क्या जाति और अस्पृश्यता का कुपोषण से है कोई कनेक्शन? दो प्रोफेसरों की यह रिसर्च कर देगी आपको हैरान!

शोध में पाया गया कि जो अनुसूचित जाति के बच्चे विंध्याचल पर्वत के दक्षिण में रहते हैं, वे उत्तर में रहने वाले अपने समकक्षों की तुलना में औसतन 0.24 मानक विचलन अधिक लंबे हैं और उनमें स्टंटिंग की संभावना 7 से 8 प्रतिशत अंक तक कम है जो कि एक अत्यंत महत्वपूर्ण और सांख्यिकीय दृष्टि से सिद्ध अंतर है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि उच्च जाति के हिंदू बच्चों में विंध्याचल के उत्तर और दक्षिण के बीच ऐसा कोई तुलनीय अंतर नहीं पाया गया।
शोध में माना गया कि जिस तरह अमेरिका में अश्वेत और श्वेत समुदायों के बीच सामाजिक-आर्थिक स्थिति में समानता के बावजूद स्वास्थ्य असमानताएँ बनी रहती हैं, उसी तरह भारत में SC समुदाय के लिए जाति-आधारित भेदभाव, सामाजिक बहिष्करण और मनोसामाजिक तनाव बाल स्वास्थ्य को प्रभावित करते रहते हैं।
शोध में माना गया कि जिस तरह अमेरिका में अश्वेत और श्वेत समुदायों के बीच सामाजिक-आर्थिक स्थिति में समानता के बावजूद स्वास्थ्य असमानताएँ बनी रहती हैं, उसी तरह भारत में SC समुदाय के लिए जाति-आधारित भेदभाव, सामाजिक बहिष्करण और मनोसामाजिक तनाव बाल स्वास्थ्य को प्रभावित करते रहते हैं। ग्राफिक- आसिफ निसार/ द मूकनायक
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नई दिल्ली- भारत में बाल कुपोषण की समस्या केवल गरीबी या खराब स्वास्थ्य सेवाओं तक सीमित नहीं है, इसकी जड़ें सदियों पुरानी जाति व्यवस्था और अस्पृश्यता (छूआछूत) जैसी सामाजिक कुप्रथाओं में भी गहरी धँसी हुई हैं। यह चौंकाने वाला निष्कर्ष अशोका विश्वविद्यालय की प्रोफेसर अश्विनी देशपांडे और मोनाश यूनिवर्सिटी मलेशिया के प्रोफेसर राजेश रामचंद्रन के एक हालिया शोध में सामने आया है। यह शोध-पत्र प्रतिष्ठित अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका Journal of Economic Behavior and Organization में वर्ष 2025 में प्रकाशित हुआ है। हाल ही अशोका विश्वविद्यालय के आर्थिक एवं डेटा विश्लेषण केंद्र द्वारा इसपर लेख प्रकाशित किया गया।

शोधकर्ताओं ने अपना अध्ययन भारत सरकार के राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-4), 2015-16 के आँकड़ों पर आधारित किया है। इस सर्वेक्षण में पाँच वर्ष से कम आयु के 2,30,898 बच्चों के शारीरिक माप और जाति संबंधी जानकारी उपलब्ध है। शोध में विशेष रूप से 45,924 अनुसूचित जाति (SC) और 29,132 उच्च जाति हिंदू (UC-Hindu) बच्चों का तुलनात्मक अध्ययन किया गया, जिनकी आयु 0 से 59 महीने के बीच थी।

शोध के अनुसार, स्टंटिंग (Stunting) यानी उम्र के अनुपात में कद का बेहद कम होना, दीर्घकालिक कुपोषण का सबसे स्पष्ट संकेत है। यह स्थिति बच्चे के मस्तिष्क विकास, शैक्षणिक क्षमता और वयस्क जीवन में आर्थिक अवसरों को गहराई से प्रभावित करती है। भारत में पाँच वर्ष से कम आयु के लगभग एक-तिहाई बच्चे स्टंटिंग के शिकार हैं, एक ऐसी स्थिति जो मानव पूँजी विकास के लिए दूरगामी और गंभीर परिणाम लेकर आती है।

