
नई दिल्ली- सुप्रीम कोर्ट ने 11 मई को एक फैसले में कहा कि यदि जातिसूचक गाली या अपमान किसी निजी आवास के भीतर हुआ हो और वह "सार्वजनिक दृष्टि" (public view) में न आता हो, तो अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 की धाराएं 3(1)(r) और 3(1)(s) के अंतर्गत कोई अपराध नहीं बनता। जस्टिस एन.वी. अंजारिया और जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा की खंडपीठ ने गुंजन @ गिरिजा कुमारी बनाम दिल्ली राज्य (NCT) मामले में दिल्ली हाईकोर्ट के आदेश को पलटते हुए आरोपियों के विरुद्ध दर्ज FIR एवं चार्जशीट को रद्द कर दिया।
यह विवाद दिल्ली के किर्ती नगर थाना क्षेत्र में एक पारिवारिक संपत्ति विवाद से जन्मा था। शिकायतकर्ता और आरोपी आपस में परिजन हैं। 28 जनवरी 2021 को अनुसूचित जाति से ताल्लुक रखने वाले शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि आरोपी गिरिजा कुमारी ने उन्हें "चूड़ा", "चमार", "हरिजन" जैसे अपमानजनक जातिसूचक शब्दों से संबोधित किया और अन्य आरोपियों ने धमकियां दीं। FIR संख्या 42/2021 किर्ती नगर पुलिस स्टेशन में दर्ज की गई थी। ट्रायल कोर्ट ने SC/ST Act की धाराओं के तहत आरोप तय किए और दिल्ली हाईकोर्ट ने भी उस फैसले को बरकरार रखा, जिसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।
शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि SC/ST Act की धारा 3(1)(r) और 3(1)(s) के तहत अपराध तब ही बनता है जब अपमान या जातिसूचक गाली "सार्वजनिक दृष्टि वाले किसी स्थान पर" (in any place within public view) दी गई हो। न्यायालय ने कहा कि घटना का स्थान रमेश नगर, नई दिल्ली स्थित एक आवासीय मकान था और FIR में कहीं भी यह नहीं बताया गया कि कोई स्वतंत्र जन-सदस्य उस समय मौजूद था या घटना सार्वजनिक दृष्टि में थी। FIR के बिंदु 5(b) और 6(e) दोनों में उसी आवासीय पते का उल्लेख था।
अदालत ने अपने पूर्व के निर्णयों - स्वर्ण सिंह बनाम राज्य (2008), हितेश वर्मा बनाम उत्तराखंड राज्य (2020) और करुप्पुदयार बनाम राज्य (2025) का हवाला देते हुए कहा कि "सार्वजनिक दृष्टि" का अर्थ है कि घटना ऐसे स्थान पर हो जहां आम नागरिक उसे देख या सुन सकें। चारदीवारी के भीतर हुई घटना, जहां आम जनता की पहुंच न हो, इस शर्त को पूरा नहीं करती।
इसके साथ ही न्यायालय ने IPC की धारा 506 (आपराधिक धमकी) और धारा 34 (साझा आशय) के तहत लगाए गए आरोपों को भी निरस्त कर दिया, यह कहते हुए कि शिकायत की सामग्री से न तो "अलार्म का आशय" और न ही "साझा आपराधिक इरादा" सिद्ध होता है।
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार यह फैसला दो प्रमुख सिद्धांतों को पुनः स्थापित करता है: पहला, SC/ST Act की धाराओं के तहत "सार्वजनिक दृष्टि" शर्त की अनिवार्यता; और दूसरा, यह आवश्यकता कि FIR और सहायक चार्जशीट में अभियोजन शुरू होने से पहले सभी वैधानिक तत्व स्पष्ट रूप से उजागर होने चाहिए। हालांकि, सार्वजनिक स्थानों पर की गई वास्तविक जातिगत अपमान की घटनाएं अभी भी पूरी तरह दंडनीय हैं।
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले ने दलित और बहुजन संगठनों में गहरी बेचैनी पैदा कर दी है। उनका कहना है कि जातिगत उत्पीड़न अक्सर घरों की चारदीवारी के भीतर ही होता है, जहां कोई बाहरी गवाह नहीं होता। ऐसे में "सार्वजनिक दृष्टि" की शर्त को अनिवार्य बना देना व्यावहारिक रूप से पीड़ितों के लिए न्याय के दरवाजे बंद कर देता है। सामाजिक न्याय के पैरोकारों का तर्क है कि घर की चारदीवारी के अंदर होने वाला जातीय अपमान कम पीड़ादायक नहीं होता।
अम्बेडकरवादी एक्टिविस्ट रवि परमार कहते हैं, " कल को कोई मनुवादी दलित व्यक्ति को जबरजस्ती किडनैप करके अपने निजी घर में ले जाएगा और जाति सूचक गाली देकर अपमानित करेगा तो उसे SC ST एक्ट के तहत् अपराध नहीं माना जाएगा, गज़ब है जब तक कॉलेजियम व्यवस्था है दलित आदिवासी के अधिकारों पर हमले होते रहेंगे यह तय है ।"
बहुजन विचारक रवि रत्न कहते हैं, " खैरलांजी में ज़ुल्म सबके सामने हुआ। पीडिता और उसकी बेटी के साथ रेप किया गया, उन्हें बिना कपड़ों के घुमाया गया और बुरी तरह से गालियां दी गईं और मार दिया गया। पीडिता के पुत्र और एक और युवक को दिनदहाड़े मार दिया गया। लेकिन कोर्ट ने फैसला सुनाया कि हत्याएं बदले की भावना से की गई थीं और जाति से जुड़ी नहीं थीं, इसलिए कोई SC ST एक्ट नहीं लगा।"
