
नई दिल्ली। सरकारी फ़ाइलों में बड़े फ़ैसले अक्सर बहुत छोटी पंक्तियों में दर्ज होते हैं। अनुसूचित जाति (SC) के छात्रों की कमर्शियल पायलट लाइसेंस (CPL) स्कॉलरशिप के अंत की कहानी भी TM के पास मौजूद दस्तावेज़ों में ऐसी ही एक पंक्ति में सिमटी है। टॉप क्लास स्कॉलरशिप स्कीम की स्टीयरिंग कमेटी की 7 जुलाई 2023 को हुई एक बैठक की मिनट्स में लिखा है कि "व्यापक सहमति" इस पर बनी कि बहुत ऊँची फ़ीस और लाभार्थी छात्रों के रोज़गार की निश्चितता न होने को देखते हुए CPL कोर्स को स्कीम से हटा दिया जाए।
बिना राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग से परामर्श किये अनुसूचित जाति समुदाय से जुड़े इस नीतिगत निर्णय को लिया गया जो ना केवल संवैधानिक प्रावधान का उल्लंघन है बल्कि इस निर्णय के कारन बीते चार वर्षों में ऐसे 200 योग्य दलित स्टूडेंट्स अपने ड्रीम करियर को चुनने से वंचित रह गये जो शायद पायलट बनकर आसमान छूने के सपने देखते हैं।
स्टीयरिंग कमेटी की उस बैठक के तीन साल से ज़्यादा बाद यही फ़ैसला अब राजनीति के केंद्र में है। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने 26 सितंबर को केंद्रीय सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्री डॉ. वीरेंद्र कुमार को पत्र लिखा है। उन्होंने माँग की है कि CPL स्कॉलरशिप तुरंत बहाल हो और 2023 से लंबित सभी मामले मंज़ूर किए जाएँ।
यह पत्र अचानक नहीं लिखा गया। उसके पीछे मुंबई के एक संगठन का प्रतिनिधित्व है। 11 सितंबर को अंधेरी (मुंबई) स्थित डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर नेशनल एसोसिएशन ऑफ़ इंजीनियर्स (BANAE) ने राहुल गांधी को एक विस्तृत पत्र भेजा। संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष नागसेन सोनारे ने राहुल गांधी से अनुरोध किया गया था कि वे इस मुद्दे को "मोस्ट अर्जेंट / ऑन टॉप प्रायोरिटी" लेते हुए इसे व्यक्तिगत रूप से यह मुद्दा सामाजिक न्याय मंत्री के सामने उठाएँ। BANAE ने साफ़ लिखा कि यह सिर्फ़ स्कॉलरशिप की शिकायत नहीं है, बल्कि अनुसूचित जातियों को प्रभावित करने वाले बड़े नीतिगत फ़ैसलों में संवैधानिक सुरक्षा के पालन का सवाल है। पंद्रह दिन बाद राहुल गांधी ने मंत्री को अपना पत्र लिखा और BANAE का पूरा प्रतिनिधित्व उसके साथ संलग्न किया।
गांधी ने अपने पत्र में लिखा "देशभर में युवा दलित आसमान की ओर देखकर उड़ने का सपना देखते हैं। सालों तक सरकारी स्कॉलरशिप ने इन सपनों को सच किया। 2023-24 से ये सपने टूट गए हैं। 2023-24 में CPL कोर्स को SC छात्रों के लिए चलने वाली "टॉप क्लास स्कॉलरशिप स्कीम" से हटा दिया गया। मंत्रालय का कहना है कि पात्र छात्र SC छात्रों की पोस्ट मैट्रिक स्कॉलरशिप के तहत आवेदन कर सकते हैं।" राहुल गांधी का कहना है कि उस योजना के दिशानिर्देशों में CPL प्रशिक्षण का कोई प्रावधान नहीं है, और इसलिए "अधिकांश दलित युवाओं के लिए कॉकपिट का रास्ता बंद हो गया है।"