शोध के निष्कर्ष स्पष्ट रूप से बताते हैं कि अनुसूचित जाति के बच्चों में स्टंटिंग की दर उच्च जाति हिंदू बच्चों की तुलना में लगभग 50 प्रतिशत अधिक है। आँकड़ों के अनुसार, जहाँ SC बच्चों में स्टंटिंग की दर 43 प्रतिशत है, वहीं उच्च जाति हिंदू बच्चों में यह केवल 29 प्रतिशत है। ऊँचाई के मापदंड पर भी यह अंतर साफ दिखता है - UC-Hindu बच्चों का औसत हाइट-फॉर-एज Z-स्कोर -1.12 है, जबकि SC बच्चों का यह स्कोर -1.64 है। यानी SC बच्चे औसतन अपने उच्च जाति समकक्षों से आधे मानक विचलन से भी अधिक छोटे हैं। यह अंतर बच्चे की उम्र के हर महीने में, 0 से 60 महीने तक, लगातार बना रहता है।

शोधकर्ताओं ने देश के 585 जिलों के आँकड़ों का विश्लेषण किया। SC बच्चों के लिए 467 जिलों और UC-Hindu बच्चों के लिए 369 जिलों के डेटा का अध्ययन किया गया। इस विश्लेषण से सामने आया कि SC बच्चों के मामले में 55 प्रतिशत जिलों में स्टंटिंग की दर 40 प्रतिशत से ऊपर है, जबकि UC-Hindu बच्चों के लिए केवल 15 प्रतिशत जिलों में ऐसी स्थिति है। इसके विपरीत, SC बच्चों में केवल 15 प्रतिशत जिलों में स्टंटिंग दर 30 प्रतिशत से कम है, जबकि UC-Hindu बच्चों में 54 प्रतिशत जिलों में स्टंटिंग 30 प्रतिशत से नीचे है।

बच्चों के बौनेपन से संबंधित आंकड़े राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-IV, 2015-16 से लिए गए हैं। भारित जिला स्तरीय औसत दर्शाए गए हैं, जहां रंग की तीव्रता बढ़ने के साथ प्रसार भी बढ़ता है। पतली और मोटी काली रेखाएं क्रमशः जिले और राज्य की सीमाओं को दर्शाती हैं। केवल उन्हीं जिलों को दर्शाया गया है जिनमें कम से कम 25 ऑब्जरवेशन हैं। प्रति जिले ऑब्जरवेशन/अवलोकनों की औसत संख्या 167 है।
बच्चों के बौनेपन से संबंधित आंकड़े राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-IV, 2015-16 से लिए गए हैं। भारित जिला स्तरीय औसत दर्शाए गए हैं, जहां रंग की तीव्रता बढ़ने के साथ प्रसार भी बढ़ता है। पतली और मोटी काली रेखाएं क्रमशः जिले और राज्य की सीमाओं को दर्शाती हैं। केवल उन्हीं जिलों को दर्शाया गया है जिनमें कम से कम 25 ऑब्जरवेशन हैं। प्रति जिले ऑब्जरवेशन/अवलोकनों की औसत संख्या 167 है।

शोध में बिहार, छत्तीसगढ़, झारखंड, मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश जिन्हें सामूहिक रूप से 'बीमारू' BIMARU क्षेत्र कहा जाता है, में स्थिति सबसे गंभीर पाई गई। यह क्षेत्र पूरे सर्वेक्षण के कुल नमूने का 50.8 प्रतिशत हिस्सा है। इस क्षेत्र के 220 में से 180 जिलों यानी 82 प्रतिशत जिलों में SC बच्चों में स्टंटिंग की दर 40 प्रतिशत से अधिक है। 99 जिलों यानी 45 प्रतिशत जिलों में तो आधे से भी अधिक SC बच्चे स्टंटिंग के शिकार हैं। दूसरी ओर, इसी क्षेत्र में UC-Hindu बच्चों में केवल 20 प्रतिशत जिलों में स्टंटिंग 40 प्रतिशत से ऊपर है। दक्षिणी भारत में यह स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर है, जहाँ केवल 24 प्रतिशत जिलों में SC बच्चों में स्टंटिंग 40 प्रतिशत से अधिक है।

