
नई दिल्ली- दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) ने परिसर में सार्वजनिक सभाओं, जुलूसों, प्रदर्शनों और किसी भी प्रकार के विरोध-प्रदर्शन पर एक महीने के लिए पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया है। यह आदेश प्रॉक्टर प्रो. मनोज कुमार द्वारा 17 फरवरी को जारी किया गया, जो तत्काल प्रभाव से लागू हो गया है और एक महीने तक प्रभावी रहेगा।
प्रशासन ने आदेश में कहा है कि परिसर में अनियंत्रित सार्वजनिक सभाएं, जुलूस या प्रदर्शन यातायात में बाधा, मानव जीवन के लिए खतरा और सार्वजनिक शांति भंग कर सकते हैं। अतीत में ऐसे प्रदर्शनों के आयोजकों द्वारा स्थिति को नियंत्रित करने में असफलता के कारण कानून-व्यवस्था बिगड़ने के उदाहरण दिए गए हैं। दिल्ली पुलिस के सहायक आयुक्त (सिविल लाइंस) द्वारा जारी आदेश तथा गृह मंत्रालय की अधिसूचनाओं का हवाला देते हुए पांच या अधिक व्यक्तियों की सभा, रैली, धरना, विरोध प्रदर्शन, खतरनाक सामग्री (जैसे मशालें) ले जाना, नारे लगाना और भाषण देना भी प्रतिबंधित कर दिया गया है।
यह कदम यूजीसी (यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन) की 2026 समता नियमावली (Equity Regulations) से जुड़े हालिया विवाद के बाद आया है। ये नियम उच्च शिक्षा संस्थानों में जाति-आधारित भेदभाव को समाप्त करने और समानता स्थापित करने के उद्देश्य से लाए गए थे, लेकिन सुप्रीम कोर्ट द्वारा इन पर स्थगन लगाए जाने के बाद परिसर में तनाव बढ़ गया। 13 फरवरी को नार्थ कैंपस में इन नियमों के समर्थन में प्रदर्शन के दौरान दो छात्र संगठनों के बीच झड़प हुई, जिसमें मारपीट के आरोप-प्रत्यारोप लगे और क्रॉस एफआईआर दर्ज हुईं।
नेशनल ह्यूमन राइट्स कमीशन ने नॉर्थ दिल्ली के डिप्टी कमिश्नर ऑफ़ पुलिस और DU के वाइस चांसलर को प्रोटेस्ट के दौरान एक महिला जर्नलिस्ट पर कथित हमले के मामले में नोटिस जारी किया।
NHRC के मुताबिक, जर्नलिस्ट यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन के सपोर्ट में एक प्रोटेस्ट कवर कर रही थीं, तभी उन पर कथित तौर पर भीड़ ने हमला कर दिया। शिकायत में दावा किया गया कि उन्हें उनकी जाति के आधार पर टारगेट किया गया, गाली-गलौज की गई, मारपीट की गई और धमकी दी गई, साथ ही कथित तौर पर उनकी इज्जत को ठेस पहुंचाने की कोशिश की गई। इस घटना को जाति आधारित हिंसा और प्रेस की आज़ादी पर सीधा हमला बताया गया।
हालांकि, रोक के ऑर्डर की फैकल्टी और स्टूडेंट बॉडीज़ के कुछ हिस्सों ने कड़ी आलोचना की।
इस बीच, सोशल मीडिया पर डॉ. ओम सुधा की पोस्ट चर्चा में रही, जिसमें उन्होंने लिखा: "जब #UGCRegulations के विरोध में और भेदभाव बनाये रखने के लिए कुछ जाति के कुछ लोग उग्र विरोध कर रहे थे तब विश्वविद्यालय प्रशासन को दिक्कत नहीं हुई लेकिन जैसे ही #UGC के समर्थन में और विश्वविद्यालय में व्याप्त भेदभाव को खत्म करने तथा समता स्थापित करने के लिए बहुजन लोकतान्त्रिक तरीके से प्रदर्शन कर रहे हैं तो विश्वविद्यालय प्रशासन को परेशानी हो रही है। जहाँ-जहाँ सामंती और मनुवादी मानसिकता के लोग कुर्सी पर बैठे हैं, वहाँ-वहाँ बहुजन विरोधी फैसले लिए जा रहे हैं।"
सोशल मीडिया पर प्रतिक्रियाएं तीखी रही हैं। छात्र और शिक्षक संगठन जैसे डेमोक्रेटिक टीचर्स फोरम (डीटीएफ) ने इसे "असंवैधानिक" और "शांतिपूर्ण सभा को अपराधीकरण" करार दिया। कई यूजर्स ने इसे "लोकतंत्र का गला घोंटना" बताया, जबकि कुछ ने प्रशासन के कानून-व्यवस्था बनाए रखने के फैसले का समर्थन किया। छात्र संगठनों ने आदेश वापस लेने की मांग की है, इसे "असहमति दबाने की कोशिश" बताया।
विश्वविद्यालय प्रशासन ने इसे "सावधानीपूर्ण कदम" बताया है, जबकि आलोचक इसे यूजीसी नियमों के समर्थकों के खिलाफ पक्षपातपूर्ण मान रहे हैं।
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