मामला उत्तर प्रदेश के बहुजन एक्टिविस्ट की शिकायत के बाद उठा। ऑयल एंड नेचुरल गैस कॉर्पोरेशन लिमिटेड (ONGC) के रिटायर्ड जनरल मेनेजर द्वारिका प्रसाद इस पूरे प्रकरण में वह शिकायतकर्ता हैं जिनके पत्र से मामला राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग (NCSC) तक पहुँचा। तीन साल के अथक प्रयासों से द्वारिका प्रसाद ने सूचना के अधिकार के जरिये दस्तावेज संकलित कर इस महत्वाकांक्षी स्कीम के बंद होने की परतें खोली।
मथुरा ज़िले के निवासी द्वारिका प्रसाद ने NCSC के अध्यक्ष को पत्र लिखकर कहा कि SC छात्रों के लिए CPL कोर्स की मुफ़्त स्कॉलरशिप और फ़ीस की सुविधा पिछले चार दशकों से अधिक से चल रही थी, जिसे सामाजिक न्याय मंत्रालय ने मनमाने ढंग से बंद कर दिया। द्वारिका प्रसाद बताते हैं कि इस योजना से सैकड़ों ग़रीब अनुसूचित जाति के छात्र लाभान्वित हुए थे। उन्होंने आरोप लगाया कि यह फ़ैसला अनुच्छेद 338(9) का उल्लंघन करके लिया गया क्योंकि ऐसा प्रतीत होता है कि मंत्रालय ने बड़े नीतिगत निर्णय से पहले आयोग से कोई परामर्श नहीं किया। उन्होंने आयोग से अनुरोध किया कि वह यह मामला मंत्रालय के साथ उठाए।
इसी शिकायत पर 19 जनवरी 2026 को आयोग के अवर सचिव के.जे. भट्ट ने फ़ाइल संख्या ESDW/IP/UP/2024/259953 के तहत सामाजिक न्याय विभाग के सचिव को पत्र भेजा। उसमें द्वारिका प्रसाद का प्रतिवेदन "उचित कार्रवाई" के लिए संलग्न किया गया और पत्र की प्रति उन्हें भी दी गई। यही आयोग का पत्र आगे चलकर BANAE के प्रतिनिधित्व और राहुल गांधी के पत्र, दोनों में संदर्भ बना। आयोग के इस पत्र के सात महीने से अधिक बाद भी कोई प्रभावी समाधान नहीं निकला।
यह समझने के लिए कि क्या बदला, पीछे लौटना होगा। 1 जुलाई 2010 से लागू केंद्र प्रायोजित पोस्ट मैट्रिक स्कॉलरशिप योजना (PMS-2010) के दस्तावेज़ में CPL साफ़ दर्ज है। उसमें CPL को ग्रुप-I के कोर्सों में रखा गया था, यानी उसी श्रेणी में जिसमें मेडिकल, इंजीनियरिंग और मैनेजमेंट जैसे कोर्स आते हैं। CPL कोर्स में कमर्शियल हेलिकॉप्टर पायलट लाइसेंस और ए-320 जैसे विमानों पर मल्टी-इंजन रेटिंग प्रशिक्षण भी शामिल था। पूरे देश के लिए हर साल 50 CPL अवार्ड तय थे। राज्य सरकारें और केंद्रशासित प्रदेश आवेदनों की जाँच करके पात्र उम्मीदवारों के नाम मंत्रालय को भेजते थे, और मंत्रालय "पहले आओ, पहले पाओ" के आधार पर देशभर में 50 अवार्ड तक मंज़ूरी