विंध्याचल पर्वत: एक ऐतिहासिक और सामाजिक विभाजक रेखा

प्रोफेसर देशपांडे और प्रोफेसर रामचंद्रन ने अपने शोध का सबसे महत्वपूर्ण और मौलिक पहलू विंध्याचल पर्वत श्रृंखला को बनाया। शोधकर्ताओं के अनुसार, ऐतिहासिक रूप से विंध्याचल के उत्तर का क्षेत्र "आर्यावर्त" के नाम से जाना जाता था, जिसे मनुस्मृति (2.22) में हिमालय और विंध्य के बीच की भूमि के रूप में परिभाषित किया गया है। यह क्षेत्र वैदिक काल (लगभग 1500-600 ईसा पूर्व) से ही हिंदू धर्म और जाति व्यवस्था का सांस्कृतिक केंद्र रहा है। विंध्याचल पर्वत ने ऐतिहासिक रूप से आर्य-प्रभावित क्षेत्र और गैर-आर्य क्षेत्रों के बीच एक सीमा का काम किया। इसी कारण अस्पृश्यता और जाति-आधारित भेदभाव की जड़ें उत्तर में अधिक गहरी हैं।

इस ऐतिहासिक साक्ष्य को समकालीन आँकड़े भी समर्थन देते हैं। भारतीय मानव विकास सर्वेक्षण (IHDS-II), 2011-12 के आँकड़ों के विश्लेषण से पता चलता है कि मध्य भारत और उत्तर-मध्य मैदानी क्षेत्रों में क्रमशः 49 प्रतिशत और 40 प्रतिशत परिवार छूआछूत की प्रथा अपनाने की बात स्वीकार करते हैं। इसके विपरीत, दक्षिणी राज्यों में केवल 17 प्रतिशत परिवार ऐसा करते हैं।

शाह एवं अन्य (2006) के एक अध्ययन के हवाले से बताया गया है कि ग्रामीण भारत में सर्वेक्षण किए गए 348 गाँवों में से 74 में दलितों को निजी स्वास्थ्य क्लीनिकों में प्रवेश नहीं दिया गया। 30-40 प्रतिशत गाँवों में सार्वजनिक स्वास्थ्य कर्मियों ने दलित बस्तियों में जाने से इनकार किया, और 15-20 प्रतिशत गाँवों में दलितों को सार्वजनिक स्वास्थ्य केंद्रों में प्रवेश तक नहीं मिला।

शोधकर्ताओं ने एक सुव्यवस्थित सांख्यिकीय पद्धति-- Difference-in-Differences (DID) का उपयोग किया, जिसमें विंध्याचल पर्वत के 100 किलोमीटर उत्तर और 100 किलोमीटर दक्षिण में रहने वाले SC और UC-Hindu बच्चों की तुलना की गई। यह पद्धति इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह एक ही राज्य के भीतर तुलना करती है, जिससे आर्थिक, भौगोलिक और प्रशासनिक कारकों के प्रभाव को अलग किया जा सकता है।

परिणाम अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। विंध्याचल के 100 किलोमीटर के दायरे में रहने वाले SC बच्चे UC-Hindu बच्चों की तुलना में 21 प्रतिशत अंक यानी लगभग 70 प्रतिशत अधिक स्टंटिंग के शिकार हैं। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह है कि विंध्याचल के दक्षिण में रहने वाले SC बच्चों में स्टंटिंग की संभावना उत्तर में रहने वाले SC बच्चों की तुलना में करीब 8 प्रतिशत अंक कम है। यह अंतर सांख्यिकीय दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है और आर्थिक दृष्टि से भी। ऊँचाई के मामले में भी विंध्याचल के दक्षिण में रहने वाले SC बच्चे उत्तर के अपने समकक्षों की तुलना में औसतन 0.24 मानक विचलन यानी लगभग 30 प्रतिशत अधिक लंबे हैं।

दूसरी ओर, UC-Hindu बच्चों के लिए विंध्याचल के उत्तर या दक्षिण में रहने से कोई सांख्यिकीय अंतर नहीं पड़ता। यानी भौगोलिक स्थिति का लाभ सार्वभौमिक नहीं है, बल्कि यह विशेष रूप से SC बच्चों तक सीमित है जो इस बात का प्रमाण है कि जाति-आधारित भेदभाव ही इस अंतर का मूल कारण है।

अस्पृश्यता और बाल स्वास्थ्य का सीधा संबंध

शोध में छूआछूत की प्रथा और बच्चों की ऊँचाई के बीच सीधे संबंध का भी विश्लेषण किया गया है। राज्य स्तरीय आँकड़ों का उपयोग करते हुए शोधकर्ताओं ने पाया कि जिन राज्यों में अस्पृश्यता की प्रथा अधिक प्रचलित है, वहाँ SC बच्चों का हाइट-फॉर-एज Z-स्कोर तेजी से कम होता जाता है और स्टंटिंग बढ़ती जाती है। इसके विपरीत, UC-Hindu बच्चों पर अस्पृश्यता की प्रथा का कोई ऐसा प्रभाव नहीं दिखता।

