टया मामला उजागर करने में पूरी तरह विफल रही है।
अदालत ने आरोपी की अपील स्वीकार करते हुए निष्कर्ष निकाला कि यह विवाद मुख्य रूप से नागरिक और वित्तीय लेन-देन का है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उपलब्ध सामग्री से शादी के झूठे वादे के आधार पर बलात्कार के आरोप प्रथम दृष्टया साबित नहीं होते हैं।
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