
जयपुर- राजस्थान हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम, 1989 (SC/ST Act) के तहत विशेष अदालत द्वारा संज्ञान लेने और आरोप तय करने के आदेशों के खिलाफ सीधे धारा 482 सीआरपीसी के तहत शिकायत को निरस्त करने की याचिका दायर नहीं की जा सकती है। ऐसे मामलों में अधिनियम की धारा 14ए के तहत अपील ही सही कानूनी विकल्प है।
धारा 482 दंड प्रक्रिया संहिता (Cr.P.C.), 1973 उच्च न्यायालय की अंतर्निहित शक्तियाँ (inherent powers) हैं, जो अदालत को किसी भी आदेश को रद्द करने या न्याय के हित में आवश्यक आदेश पारित करने का अधिकार देती हैं, ताकि अपनी प्रक्रियाओं का दुरुपयोग रोका जा सके या अदालत की कार्यवाही को न्यायोचित बनाया जा सके।
मामला जयपुर निवासी संदीप कुमार अरोड़ा और उनकी पत्नी अमिता अरोड़ा के बीच के पारिवारिक विवाद से उत्पन्न हुआ। विशेष न्यायाधीश (SC/ST मामले), जयपुर महानगर-II, जयपुर ने 11 अगस्त 2023 और 25 अक्टूबर 2023 के आदेशों के माध्यम से याचिकाकर्ता के खिलाफ धारा 498A भारतीय दंड संहिता (पति या ससुराल वालों द्वारा क्रूरता), SC/ST अधिनियम की धारा 3(1)(r)(s) (जाति के आधार पर अपमान और उत्पीड़न), धारा 3(1)(u) (जाति के आधार पर छेड़छाड़) और धारा 3(1)(2) (जाति के आधार पर अपराध) के तहत संज्ञान लिया था और आरोप तय किए थे ।
इन आदेशों से व्यथित होकर याचिकाकर्ता ने धारा 482 सीआरपीसी के तहत हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया, जो कि अदालत की अंतर्निहित शक्तियों को सक्रिय करने का एक वैकल्पिक उपाय है।
सुनवाई के दौरान प्रतिवादी/ पत्नी की ओर से प्रारंभिक आपत्ति उठाई गई कि यह याचिका स्वीकार्य (मेन्टेनेबल) नहीं है। तर्क दिया गया:
"SC/ST अधिनियम की धारा 14ए के तहत विशेष अदालत के आदेशों के खिलाफ अपील का प्रावधान है। संज्ञान और आरोप-निर्धारण के आदेश अंतरिम (इंटरलोक्यूटरी) नहीं हैं, बल्कि अंतिम प्रकृति के हैं, इसलिए इन्हें चुनौती देने के लिए अपील ही उचित कानूनी मार्ग है।"
यानी, विवाद सिर्फ पारिवारिक कलह का नहीं है, बल्कि कानूनी प्रक्रिया को लेकर है- क्या SC/ST एक्ट के मामलों में संज्ञान/आरोप-निर्धारण के आदेशों के खिलाफ सीधे धारा 482 याचिका चलेगी या नहीं?
न्यायाधीश अनूप कुमार ढांड ने प्रतिवादी की आपत्ति को स्वीकार करते हुए याचिका को खारिज कर दिया। अक्दालत ने कहा:
"यदि कोई क़ानून अपील दायर करने का प्रावधान करता है, तो किसी व्यक्ति को धारा 482 सीआरपीसी के तहत याचिका दायर करके अपीलीय प्राधिकरण के क्षेत्राधिकार को दरकिनार करने की अनुमति नहीं दी जा सकती है।"
धारा 14ए प्रावधान कहता है कि "निर्णय, सजा या आदेश" (जो अंतरिम न हो) के खिलाफ उच्च न्यायालय में अपील की जा सकती है ।
संज्ञान व आरोप-निर्धारण के आदेश अंतरिम नहीं: ये आदेश अभियुक्त के अधिकारों को सीधे प्रभावित करते हैं और मुकदमे की दिशा तय करते हैं। इसलिए ये "अंतरिम" नहीं, बल्कि अंतिम प्रकृति के हैं, और धारा 14ए के तहत अपील योग्य हैं ।
सुप्रीम कोर्ट का हवाला: न्यायालय ने डॉ. आनंद राय बनाम मध्य प्रदेश राज्य (2025 SCC ऑनलाइन Sc 187) के फैसले का हवाला दिया, जिसमें स्पष्ट किया गया कि आरोप तय करने का आदेश अंतरिम नहीं है और धारा 14ए के तहत अपील की जा सकती है।
हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता को सीमा अधिनियम की धारा 14 के तहत आवेदन करने की छूट दी है। यदि वे ऐसा आवेदन करते हैं, तो उस पर कानून के अनुसार विचार किया जाएगा
राजस्थान हाईकोर्ट का यह फैसला SC/ST अधिनियम के तहत कानूनी प्रक्रिया को सुस्पष्ट करने वाला है। इसने स्पष्ट कर दिया कि संज्ञान और आरोप-निर्धारण के आदेशों को सीधे धारा 482 से नहीं, बल्कि धारा 14ए के तहत अपील के माध्यम से चुनौती दी जानी चाहिए। यह निर्णय न केवल अभियुक्तों के लिए बल्कि पीड़ितों के अधिकारों की रक्षा के लिए भी एक महत्वपूर्ण कदम है, क्योंकि यह सुनिश्चित करेगा कि SC/ST अधिनियम के मामलों में सही कानूनी प्रक्रिया का पालन हो और इसका दुरुपयोग न हो ।
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