शोध में स्वास्थ्य सेवाओं में भेदभाव के ठोस साक्ष्य भी प्रस्तुत किए गए हैं। शाह एवं अन्य (2006) के एक अध्ययन के हवाले से बताया गया है कि ग्रामीण भारत में सर्वेक्षण किए गए 348 गाँवों में से 74 में दलितों को निजी स्वास्थ्य क्लीनिकों में प्रवेश नहीं दिया गया। 30-40 प्रतिशत गाँवों में सार्वजनिक स्वास्थ्य कर्मियों ने दलित बस्तियों में जाने से इनकार किया, और 15-20 प्रतिशत गाँवों में दलितों को सार्वजनिक स्वास्थ्य केंद्रों में प्रवेश तक नहीं मिला। आचार्य (2010) के गुजरात और राजस्थान के 200 दलित बच्चों पर किए गए अध्ययन के अनुसार, 91 प्रतिशत दलित बच्चों ने दवाएँ पाने में भेदभाव का अनुभव किया, 94 प्रतिशत ने बताया कि ANM ने उनके घर आने से मना कर दिया, और 93 प्रतिशत ने कहा कि स्वास्थ्य कर्मियों ने दवाएँ देते समय दलित बच्चों को छूने से परहेज किया।

आर्थिक कारण नहीं, जाति है असली वजह: वैधता परीक्षण

शोधकर्ताओं ने यह सुनिश्चित करने के लिए कई सत्यापन परीक्षण (validation exercises) किए कि देखा गया अंतर केवल आर्थिक असमानता का परिणाम न हो। जब परिवार के धन सूचकांक (Wealth Index) और "विंध्याचल के दक्षिण में रहने" के बीच की अंतःक्रिया का परीक्षण किया गया, तो पाया गया कि यह अंतःक्रिया सांख्यिकीय दृष्टि से महत्वहीन है। अर्थात् आर्थिक स्थिति इस उत्तर-दक्षिण विभाजन की व्याख्या नहीं कर सकती। SC और "विंध्याचल के दक्षिण" की अंतःक्रिया का प्रभाव बड़ा और सांख्यिकीय दृष्टि से महत्वपूर्ण बना रहा।

इसके अलावा, अनुसूचित जनजाति (ST) के बच्चों पर किए गए परीक्षण में पाया गया कि ST बच्चे SC बच्चों जितने ही आर्थिक रूप से वंचित हैं, लेकिन उन पर विंध्याचल के उत्तर-दक्षिण स्थान का कोई सांख्यिकीय प्रभाव नहीं पड़ता क्योंकि ST पारंपरिक रूप से जाति-आधारित भेदभाव के दायरे में नहीं आते। इसी तरह, UC-Muslims के लिए भी कोई महत्वपूर्ण उत्तर-दक्षिण प्रभाव नहीं मिला। हालाँकि SC-Muslims के लिए एक सकारात्मक प्रभाव देखा गया, जो कि अपेक्षित भी था क्योंकि SC-Muslims अक्सर हिंदू धर्म से धर्म परिवर्तन किए हुए पूर्व SC होते हैं और जाति-आधारित कलंक का अनुभव करते रहते हैं।

शोधकर्ताओं ने एक और महत्वपूर्ण परीक्षण किया: विंध्याचल सीमा को कृत्रिम रूप से उत्तर या दक्षिण की ओर खिसकाकर देखा गया कि क्या वहाँ भी ऐसा ही प्रभाव दिखता है। जब तुलना पूरी तरह विंध्याचल के उत्तर में रहते हुए की गई और जब पूरी तरह दक्षिण में रहते हुए की गई , दोनों ही मामलों में कोई सांख्यिकीय प्रभाव नहीं मिला। यह साबित करता है कि जो प्रभाव देखा गया, वह किसी भी मनमाने भौगोलिक विभाजन से नहीं, बल्कि विशेष रूप से विंध्याचल पर्वत की ऐतिहासिक और सामाजिक सीमा से जुड़ा हुआ है।

