
तलासेरी - कन्नूर डेंटल कॉलेज में दलित बीडीएस छात्र नितिन राज की आत्महत्या के मामले में विशेष अदालत ने आरोपी विभागाध्यक्ष डॉ. एम. कोदंड राम को नियमित जमानत दे दी है। तलासेरी स्थित एससी/एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम की विशेष अदालत के न्यायाधीश मनोज एम. ने 9 सितंबर को पारित आदेश में जमानत स्वीकार की।
नितिन राज हिंदू चेरामन समुदाय से थे जो अनुसूचित जाति में आता है। नितिन ने 10 अप्रैल की दोपहर को कॉलेज परिसर की दूसरी मंजिल से कूदकर आत्महत्या की थी। कन्नूर क्राइम ब्रांच के अपराध संख्या 1081/2026 में आरोप है कि डॉ. राम समेत आरोपियों ने उन्हें सार्वजनिक रूप से लगातार अपमानित, अपमानित और धमकाया। अभियोजन का कहना है कि यह उत्पीड़न उनकी जाति की वजह से था, जिससे गंभीर मानसिक तनाव पैदा हुआ और छात्र ने आत्महत्या कर ली। मामला भारतीय न्याय संहिता की धारा 108 और एससी/एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम की धारा 3(1)(र) के तहत दर्ज है।
डॉ. राम कन्नूर डेंटल कॉलेज, अंजारकंडी में डेंटल एनाटॉमी विभाग के प्रमुख हैं। उनकी अग्रिम जमानत याचिका विशेष अदालत, केरल हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दी थी। पहली गिरफ्तारी सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देशों के उल्लंघन में होने के कारण उन्हें रिहा कर दिया गया। 23 जुलाई को अदालत की अनुमति से उन्हें दोबारा गिरफ्तार किया गया। उसके बाद वे 45 दिन से अधिक न्यायिक हिरासत में थे।
अदालत ने आदेश में स्पष्ट किया कि जमानत के चरण में साक्ष्यों का विस्तृत विश्लेषण नहीं किया जाता। एससी/एसटी अधिनियम की धारा 3(1)(र) के संबंध में सुप्रीम कोर्ट के शजान स्कारिया मामले का हवाला देते हुए अदालत ने कहा कि अपमान या धमकी मात्र से यह धारा नहीं लगती। अपमान का कारण पीड़ित की जाति होना जरूरी है। अदालत ने पाया कि इस स्तर पर यह सामग्री नहीं है कि आरोपी ने पीड़ित को सार्वजनिक रूप से उनकी जाति का नाम लेकर संबोधित किया, हालांकि सार्वजनिक रूप से उपहास और अपमान के आरोप हैं।
आत्महत्या के उकसावे (धारा 108 बीएनएस, पुरानी धारा 306 आईपीसी) के मामले में अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का उल्लेख किया। इनमें पवन कुमार बनाम हिमाचल प्रदेश, एम. मोहन बनाम राज्य, जयदीपसिंह चावड़ा और रमेश कुमार जैसे मामले शामिल हैं। अदालत ने कहा कि महज उत्पीड़न या गुस्से में कही गई बातें उकसावे के लिए पर्याप्त नहीं। स्पष्ट मंशा, सक्रिय भूमिका और ऐसा कृत्य दिखाना होता है जिससे पीड़ित के पास आत्महत्या के अलावा कोई रास्ता न बचा हो। ये सवाल ट्रायल में तय होंगे।
जांच अधिकारी की रिपोर्ट और केस डायरी के आधार पर अदालत ने माना कि आगे की हिरासत जांच के लिए आवश्यक नहीं है। पुलिस ने पहले ही पुलिस कस्टडी लेकर पूछताछ कर ली है। अदालत ने “जमानत नियम है, जेल अपवाद” के सिद्धांत को दोहराया और सुप्रीम कोर्ट के जलालुद्दीन खान तथा मनीष सिसोदिया फैसलों का हवाला दिया।
पीड़ित के पिता राजन वी.एन. ने अदालत में आपत्ति दर्ज कराई। उन्होंने कहा कि बेटा मेरिट से कॉलेज में आया था। एचओडी उन्हें “स्लमडॉग” कहते थे, आरक्षण का ताना देते थे और पीटीए मीटिंग में माता-पिता न आने पर अंग दान करने जैसी टिप्पणी की थी। पिता का आरोप है कि जांच निष्पक्ष नहीं चल रही और हाईकोर्ट ने भी जांच की प्रगति पर असंतोष जताया है। पूर्व जांच अधिकारी को निलंबित भी किया गया था।
आरोपी पक्ष का तर्क था कि नितिन राज पढ़ाई में कमजोर थे, उन पर लोन ऐप का दबाव था और 10 अप्रैल को प्रिंसिपल के केबिन में हुई नसीहत के बाद घटना हुई। उनका कहना है कि डॉ. राम का आखिरी संपर्क 13 मार्च को था।
अदालत ने जमानत इन शर्तों पर मंजूर की:
पांच लाख रुपये का बांड और दो जमानतदार (एक निकट संबंधी)
हर बुधवार सुबह 9 से 10 बजे तक जांच अधिकारी के सामने हाजिरी (छह महीने या चार्जशीट दाखिल होने तक)
ट्रायल खत्म होने तक कन्नूर डेंटल कॉलेज परिसर में प्रवेश या छात्रों से संपर्क पर पूर्ण रोक
गवाहों को प्रभावित न करना और सबूतों से छेड़छाड़ न करना
जमानत के दौरान कोई नया अपराध न करना
शर्त तोड़ने पर संबंधित थाना अधिकारी जमानत रद्द कराने के लिए अदालत जा सकते हैं।
मामला अभी जांच के अधीन है। अदालत ने दोहराया कि यह आदेश गुण-दोष पर अंतिम फैसला नहीं है। नितिन राज की मौत के बाद कॉलेज परिसर में जातिगत उत्पीड़न और संस्थागत जवाबदेही के सवाल फिर से उठे हैं।
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