देता था। चयनित छात्रों को ग्रुप-I की दर से मेंटेनेंस अलाउंस मिलता था, यानी छात्रावास में रहने वालों को ₹1,200 और डे-स्कॉलर को ₹550 प्रति माह। साथ ही सभी अनिवार्य फ़ीस के अलावा फ़्लाइट चार्ज भी फ़ीस के रूप में दिए जाते थे। उसी दस्तावेज़ में एक शर्त भी दर्ज है कि प्राइवेट पायलट लाइसेंस और एयरक्राफ़्ट मेंटेनेंस इंजीनियर कोर्स पर स्कॉलरशिप नहीं दी जाएगी। इस तरह CPL अपवाद में नहीं, बल्कि स्कॉलरशिप पाने वाले कोर्सों में शामिल था।
द मूकनायक से बातचीत में BANAE अध्यक्ष नागसेन सोनारे कहते हैं कि CPL स्कॉलरशिप कोई नई रियायत नहीं थी। यह पहले से स्थापित सुविधा थी, जिसे सरकार ने एक विशेष पेशेवर शिक्षा के रूप में मान्यता दी थी। सोनारे ने वर्ष 2005-06 के केंद्रीय बजट का भी हवाला दिया है, जिसमें तत्कालीन वित्त मंत्री ने संसद में घोषणा की थी कि SC/ST छात्रों के लिए प्री-मैट्रिक, पोस्ट-मैट्रिक और मेरिट-आधारित तीनों जारी स्कॉलरशिप योजनाएँ चलती रहेंगी। इसी भाषण में उन्होंने चुनिंदा उत्कृष्टता संस्थानों में प्रवेश लेने वाले SC/ST छात्रों के लिए बड़ी स्कॉलरशिप की एक नई खिड़की का प्रस्ताव रखा था। यही आगे चलकर "टॉप क्लास एजुकेशन फ़ॉर SC स्टूडेंट्स" योजना बनी, जो जून 2007 से प्रभावी हुई।
सोनारे कहते हैं कि 2018 में CPL को मूल पोस्ट मैट्रिक स्कॉलरशिप ढाँचे से हटाया गया, लेकिन उस समय सरकार ने इसे बंद नहीं किया। यह लाभ टॉप क्लास एजुकेशन स्कीम में चला गया। सितंबर 2018 से प्रभावी इस योजना के दिशानिर्देशों में भी यह प्रावधान है कि CPL और टाइप-रेटिंग कोर्स के लिए DGCA से मान्यता प्राप्त सरकारी या CPSE संचालित संस्थान योजना में सूचीबद्ध हो सकते हैं। संगठन इसे निर्णायक अंतर बताता है। उसके मुताबिक 2018 में सिर्फ़ स्कॉलरशिप की जगह बदली थी और सुविधा बनी रही, जबकि 2023 में पूरी सुविधा ही ख़त्म कर दी गई।
CPL स्कॉलरशिप कैसे बंद हुई, इसकी कड़ियाँ मंत्रालय के RTI जवाब के साथ मिले दस्तावेज़ों से जुड़ती हैं। ये पन्ने फ़ाइल संख्या V-11017/18/2022-SCD-I के हैं और उन पर 22 नवंबर 2024 को मंत्रालय के ई-ऑफ़िस से तैयार किए जाने की जानकारी दर्ज है। इनमें स्टीयरिंग कमेटी की स्वीकृत मिनट्स, बैठक का एजेंडा, प्रतिभागियों की सूची और फ़ाइल नोटिंग शामिल हैं।