शोध में यह भी पड़ताल की गई कि क्या माँ की शिक्षा, उसका स्वास्थ्य, घरेलू आर्थिक स्थिति, खुले में शौच, पेयजल की गुणवत्ता और अन्य सामाजिक कारक इस उत्तर-दक्षिण विभाजन को समझा सकते हैं। इन सभी कारकों को एक साथ जोड़ने पर SC और UC-Hindu बच्चों के बीच का औसत अंतर 23 प्रतिशत अंक से घटकर 11 प्रतिशत अंक पर आ गया। माँ की ऊँचाई, एनीमिया की स्थिति, शिक्षा के वर्ष, घरेलू धन और खुले में शौच जैसे कारक कुपोषण से महत्वपूर्ण रूप से जुड़े पाए गए। लेकिन इन सभी कारकों को नियंत्रित करने के बाद भी, "SC × विंध्याचल के दक्षिण" का DID प्रभाव केवल 7.7 प्रतिशत अंक से घटकर 5 प्रतिशत अंक पर आया और यह परिवर्तन सांख्यिकीय दृष्टि से महत्वपूर्ण नहीं था। इसका अर्थ है कि सामाजिक-आर्थिक और सार्वजनिक स्वास्थ्य कारक भले ही आंशिक रूप से अंतर कम करते हैं, लेकिन वे उत्तर-दक्षिण के इस स्थायी विभाजन की पूरी व्याख्या करने में असमर्थ हैं।
आचार्य (2010) के गुजरात और राजस्थान के 200 दलित बच्चों पर किए गए अध्ययन के अनुसार, 91 प्रतिशत दलित बच्चों ने दवाएँ पाने में भेदभाव का अनुभव किया, 94 प्रतिशत ने बताया कि ANM ने उनके घर आने से मना कर दिया, और 93 प्रतिशत ने कहा कि स्वास्थ्य कर्मियों ने दवाएँ देते समय दलित बच्चों को छूने से परहेज किया।

शोध में यह भी जाँचा गया कि क्या आँगनवाड़ी/ICDS सेवाओं का लाभ, प्रसव पूर्व जाँच, संस्थागत प्रसव, स्तनपान की अवधि, बच्चे को दिया जाने वाला आहार (अंडे, फल, दही), और टीकाकरण कार्यक्रम इस अंतर को समझाते हैं। परिणाम स्पष्ट रहे — इन सभी सेवाओं को नियंत्रित करने के बाद भी "SC × विंध्याचल के दक्षिण" का प्रभाव न केवल बना रहा, बल्कि कुछ मामलों में थोड़ा और मजबूत हो गया।

Summary

शोधकर्ताओं ने इन निष्कर्षों को अमेरिका में नस्लीय स्वास्थ्य असमानताओं से जोड़ा है। जिस तरह अमेरिका में अश्वेत और श्वेत समुदायों के बीच सामाजिक-आर्थिक स्थिति में समानता के बावजूद स्वास्थ्य असमानताएँ बनी रहती हैं, उसी तरह भारत में SC समुदाय के लिए जाति-आधारित भेदभाव, सामाजिक बहिष्करण और मनोसामाजिक तनाव बाल स्वास्थ्य को प्रभावित करते रहते हैं। शोधकर्ताओं के अनुसार, इन परिणामों से यह भी सिद्ध होता है कि SC बच्चों के लगभग आधे हिस्से के स्टंटिंग के शिकार होने के कारण उनके वयस्क जीवन में संज्ञानात्मक, शैक्षणिक, स्वास्थ्य और आर्थिक क्षमता पर गहरा नकारात्मक असर पड़ता है और यह पीढ़ी दर पीढ़ी चलता रहता है।

शोधकर्ताओं ने बहुआयामी नीतिगत हस्तक्षेप की माँग की है जो केवल भौतिक असमानताओं को नहीं, बल्कि गहरी सामाजिक संरचनाओं को भी लक्षित करे। मातृ स्वास्थ्य और शिक्षा में निवेश, स्वच्छता अवसंरचना में सुधार, और जाति-भेद विरोधी कानूनों को प्रभावी ढंग से लागू करना, ये सभी कदम बाल कुपोषण से लड़ाई में अनिवार्य बताए गए हैं।

पूरी रिपोर्ट यहाँ पढें:

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Discriminatory social norms and early childhood development
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शोध में माना गया कि जिस तरह अमेरिका में अश्वेत और श्वेत समुदायों के बीच सामाजिक-आर्थिक स्थिति में समानता के बावजूद स्वास्थ्य असमानताएँ बनी रहती हैं, उसी तरह भारत में SC समुदाय के लिए जाति-आधारित भेदभाव, सामाजिक बहिष्करण और मनोसामाजिक तनाव बाल स्वास्थ्य को प्रभावित करते रहते हैं।
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