
लखनऊ: इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने एक सरकारी स्कूल की कथित बदहाली पर रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकार के खिलाफ दर्ज FIR के मामले में महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए उसके खिलाफ आगे की कार्रवाई पर रोक लगा दी है। कोर्ट ने प्रथमदृष्टया माना कि पत्रकार ने सरकारी स्कूल की कमियों को उजागर किया था और अधिकारियों द्वारा FIR दर्ज करना ‘मैसेंजर को मारने’ (killing the messenger) जैसा प्रतीत होता है।
यह आदेश जस्टिस अब्दुल मुईन और जस्टिस प्रमोद कुमार श्रीवास्तव की पीठ ने 8 सितंबर को क्रिमिनल मिस रिट पेटिशन नंबर 8913/2026 में पारित किया। मामला लखनऊ के गोसाईंगंज थाना क्षेत्र स्थित पूर्व माध्यमिक विद्यालय, बेगरिया मऊ से जुड़ा है।
हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश के बेसिक शिक्षा विभाग के अपर मुख्य सचिव को व्यक्तिगत हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने विशेष रूप से यह बताने को कहा है कि पत्रकार की 20 अगस्त की रिपोर्ट के बाद स्कूल में कोई निर्माण, मरम्मत, बदलाव या अन्य सुधार किया गया है या नहीं।
याचिकाकर्ता अमित यादव एक पत्रकार है। उसने 20 अगस्त को स्कूल का दौरा किया था और वहां की स्थिति पर रिपोर्टिंग की थी। याचिका के मुताबिक, पत्रकार ने स्कूल के शौचालयों को खराब हालत में पाया था। स्कूल में विद्यार्थियों के लिए पीने के पानी की उपलब्धता को लेकर भी समस्या बताई गई थी। पत्रकार ने कुछ शिक्षकों के इंटरव्यू भी किए थे।
इसके चार दिन बाद, 24 अगस्त को गोसाईंगंज थाने में पत्रकार के खिलाफ केस क्राइम नंबर 0319/2026 दर्ज किया गया।
FIR में भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की धाराएं 223, 353 और 356 लगाई गई थीं।
FIR में आरोप लगाया गया था कि पत्रकार बिना अनुमति स्कूल परिसर में दाखिल हुआ, बच्चों की पढ़ाई में बाधा डाली और दो महिला शिक्षकों को स्कूल की स्थिति के बारे में बात करने के लिए मजबूर किया। FIR में यह भी आरोप था कि राजनीतिक पूर्वाग्रह के कारण स्कूल की रिपोर्टिंग की गई।
याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता वली नवाज खान और हर्षवर्धन केडिया ने कोर्ट में दलील दी कि FIR में लगाई गई धाराएं इस मामले में लागू नहीं होतीं।
धारा 356 को लेकर दलील दी गई कि यह आपराधिक मानहानि से संबंधित है। वकील ने सुप्रीम कोर्ट के सुब्रमनियम स्वामी बनाम भारत संघ फैसले का हवाला देते हुए कहा कि आपराधिक मानहानि के मामले में सीधे FIR दर्ज नहीं की जा सकती और संबंधित व्यक्ति को शिकायत के माध्यम से कार्यवाही शुरू करनी होती है।
धारा 353 को लेकर याचिकाकर्ता ने कहा कि इस धारा में ऐसा अपवाद मौजूद है जिसके तहत यदि किसी व्यक्ति के पास किसी बयान या रिपोर्ट को सही मानने के उचित आधार हों और वह उसे सद्भावना से प्रकाशित या प्रसारित करता है, तो अपराध नहीं बनता।
हाईकोर्ट ने याचिका के साथ दाखिल स्कूल की रंगीन तस्वीरों का उल्लेख करते हुए कहा कि तस्वीरों को प्रथमदृष्टया देखने पर स्कूल के शौचालयों और परिसर की हालत बेहद खराब दिखाई देती है।
कोर्ट ने कहा कि अधिकारियों को FIR दर्ज करने से पहले BNS की धारा 353 में दिए गए अपवाद पर विचार करना चाहिए था।
धारा 223 BNS के तहत किसी लोक सेवक द्वारा विधिवत जारी आदेश की अवज्ञा से संबंधित अपराध का प्रावधान है।
कोर्ट ने इस बिंदु पर विशेष ध्यान दिया कि सरकारी वकील ने अधिकारियों से मिले निर्देशों के आधार पर स्वीकार किया कि उनके पास ऐसा कोई आदेश मौजूद नहीं था, जिसके तहत स्कूल परिसर में पत्रकार या किसी अन्य व्यक्ति के प्रवेश पर रोक लगाई गई हो।