एंटी कास्ट एक्टिविस्ट डॉ रेहना रवीन्द्रन कहती हैं, " इसे ऐसे पढ़ें- अगर मर्डर प्राइवेट घर के अंदर हुआ तो कोई गलती नहीं। अगर रेप प्राइवेट घर के अंदर हुआ तो कोई गलती नहीं। अगर पति प्राइवेट घर के अंदर अपनी पत्नी को पीटता है तो कोई गलती नहीं। तो, क्या आप इन बातों में छिपी बेवकूफी को समझते हैं? पूर्वाग्रह से ग्रसित जातिवादी लोग शेड्यूल कास्ट और शेड्यूल ट्राइब्स को मिली कानूनी सुरक्षा को कमज़ोर करने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं।"
यह पहली बार नहीं है जब SC/ST एक्ट पर सुप्रीम कोर्ट के किसी फैसले पर राजनीतिक और सामाजिक विरोध हुआ है। 2018 में, इसी एक्ट के तहत गिरफ्तारी के प्रावधानों को कोर्ट के कमजोर करने पर देश भर में विरोध प्रदर्शन हुए, भारत बंद हुआ और कई प्रदर्शनकारियों की मौत हो गई, जिसके बाद संसद ने बदलाव के ज़रिए मूल प्रावधानों को बहाल करने के लिए दखल दिया। CPI(M) ने उस मौके पर भी फैसले को "पीछे ले जाने वाला" कहा था और केंद्र सरकार से तुरंत रिव्यू पिटीशन की मांग की थी। 2026 के फैसले को अब आलोचक एक्ट के सुरक्षा प्रावधानों को कम करने के लगातार न्यायिक ट्रेंड के हिस्से के तौर पर देख रहे हैं।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) की पोलित ब्यूरो ने सुप्रीम कोर्ट की दो-न्यायाधीशों की पीठ द्वारा दिए गए फैसले पर गहरी चिंता व्यक्त की है। पार्टी ने कहा कि गिरिजा कुमारी एवं अन्य बनाम दिल्ली राज्य मामले में सुप्रीम कोर्ट ने एक संकीर्ण और केवल कानूनी तकनीकीयता पर आधारित नजरिया अपनाते हुए FIR और चार्जशीट को रद्द करने का आदेश दिया, जो अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है। पोलित ब्यूरो ने कहा कि यह फैसला कई कारणों से चिंताजनक है एक तो यह ऐसे समय में आया है जब देश के अधिकांश हिस्सों में SC और ST समुदायों के खिलाफ अत्याचार की घटनाएं तेजी से बढ़ रही हैं, और दूसरा यह फैसला सुप्रीम कोर्ट के उन फैसलों की लंबी कड़ी में नवीनतम है जो इन समुदायों के अधिकारों पर प्रतिकूल प्रभाव डालते हैं। पार्टी ने आशंका जताई कि यदि इस फैसले को वापस नहीं लिया गया, तो घरों, दफ्तरों, स्कूलों, कॉलेजों और अन्य स्थानों पर SC-ST व्यक्तियों के साथ अपमानजनक व्यवहार की घटनाएं और बढ़ेंगी, क्योंकि उत्पीड़क यह मान लेंगे कि कानून उनके खिलाफ कुछ नहीं कर सकता। CPI(M) ने केंद्र सरकार से तत्काल हस्तक्षेप करने और सुप्रीम कोर्ट से इस फैसले पर पुनर्विचार करने की अपील करने की मांग की है।
कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया के महासचिव और पूर्व सांसद डी.राजा ने फैसला की आलोचना करते हुए कहा, " इस तरह की व्याख्या से भारत में जातिगत उत्पीड़न की वास्तविकताओं को अनदेखा करने का खतरा है। जातिगत भेदभाव और हिंसा केवल सार्वजनिक स्थानों पर ही नहीं होती। मौखिक अपमान, सामाजिक बहिष्कार, अस्पृश्यता प्रथाएं और यहां तक कि शारीरिक हिंसा भी अक्सर घरों, कार्यस्थलों और अन्य निजी स्थानों में होती हैं, जो जातिगत ऊंच-नीच से प्रभावित होते हैं। कोई अपराध केवल इसलिए अपराध नहीं रह जाता क्योंकि वह सार्वजनिक दृष्टि से दूर हुआ हो। ऐसा प्रतीत होता है कि यह फैसला नागरिक अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1955 की भावना को नजरअंदाज करता है, जिसने अस्पृश्यता और जातिवादी प्रथाओं से उत्पन्न सभी प्रकार के भेदभाव को अपराध घोषित किया है। जातिगत उत्पीड़न के खिलाफ संघर्ष के लिए यह समझना आवश्यक है कि जातिगत शक्ति रोजमर्रा की जिंदगी में कैसे काम करती है, जिसमें निजी क्षेत्र भी शामिल हैं जहां पीड़ित सबसे अधिक असुरक्षित और अलग-थलग होते हैं। ऐसे समय में जब देशभर में दलितों और आदिवासियों के खिलाफ अत्याचार बढ़ रहे हैं, कानूनी व्याख्याओं को संवैधानिक सुरक्षा और गरिमा, समानता और सामाजिक न्याय के लिए संघर्ष को मजबूत करना चाहिए, न कि उन्हें संकुचित करना चाहिए।"
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