जातिसूचक गाली सुनने वाले मौजूद हों तो निजी स्थान भी सार्वजनिक दृष्टि में: SC/ST एक्ट पर केरल हाईकोर्ट का अहम फैसला

SC/ST अत्याचार मामले में अग्रिम जमानत से किया इनकार, कहा- प्रथम दृष्टया बनता है जातिसूचक अपमान का मामला
अदालत ने कहा कि, "जब पीड़ित को अपमानित और अपमानित करने वाले अपशब्दों को सुनने के लिए जनता या तीसरे पक्ष की उपस्थिति होती है, तो निजी स्थान भी सार्वजनिक दृष्टि में आ जाता है।"
अदालत ने कहा कि, "जब पीड़ित को अपमानित और अपमानित करने वाले अपशब्दों को सुनने के लिए जनता या तीसरे पक्ष की उपस्थिति होती है, तो निजी स्थान भी सार्वजनिक दृष्टि में आ जाता है।"एआई निर्मित इमेज
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कोच्चि- केरल हाईकोर्ट ने अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत दर्ज एक मामले में दो आरोपियों को अग्रिम जमानत देने से इनकार कर दिया है। जस्टिस ए. बदरुद्दीन ने कहा कि उपलब्ध रिकॉर्ड और गवाहों के बयानों के आधार पर प्रथम दृष्टया SC/ST (PoA) Act के तहत अपराध बनता है, इसलिए अधिनियम की धारा 18 के तहत अग्रिम जमानत पर रोक लागू होगी।

मामला त्रिशूर जिले के वलप्पाड पुलिस स्टेशन में दर्ज अपराध संख्या 420/2026 से संबंधित है। आरोपियों भगीश पूरादन और श्रीजीत ने विशेष SC/ST अदालत, त्रिशूर द्वारा उनकी अग्रिम जमानत याचिका खारिज किए जाने के आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।

अभियोजन के अनुसार 6 मई की शाम लगभग 7:30 बजे आरोपी छह अन्य व्यक्तियों के साथ कथित रूप से पीडिता के घर के आंगन में घुसे और विस्फोटक पदार्थों का उपयोग कर धमाका किया। धमाके की आवाज सुनकर जब पीड़िता बाहर आईं, तब पहले आरोपी ने कथित तौर पर उनकी जाति ‘वेट्टुवा’ का नाम लेकर अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल किया। शिकायत में बताया गया कि आरोपियों ने पीड़िता और उनके पति को जान से मारने तथा इलाके में शांति से नहीं रहने देने की धमकी भी दी।

अदालत ने कहा कि पीड़िता के बयान का समर्थन उनके पति, माता तथा अन्य गवाहों के बयानों से भी होता है। न्यायालय ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया कि आरोपियों को पीड़िता की जातीय पहचान की जानकारी नहीं थी। अदालत ने रिकॉर्ड का हवाला देते हुए कहा कि दोनों पक्ष एक-दूसरे को लंबे समय से जानते थे और पहले एक ही राजनीतिक दल में सक्रिय थे।

18 जून के अपने आदेश में हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा, "जब आरोपी और पीड़ित लंबे समय से एक-दूसरे को जानते हों तथा एक ही राजनीतिक दल में साथ काम कर चुके हों, तब इस स्तर पर यह मानना सुरक्षित है कि आरोपी पीड़िता की जातीय पहचान से परिचित थे।"

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि "‘सार्वजनिक दृष्टि’ (Public View) का अर्थ केवल सार्वजनिक स्थान नहीं है। यदि किसी निजी स्थान पर अन्य लोग मौजूद हों और वे जातिसूचक अपमानजनक शब्द सुन सकें, तो वह स्थान भी ‘पब्लिक व्यू’ की श्रेणी में आ सकता है।"

न्यायालय ने आगे कहा कि "जब एक से अधिक आरोपी मिलकर किसी व्यक्ति को अपमानित और भयभीत करने का प्रयास करते हैं, तब उनकी उपस्थिति भी ऐसे कथित कृत्य को सार्वजनिक दृष्टि में घटित माना जाने के लिए पर्याप्त हो सकती है।"

न्यायालय ने कई पूर्व निर्णयों का हवाला दिया, जिनमें xxxx बनाम केरल राज्य और अन्य [2022(6) केएचसी 672] का निर्णय शामिल है, जिसमें कहा गया था कि एससी/एसटी अधिनियम की धारा 3(2)(वीए) के तहत अपराध पर विचार करते समय "जानना" या "ज्ञान" शब्द साक्ष्यों के आधार पर निर्धारित किया जाना चाहिए।

न्यायालय ने अब्बास आर.वी. बनाम केरल राज्य [2022 केएचसी 745] और राजू जोसेफ बनाम केरल राज्य [2024 केएचसी 7090] का भी उल्लेख किया, जो एससी/एसटी अधिनियम की धारा 8(सी) के तहत आरोपी के पीड़ित की जातिगत पहचान के ज्ञान के संबंध में अनुमान से संबंधित हैं।

अदालत ने पाया कि प्रथम दृष्टया SC/ST अत्याचार निवारण अधिनियम की धारा 3(1)(s) तथा धारा 3(2)(va) के तत्व मौजूद हैं। इसी आधार पर विशेष अदालत द्वारा धारा 18 के तहत अग्रिम जमानत पर रोक लागू करने का निर्णय सही माना गया।

सुनवाई के दौरान जांच अधिकारी की रिपोर्ट भी अदालत के समक्ष प्रस्तुत की गई, जिसमें बताया गया कि दोनों आरोपियों के खिलाफ पूर्व में भी कई आपराधिक मामले दर्ज रहे हैं। अदालत ने इन आपराधिक पृष्ठभूमि संबंधी तथ्यों को भी ध्यान में रखा।

अंततः हाईकोर्ट ने अपील खारिज करते हुए कहा कि विशेष अदालत का आदेश हस्तक्षेप योग्य नहीं है। न्यायालय ने दोनों आरोपियों को तत्काल जांच अधिकारी के समक्ष आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया तथा कहा कि ऐसा नहीं करने पर पुलिस उन्हें गिरफ्तार करने के लिए स्वतंत्र होगी।

(Citation: 2026 LiveLaw (Ker) 341)

अदालत ने कहा कि, "जब पीड़ित को अपमानित और अपमानित करने वाले अपशब्दों को सुनने के लिए जनता या तीसरे पक्ष की उपस्थिति होती है, तो निजी स्थान भी सार्वजनिक दृष्टि में आ जाता है।"
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अदालत ने कहा कि, "जब पीड़ित को अपमानित और अपमानित करने वाले अपशब्दों को सुनने के लिए जनता या तीसरे पक्ष की उपस्थिति होती है, तो निजी स्थान भी सार्वजनिक दृष्टि में आ जाता है।"
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अदालत ने कहा कि, "जब पीड़ित को अपमानित और अपमानित करने वाले अपशब्दों को सुनने के लिए जनता या तीसरे पक्ष की उपस्थिति होती है, तो निजी स्थान भी सार्वजनिक दृष्टि में आ जाता है।"
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