टॉप क्लास स्कॉलरशिप स्कीम की स्टीयरिंग कमेटी की बैठक 7 जुलाई 2023 को सुबह 10:30 बजे हुई। अध्यक्षता सामाजिक न्याय विभाग के तत्कालीन सचिव सौरभ गर्ग ने की। उनके साथ विभाग के संयुक्त सचिव एवं वित्तीय सलाहकार संजय पांडे, संयुक्त सचिव कल्याणी चड्ढा और उप सचिव महेश कुमार मीणा मौजूद थे। दूसरे मंत्रालयों और विभागों से उच्च शिक्षा विभाग के संयुक्त सचिव पी.के. बनर्जी, दिव्यांगजन सशक्तीकरण विभाग के संयुक्त सचिव राजेश कुमार यादव, UGC की उप सचिव मेघा कौशिक, जनजातीय कार्य मंत्रालय के संयुक्त निदेशक एस.एफ़. बचगुंडी और नीति आयोग के अरुणव डे शामिल हुए। बैठक का मुख्य एजेंडा 2023-24 के लिए EFC की सिफ़ारिश पर उपलब्ध 200 नए स्लॉट का आवंटन था। इसके अलावा तीन साल से योजना में भाग न लेने वाले संस्थानों को हटाने, पहले साल के छात्रों तक स्कॉलरशिप सीमित करने और फ़्लाइंग संस्थानों के मुद्दे पर चर्चा थी।
फ़्लाइंग संस्थानों वाले एजेंडा-बिंदु में कुछ तथ्य दर्ज थे। उसमें लिखा था कि योजना में दो तरह के फ़्लाइंग संस्थान सूचीबद्ध हैं, CPL प्रशिक्षण संस्थान और टाइप-रेटिंग संस्थान, और रोज़गार योग्य बनने के लिए उम्मीदवार को दोनों कोर्स पूरे करने पड़ते हैं। सभी CPL प्रशिक्षण संस्थान सरकारी हैं, जबकि एयर इंडिया के निजीकरण के बाद सभी टाइप-रेटिंग संस्थान निजी हैं। हर कोर्स की औसत फ़ीस ₹20 से 25 लाख बताई गई। निजी फ़्लाइंग संस्थानों के लिए स्कॉलरशिप की सीमा ₹3.72 लाख प्रति वर्ष प्रति छात्र है, जबकि सरकारी संस्थानों में ऐसी कोई सीमा नहीं और पूरी ट्यूशन फ़ीस की प्रतिपूर्ति होती है। योजना में कुल 12 फ़्लाइंग संस्थान सूचीबद्ध थे, पर CPL प्रशिक्षण के लिए नियमित रूप से प्रस्ताव केवल इंदिरा गांधी राष्ट्रीय उड़ान अकादमी और तेलंगाना स्टेट एविएशन एकेडमी से आते थे। इसी बिंदु का समापन इस वाक्य से हुआ कि कमेटी स्कीम के तहत फ़्लाइंग कोर्स जारी रखने की प्रासंगिकता पर चर्चा कर सकती है।
मिनट्स के अनुसार इस मुद्दे पर "विस्तार से" चर्चा हुई। दर्ज कारण ये थे कि रोज़गार योग्य बनने के लिए CPL के बाद टाइप-रेटिंग कोर्स करना पड़ता है, और एयर इंडिया के निजीकरण के बाद निजी संस्थानों के लिए ₹3.72 लाख की सीमा के कारण कोई संस्थान टाइप-रेटिंग के लिए प्रस्ताव नहीं भेज रहा।
मिनट्स में लिखा है कि "व्यापक सहमति" इस पर बनी कि बहुत ऊँची फ़ीस और लाभार्थी छात्रों के रोज़गार की कोई निश्चितता न होने को देखते हुए CPL कोर्स को स्कीम से हटा दिया जाए, और फ़्लाइंग संस्थानों को आवंटित 55 स्लॉट नए जोड़े जाने वाले संस्थानों में बाँट दिए जाएँ।
इसी बैठक में दिल्ली के रेड बर्ड फ़्लाइंग क्लब को योजना में शामिल करने का अनुरोध भी विचाराधीन था। फ़ाइल नोटिंग के अनुसार कमेटी ने उसे स्वीकार नहीं किया, क्योंकि उसने सभी फ़्लाइंग संस्थानों को सूची से हटाने का निर्णय ले लिया था।
