
कालडी- केरल के श्री शंकराचार्य संस्कृत यूनिवर्सिटी में आधारभूत सुविधाओं की कमी के खिलाफ नाटकीय विरोध प्रदर्शन के बाद 16 छात्रों को सस्पेंड कर दिया गया है, जिनमें 6 रिसर्च स्कॉलर और केरल की पहली ट्रांसजेंडर पीएचडी छात्रा रितीशा भी शामिल हैं। केरल हाई कोर्ट से 4 नवंबर से शुरू हो रही परीक्षाओं में बैठने की अनुमति नहीं मिलने के बाद अब स्टूडेंट्स ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका लगाई है।
केरल हाईकोर्ट की सिंगल बेंच ने छात्रों को राहत देते हुए परीक्षा फीस जमा करने और अस्थायी रूप से परीक्षा में बैठने की अनुमति दे दी थी। लेकिन, विश्वविद्यालय प्रशासन और वीसी ने इस फैसले को चुनौती दी, जिसके बाद 3 नवंबर को केरल हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने सिंगल बेंच के आदेश को पलट दिया और अटेंडेंस की कमी व अनुशासनहीनता का हवाला देते हुए छात्रों को परीक्षा में बैठने से रोक दिया।
स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (SFI) ने इस कार्रवाई को "विच-हंट" यानी छात्रों को निशाना बनाने की साजिश करार दिया है और पूरे देश के विश्वविद्यालयों में एकजुटता प्रदर्शन का आह्वान किया है।
SFI अध्यक्ष आदर्श एम. सजी और महासचिव श्रीजन भट्टाचार्य ने बताया कि यूनिवर्सिटी में बुनियादी सुविधाओं की मांग को लेकर छात्रों ने विरोध प्रदर्शन किया था। इसी क्रम में थिएटर डिपार्टमेंट के छात्रों ने अपने विभाग में खराब लाइटिंग सुविधाओं के खिलाफ एक नाटकीय प्रदर्शन किया। इस प्रदर्शन का थीम "स्ट्रीटलाइट का अंतिम संस्कार" था, जिसमें एक खराब स्ट्रीटलाइट को मृत शरीर के रूप में दिखाया गया था। इस प्रदर्शन के वीडियो और तस्वीरें सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुईं।
SFI का आरोप है कि इसके बाद अंतरिम वाइस चांसलर सीसा थॉमस ने छात्रों की इस रचनात्मक अभिव्यक्ति को जानबूझकर गलत तरीके से पेश किया और इसे "उनके लिए अंतिम संस्कार करने की कोशिश" बताया। इसके आधार पर छात्रों को सस्पेंड कर दिया गया और उनके खिलाफ झूठे मामले दर्ज किए गए।
सस्पेंड किए गए छात्रों में यूनिवर्सिटी के सबसे मेधावी और कलात्मक रूप से सक्षम छात्र शामिल हैं:
रितीशा: केरल की पहली ट्रांसजेंडर छात्रा जो पीएचडी कर रही हैं और जूनियर रिसर्च फेलोशिप (JRF) प्राप्त कर चुकी हैं।
अरुणिमा: संस्कृत यूनिवर्सिटी कलोत्सव में "कला तारका" विजेता।
श्यामजीत: इंटर-यूनिवर्सिटी नेशनल यूथ फेस्टिवल में माइम श्रेणी में प्रथम स्थान प्राप्त किया।
शिवा और जिश्नु: नाटक "पराची" के क्रमशः निर्देशक और अभिनेता, जिसने नेशनल इंटर-यूनिवर्सिटी यूथ फेस्टिवल में पहला स्थान जीता था।
SFI के अनुसार, बाकी सस्पेंड किए गए छात्र भी अपने-अपने शैक्षणिक और कलात्मक क्षेत्रों में अत्यधिक मेधावी हैं।
SFI ने उच्च शिक्षा मंत्री रोजी एम. जॉन की भी आलोचना की, जिन्होंने वाइस चांसलर का समर्थन करते हुए छात्रों के रचनात्मक विरोध को "आदिम" बताया। SFI ने कहा कि यूनिवर्सिटी मंत्री के ही विधानसभा क्षेत्र में स्थित है और जॉन पहले कांग्रेस समर्थित छात्र संगठन NSUI के राष्ट्रीय अध्यक्ष रह चुके हैं।
SFI का आरोप है कि UDF सरकार के निर्देश पर राज्य पुलिस ने वाइस चांसलर द्वारा निशाना बनाए गए छात्रों को पकड़ना शुरू कर दिया और कई छात्रों को गिरफ्तार कर लिया। संगठन ने इसे "संघ परिवार समर्थित प्रशासन द्वारा कांग्रेस नीत राज्य सरकार के समर्थन से छात्र प्रतिरोध को कुचलने की राजनीतिक साजिश" बताया।
इसके अलावा, SFI ने आरोप लगाया कि एर्नाकुलम के महाराजा कॉलेज में भी छात्रों को सस्पेंड कर दिया गया, जब उन्होंने मंत्री रोजी एम. जॉन के कॉलेज परिसर में एक कार्यक्रम के दौरान SSUS की घटना पर शांतिपूर्ण तरीके से सवाल पूछे।
