HC ने पेशी पर लाए जाने वाले कैदियों के भोजन खर्च पर उठाए सवाल: हलफनामा मांगा, जानिए क्या है मामला?

युगलपीठ ने कहा- जब जेल में भोजन नहीं दिया जाता तो भोजन भत्ते की व्यवस्था पर होनी चाहिए समीक्षा, पुलिसकर्मियों के दैनिक भत्ते से कैदियों का खाना खिलाना उचित नहीं
जबलपुर हाईकोर्ट
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भोपाल मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने अदालत में पेशी के लिए जेल से लाए जाने वाले कैदियों के भोजन की व्यवस्था को लेकर गंभीर चिंता जताई है। कोर्ट ने इस व्यवस्था में व्यावहारिक और प्रशासनिक खामियों की ओर संकेत करते हुए जेल विभाग से जवाब तलब किया है। हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि किसी कैदी को पेशी के लिए जेल से बाहर लाया जाता है और उस दौरान उसे जेल में भोजन उपलब्ध नहीं कराया जाता, तो उसके भोजन की अलग से व्यवस्था होना आवश्यक है। अदालत ने इस मामले को केवल एक बंदी तक सीमित न मानते हुए राज्यभर की व्यवस्था से जुड़ा महत्वपूर्ण प्रशासनिक मुद्दा माना है।

जेल महानिदेशक को हलफनामा दाखिल करने के निर्देश

यह मामला मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की जबलपुर स्थित युगलपीठ के समक्ष आया, जिसमें न्यायमूर्ति विवेक अग्रवाल और न्यायमूर्ति अवनींद्र कुमार सिंह ने सुनवाई की। अदालत ने जेल महानिदेशक (डीजी जेल) को निर्देश दिया है कि वह इस संबंध में विस्तृत हलफनामा प्रस्तुत करें। कोर्ट ने पूछा है कि वर्तमान में कैदियों को अदालत में पेशी के दौरान भोजन उपलब्ध कराने की क्या व्यवस्था है और यदि कोई अलग प्रावधान नहीं है तो इसे सुधारने के लिए क्या कदम उठाए जा सकते हैं। आदेश की प्रति आवश्यक कार्रवाई के लिए जेल महानिदेशक को भी भेजी गई है।

रीवा जेल के बंदी की अपील की सुनवाई के दौरान उठा मुद्दा

मामला दहेज हत्या के एक प्रकरण में दोषसिद्ध रीवा केंद्रीय जेल के एक बंदी की अपील से जुड़ा है। सुनवाई के दौरान आरोपी ने कानूनी सहायता की मांग की थी, जिसके बाद हाई कोर्ट ने अधिवक्ता रविशंकर पटेल को न्यायालय मित्र (एमिकस क्यूरी) नियुक्त किया। इसी दौरान सुनवाई के दौरान अदालत का ध्यान कैदियों के भोजन से जुड़े एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक पहलू की ओर गया, जिस पर कोर्ट ने तत्काल सवाल उठाए।

पुलिसकर्मियों ने बताया- अलग से भोजन भत्ता नहीं मिलता

सुनवाई के दौरान अदालत ने उन पुलिसकर्मियों से जानकारी ली जो बंदी को जेल से अदालत में पेशी के लिए लेकर आए थे। न्यायालय ने पूछा कि क्या कैदियों के भोजन के लिए उन्हें अलग से कोई राशि या डाइट अलाउंस दिया जाता है। इस पर पुलिसकर्मियों ने बताया कि ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है। उन्हें जो दैनिक भत्ता (डेली अलाउंस) मिलता है, उसी में से कैदी के भोजन का खर्च भी वहन करना पड़ता है। पुलिसकर्मियों के इस जवाब पर अदालत ने गंभीर चिंता व्यक्त की।

कोर्ट ने कहा- जेल में भोजन दर्ज नहीं होता तो राशि पुलिसकर्मियों को मिलनी चाहिए

युगलपीठ ने कहा कि जब कोई कैदी अदालत में पेशी के लिए जेल से बाहर रहता है, तब उस अवधि के दौरान जेल के रिकॉर्ड में उसके भोजन की प्रविष्टि नहीं होती। यानी उस समय जेल प्रशासन उसके भोजन पर कोई खर्च नहीं करता। ऐसे में यह उचित होगा कि उस अवधि का भोजन भत्ता संबंधित पुलिसकर्मियों को उपलब्ध कराया जाए, ताकि कैदी के भोजन की व्यवस्था बिना किसी अतिरिक्त आर्थिक बोझ के की जा सके। अदालत ने संकेत दिया कि वर्तमान व्यवस्था में सुधार की आवश्यकता है।

पूरे राज्य की व्यवस्था पर पड़ सकता है असर

हाई कोर्ट की इस टिप्पणी को राज्यभर की जेलों और पुलिस व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यदि अदालत के निर्देशों के बाद सरकार या जेल विभाग नई व्यवस्था लागू करता है, तो भविष्य में अदालतों में पेशी के लिए लाए जाने वाले हजारों कैदियों के भोजन की स्पष्ट और अलग व्यवस्था बनाई जा सकती है। इससे एक ओर पुलिसकर्मियों पर पड़ने वाला अतिरिक्त आर्थिक बोझ कम होगा, वहीं कैदियों को भी उनके अधिकार के अनुरूप भोजन उपलब्ध कराने की व्यवस्था अधिक पारदर्शी और जवाबदेह बन सकेगी।

हाई कोर्ट ने जेल महानिदेशक से विस्तृत हलफनामा मांगा है, जिसके आधार पर आगे की सुनवाई में यह तय किया जाएगा कि वर्तमान व्यवस्था में क्या बदलाव आवश्यक हैं। अदालत के इस हस्तक्षेप के बाद अब निगाहें जेल विभाग के जवाब और सरकार द्वारा उठाए जाने वाले संभावित कदमों पर टिकी हैं। यह मामला केवल एक बंदी की पेशी का नहीं, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया के दौरान कैदियों के बुनियादी अधिकारों और प्रशासनिक जवाबदेही से जुड़ा महत्वपूर्ण प्रश्न बन गया है।

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