CPL इस बैठक का अकेला फ़ैसला नहीं था। उसी बैठक में 42 "राष्ट्रीय महत्व के संस्थानों" को 3-3 स्लॉट के साथ योजना में जोड़ने का निर्णय हुआ। मिनट्स के अनुसार सचिव ने NISER और IISER जैसे संस्थानों को भी जोड़ने का सुझाव दिया, और NIFT कोलकाता का अनुरोध स्वीकार किया गया। तीन साल से भाग न लेने वाले 31 संस्थान हटाए गए और नई स्कॉलरशिप के स्लॉट 1,500 से बढ़ाकर 1,700 किए गए। स्कॉलरशिप केवल पहले साल के छात्रों तक सीमित की गई, सरकारी स्कूलों से दसवीं पास करने वालों को आय प्रमाणपत्र की छूट हटाई गई और चयन के बाद छात्रों के पढ़ाई छोड़ने की ऊँची दर पर अध्ययन कराने का फ़ैसला हुआ।
फ़ाइल नोटिंग में इन फ़ैसलों का हिसाब मौजूद है। नोट के अनुसार योजना में 259 संस्थान सूचीबद्ध थे और नई स्कॉलरशिप के स्लॉट 2021-22 में 1,500 तय हुए थे। EFC की सिफ़ारिश के अनुसार इन्हें 2022-23 में 1,600, 2023-24 में 1,700, 2024-25 में 1,800 और 2025-26 में 1,900 होना था। नोट में बैठक के फ़ैसलों का सार दिया गया है। उसमें दर्ज है कि हर फ़्लाइंग कोर्स पर औसत खर्च ₹25 से 35 लाख आता है। एजेंडा में यही औसत ₹20 से 25 लाख लिखा गया था। नोट के अनुसार निजी संस्थानों के लिए ₹3.72 लाख की सीमा के कारण वे टाइप-रेटिंग के प्रस्ताव नहीं भेज रहे थे, इसलिए कमेटी ने सभी फ़्लाइंग संस्थानों को सूची से हटाने और उनके मौजूदा 55 स्लॉट बाँटने का निर्णय लिया।
रिक्त स्लॉट की गणना भी नोट में दर्ज है। शुरू में 200 नए स्लॉट, 31 हटाए जाने वाले संस्थानों के स्लॉट और 55 फ़्लाइंग संस्थानों के स्लॉट जोड़कर संख्या 286 निकली। फिर पता चला कि 6 संस्थान हटाए जाने वाली दोनों सूचियों में थे, इसलिए सुधार के बाद रिक्त स्लॉट 280 रहे। इनमें से 42 राष्ट्रीय महत्व के संस्थानों को 126 स्लॉट मिले, NIFT कोलकाता और NISER भुवनेश्वर को 3-3 स्लॉट मिले और बाकी 148 स्लॉट मौजूदा संस्थानों में बढ़ा दिए गए। संशोधित दिशानिर्देशों में फ़्लाइंग संस्थानों को, CPL और टाइप-रेटिंग दोनों को, "सूचीबद्ध संस्थानों की सूची" से हटा दिया गया। नोट के अंत में संशोधित दिशानिर्देशों का मसौदा सामाजिक न्याय मंत्री की मंज़ूरी के लिए रखे जाने की बात दर्ज है।
फ़ाइल के पन्नों पर 1 अगस्त 2023 से 22 अगस्त 2023 के बीच की नोटिंग का क्रम है, जिसमें सेक्शन अधिकारी से लेकर सचिव तक के नाम और समय हैं।
वर्ष 2007 में राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग (NCSC) के अध्यक्ष डॉ. बूटा सिंह की चिंता यह थी कि सरकार अनुसूचित जातियों के अधिकारों को प्रभावित करने वाले फ़ैसलों और क़दमों में आयोग से परामर्श नहीं ले रही। आयोग ने 7 अगस्त 2007 को विधि सचिव को बुलाया था। चर्चा का विषय यह था कि अनुसूचित जातियों के हितों को प्रभावित करने वाले अहम क़ानूनों और नियमों के निर्माण में आयोग से सलाह नहीं ली जा रही।