SFI ने सभी छात्रों का सस्पेंशन तत्काल रद्द करने और अंतरिम वाइस चांसलर सीसा थॉमस को हटाने की मांग की है, जिन्हें संगठन ने "संघ परिवार का एजेंट" करार दिया। SFI ने सभी प्रगतिशील छात्रों, लोकतांत्रिक ताकतों और जनता से छात्र अधिकारों पर इस हमले के खिलाफ एकजुट होने की अपील की है और देश भर के सभी विश्वविद्यालयों में एकजुटता प्रदर्शन करने का आह्वान किया है।
मंगलवार को केरल हाई कोर्ट की एक डिवीजन बेंच ने सिंगल जज के उस आदेश को खारिज कर दिया, जिसमें विश्वविद्यालय को छात्रों की परीक्षा फीस स्वीकार करने और उन्हें परीक्षा में बैठने देने का निर्देश दिया गया था। जस्टिस अनिल के. नरेंद्रन और जस्टिस मुरली कृष्णा एस. की बेंच ने विश्वविद्यालय और उसके कुलपति (वाइस-चांसलर) द्वारा दायर अपील पर यह आदेश जारी किया। बेंच ने कहा कि सिंगल जज ने ऐसा अंतरिम आदेश देकर गलती की थी।
बेंच ने कहा, "इस आदेश के जरिए, सिंगल जज ने छात्रों को बिना अटेंडेंस की कमी को माफ करने की अर्जी दिए और बिना विश्वविद्यालय की अधिसूचना के अनुसार आवेदन किए ही परीक्षाओं में बैठने की अनुमति दे दी थी। अधिसूचना के तहत, ऐसे आवेदनों को संबंधित विभाग के प्रमुख या केंद्र के निदेशक के माध्यम से भेजा जाना चाहिए। इसके साथ अटेंडेंस सर्टिफिकेट, प्रोग्रेस रिपोर्ट, परीक्षा फीस जमा करने का सबूत और अन्य जरूरी दस्तावेज भी होने चाहिए।"
बेंच ने कहा, "ऐसा अंतरिम आदेश देकर, सिंगल जज ने विश्वविद्यालय को नियमों के खिलाफ काम करने का निर्देश दिया था। सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय किए गए कानून के अनुसार, ऐसा करना कानूनी रूप से मान्य नहीं है।" कोर्ट ने यह भी गौर किया कि सिंगल जज ने विश्वविद्यालय का पक्ष सुने बिना ही यह आदेश पारित कर दिया था। प्रभावित छात्रों ने अब सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है।
अगस्त माह में SFI के नेतृत्व में छात्रों ने बुनियादी ढांचे की कमी, पानी की किल्लत, फैकल्टी के खाली पदों को भरने और थिएटर विभाग में खराब लाइट व्यवस्था जैसे 18 मुद्दों को लेकर विश्वविद्यालय में विरोध प्रदर्शन शुरू किया। 13 अगस्त को सिंडिकेट की बैठक के दौरान यह विरोध प्रदर्शन काफी उग्र हो गया।
इस प्रदर्शन के दौरान छात्रों ने 'The Light Is Dead' (लाइट मर गई है) नामक एक प्रतीकात्मक नाटक/प्रदर्शन किया, जिसे लेकर दोनों पक्षों के दावे पूरी तरह अलग हैं:
थिएटर विभाग के छात्रों का कहना था कि उन्होंने विभाग में लंबे समय से खराब पड़ी लाइटिंग व्यवस्था और स्ट्रीटलाइट्स की तरफ ध्यान खींचने के लिए एक रचनात्मक विरोध प्रदर्शन किया था। उन्होंने खराब लाइटों को एक "शव" की तरह प्रस्तुत करते हुए उसकी प्रतीकात्मक शवयात्रा (Mock Funeral) निकाली थी।
कार्यवाहक वाइस-चांसलर डॉ. सीजा थॉमस ने आरोप लगाया कि छात्रों ने जानबूझकर उनकी अर्थी (Mock Cremation) निकाली और ईसाई अंतिम संस्कार की रीतियों का मज़ाक उड़ाते हुए उनके खिलाफ नारे लगाए। वीसी ने यह भी शिकायत की कि छात्रों ने उनके साथ हाथापाई की, उनका रास्ता रोका और उनकी गाड़ी को नुकसान पहुंचाया।
प्रशासन ने इस घटना को अनुशासनहीनता और वीसी पर हमला मानते हुए आंतरिक जांच बिठाई और 16 छात्रों को अनिश्चितकाल के लिए निलंबित कर दिया। इसके साथ ही पुलिस ने चार छात्र नेताओं को गिरफ्तार भी किया था। विश्वविद्यालय प्रशासन ने छात्रों के इस दावे को भी खारिज कर दिया कि लाइट हाल ही में खराब हुई थीं; प्रशासन के मुताबिक वे लाइटें 2018 की बाढ़ में खराब हुई थीं।
विश्वविद्यालय की सिंडिकेट कमेटी ने 12 छात्रों का निलंबन इस शर्त पर वापस लेने की बात कही कि वे लिखित में बिना शर्त माफी मांगें। हालांकि, SFI और प्रदर्शनकारी छात्रों ने किसी भी प्रकार की माफी मांगने से साफ इनकार कर दिया है और उनका कहना है कि वे केवल एक नाटक करने और अपनी मांगें उठाने के लिए प्रताड़ित किए जा रहे हैं। छात्र परिसर में अपनी भूख हड़ताल और विरोध प्रदर्शन जारी रखे हुए हैं।
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