कोर्ट ने कहा कि ऐसी स्थिति में धारा 223 के तहत FIR दर्ज करने में प्रथमदृष्टया कानूनी गलती हुई है। अदालत ने यह भी कहा कि BNS की धारा 215 के अनुसार धारा 206 से 223 के तहत आने वाले अपराधों पर कोर्ट द्वारा संज्ञान लेने के लिए संबंधित लोक सेवक की लिखित शिकायत की आवश्यकता होती है।
हाईकोर्ट ने राईट टू एजुकेशन 2009 का भी उल्लेख किया। कोर्ट ने कहा कि इस कानून के तहत सरकारी स्कूलों में निर्धारित मानकों और सुविधाओं का प्रावधान है।
अदालत ने विशेष रूप से स्कूल के लिए सुरक्षित और पर्याप्त पेयजल, लड़के और लड़कियों के लिए अलग शौचालय, खेल का मैदान, भवन और अन्य निर्धारित सुविधाओं का उल्लेख किया।
कोर्ट ने कहा कि जब कानून के तहत सरकार पर इन सुविधाओं को उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी है और पत्रकार किसी स्कूल की कमियों को उजागर करता है, तो सरकार को उन कमियों को दूर करने के लिए कार्रवाई करनी चाहिए थी।
अदालत ने टिप्पणी की कि कमियों को दूर करने के बजाय इसे ‘अहं का मुद्दा’ बनाकर FIR दर्ज करना उचित नहीं था। हाईकोर्ट ने आदेश में कहा कि रिकॉर्ड के अनुसार याचिकाकर्ता एक मान्यता प्राप्त पत्रकार है और उसने राज्य सरकार के अधीन चल रहे एक शैक्षणिक संस्थान की कमियों को प्रथमदृष्टया उजागर किया है।
कोर्ट ने कहा कि उपलब्ध सामग्री को देखते हुए FIR पत्रकार द्वारा कमियों को उजागर करने के बाद की गई प्रतिशोधात्मक कार्रवाई प्रतीत होती है।
अदालत ने इसे प्रथमदृष्टया ‘killing the messenger’ यानी संदेश लाने वाले को ही निशाना बनाने जैसा बताया और कहा कि ऐसा कानून की नजर में स्वीकार्य नहीं है।
हाईकोर्ट ने कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में पत्रकारों को सत्ता से सवाल करने और सच सामने रखने की स्वतंत्रता होनी चाहिए तथा प्रतिशोध की कार्रवाई से इस स्वतंत्रता पर दबाव नहीं पड़ना चाहिए।
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के Abhishek Upadhyay बनाम State of U.P. मामले के 4 अक्टूबर 2024 के आदेश का भी उल्लेख किया। इस मामले में पत्रकार के खिलाफ FIR दर्ज होने के संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और पत्रकारिता की स्वतंत्रता के महत्व पर विचार किया था।
हाईकोर्ट ने Arnab Ranjan Goswami बनाम Union of India मामले में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी का भी उल्लेख किया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि पत्रकारिता की स्वतंत्रता संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत संरक्षित अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के केंद्र में है।
हाईकोर्ट ने इसी संदर्भ में कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में पत्रकारों को सत्ता से सवाल करने और सच सामने रखने की स्वतंत्रता होनी चाहिए तथा प्रतिशोध की कार्रवाई से इस स्वतंत्रता पर दबाव नहीं पड़ना चाहिए। इन सभी परिस्थितियों को देखते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि मामले में प्रथमदृष्टया हस्तक्षेप का आधार बनता है।
अदालत ने आदेश दिया कि अगले आदेश तक संबंधित FIR के संचालन पर रोक रहेगी और उसके आधार पर याचिकाकर्ता के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की जाएगी।
मामले में हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश के बेसिक शिक्षा विभाग के अपर मुख्य सचिव को व्यक्तिगत हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है। हलफनामे में स्कूल की वर्तमान स्थिति बताने के साथ उसकी तस्वीरें भी संलग्न करनी होंगी।
कोर्ट ने विशेष रूप से यह बताने को कहा है कि पत्रकार की 20 अगस्त की रिपोर्ट के बाद स्कूल में कोई निर्माण, मरम्मत, बदलाव या अन्य सुधार किया गया है या नहीं। अपर मुख्य सचिव को यह हलफनामा चार सप्ताह के भीतर दाखिल करना है।
मामले की अगली सुनवाई चार सप्ताह बाद होगी।
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