मंत्रालय ने RTI के जवाब में योजना के पैरा-7 का हवाला दिया है। यह पैरा स्टीयरिंग कमेटी की संरचना और अधिकारों का है। इसके अनुसार कमेटी संस्थानों को जोड़ने या हटाने की सिफ़ारिश करती है, स्लॉट का समान वितरण करती है और ज़रूरत पड़ने पर योजना में उचित बदलाव की सिफ़ारिश करती है। इसी के आधार पर जवाब का निष्कर्ष है कि योजना में संशोधन से पहले राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग (NCSC) से पत्राचार का कोई प्रावधान नहीं है।
BANAE के प्रतिनिधित्व की धुरी यही मुद्दा है। संविधान के अनुच्छेद 338(9) के अनुसार संघ और हर राज्य सरकार अनुसूचित जातियों को प्रभावित करने वाले सभी प्रमुख नीतिगत मामलों पर आयोग से परामर्श करेगी। संगठन का कहना है कि SC छात्रों के लिए एक स्थापित स्कॉलरशिप का पूर्ण उन्मूलन "प्रमुख नीतिगत मामला" है, इसलिए आयोग से पूर्व परामर्श ज़रूरी था। RTI जवाब के तर्क को वह "ग़लत प्रश्न का उत्तर" बताता है। उसके अनुसार संवैधानिक अपेक्षा इस पर निर्भर नहीं करती कि विभागीय योजना में NCSC से पत्राचार का क्लॉज़ है या नहीं। असली सवाल यह है कि क्या यह अनुच्छेद 338(9) के अर्थ में अनुसूचित जातियों को प्रभावित करने वाला प्रमुख नीतिगत मामला था। संगठन के शब्दों में, "विभागीय योजना संवैधानिक आदेश को ओवरराइड, डायल्यूट या डिस्पेंस नहीं कर सकती।" वह यह भी कहता है कि स्टीयरिंग कमेटी को संस्थान जोड़ने-हटाने और स्लॉट बाँटने का अधिकार हो सकता है, लेकिन जब नतीजा CPL स्कॉलरशिप का पूर्ण उन्मूलन हो तो मामला कहीं बड़े नीतिगत और संवैधानिक दायरे में चला जाता है, और आंतरिक प्रशासनिक शक्तियाँ संवैधानिक सुरक्षा को ओवरराइड नहीं कर सकतीं।
26 अक्टूबर 2007 को विधि एवं न्याय मंत्रालय के विधि सचिव टी.के. विश्वनाथन ने तत्कालीन कैबिनेट सचिव के.एम. चंद्रशेखर को D.O. पत्र (संख्या 11051/07/Advice-A) लिखा था। पत्र के अनुसार 7 अगस्त 2007 को राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग ने विधि सचिव को बुलाकर इस बात पर चर्चा की थी कि अनुसूचित जातियों के हितों को प्रभावित करने वाले अहम क़ानूनों और नियमों के निर्माण में आयोग से परामर्श नहीं लिया जा रहा। आयोग के तत्कालीन अध्यक्ष डॉ. बूटा सिंह ने स्पष्ट शब्दों में चिंता जताई कि आयोग से सलाह न लेना अनुच्छेद 338(9) का उल्लंघन है। इसके बाद विधि सचिव ने कैबिनेट सचिव से अनुरोध किया कि वे सभी मंत्रालयों और विभागों को इस प्रावधान का कड़ाई से पालन करने की सलाह दें।
BANAE का तर्क है कि यह पत्र साबित करता है कि अनुच्छेद 338(9) का पालन 2023 में कोई अनजाना या नया सवाल नहीं था, क्योंकि भारत सरकार का अपना विधि सचिव 2007 में ही सभी मंत्रालयों के लिए इसके सख़्त अनुपालन की सलाह माँग चुका था। इसलिए संगठन चाहता है कि मंत्रालय बताए कि 2023 का प्रस्ताव तैयार करते समय यह पत्र देखा गया या नहीं, क्या इसके बाद मंत्रालयों को कोई निर्देश जारी हुए थे, क्या मंत्रालय को उनकी जानकारी थी, क्या कोई कानूनी राय ली गई थी और NCSC से परामर्श को अनावश्यक मानने का कानूनी आधार क्या था।
BANAE का कहना है कि यह मामला एक रूटीन RTI जवाब से हल नहीं हो सकता। संगठन ने अपनी शिकायत में दस सवाल उठाए हैं जिनके जवाब पूर्ण जाँच से ही मिल सकते हैं। ये सवाल हैं कि CPL और फ़्लाइंग संस्थानों का एजेंडा किसने तैयार किया, पृष्ठभूमि नोट किसने बनाया, अनुच्छेद 338(9) के निहितार्थ किसने जाँचे, क्या 7 जुलाई 2023 से पहले NCSC से परामर्श हुआ और अगर नहीं हुआ तो उसे अनावश्यक किसने ठहराया। संगठन यह भी पूछता है कि क्या 2007 के विधि सचिव के पत्र पर विचार हुआ, क्या कोई कानूनी राय ली गई, क्या कमेटी को बताया गया कि CPL स्कॉलरशिप SC छात्रों की एक स्थापित सुविधा रही है और क्या उसे बताया गया कि प्रस्ताव का नतीजा सुविधा का पूर्ण उन्मूलन होगा। अंतिम सवाल यह है कि क्या फ़ैसले को सामान्य संस्थागत या प्रशासनिक मामले की तरह पेश किया गया, जबकि उसका असली परिणाम अनुसूचित जातियों को प्रभावित करने वाला बड़ा नीतिगत बदलाव था।
इन्हीं सवालों के आधार पर संगठन ने राहुल गांधी से दखल का अनुरोध किया है। वह चाहता है कि राहुल गांधी मंत्री से व्यक्तिगत रूप से बात करें, उनका ध्यान 2007 के विधि सचिव के पत्र की ओर दिलाएँ और मंत्रालय से 7 जुलाई 2023 के निर्णय की पूरी मूल फ़ाइल मँगवाकर जाँचने को कहें, जिसमें एजेंडा, पृष्ठभूमि नोट, नोटिंग, कानूनी राय, अनुमोदन, मिनट्स, पत्राचार और संशोधित दिशानिर्देश शामिल हों।
संगठन का अनुरोध है कि यह परखा जाए कि CPL स्कॉलरशिप का पूर्ण उन्मूलन अनुच्छेद 338(9) के तहत प्रमुख नीतिगत मामला था या नहीं, और CPL को जारी रखने, बदलने, समाप्त करने या बहाल करने के किसी भी अंतिम निर्णय से पहले मामला NCSC को परामर्श के लिए भेजा जाए। जाँच में अगर जानबूझकर चूक, तथ्य छिपाना, सक्षम प्राधिकारी को भ्रमित करना, घोर लापरवाही या संवैधानिक दायित्व की अवहेलना सिद्ध हो, तो संबंधित अधिकारियों पर नियमों के अनुसार कार्रवाई की माँग भी है।
सबसे अहम माँग यह है कि CPL, CHPL और मल्टी-इंजन रेटिंग तथा अनिवार्य फ़्लाइट चार्ज के प्रावधान के साथ स्कॉलरशिप को तुरंत बहाल या पुनर्जीवित किया जाए, जिसमें उपयुक्त पात्रता और संस्थागत सुरक्षा उपाय हों। अंत में संगठन ने 2023 से लंबित 200 CPL/CHPL स्कॉलरशिप का बैकलॉग भरने की माँग भी रखी है।
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