
भोपाल। मध्य प्रदेश में अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के तहत दर्ज मामलों की लंबित स्थिति चिंता का विषय बनती जा रही है। प्रदेश की विभिन्न अदालतों में इस कानून से जुड़े कुल 5,423 मामले ऐसे हैं, जो पांच साल से अधिक समय से लंबित पड़े हुए हैं। सबसे अधिक लंबित प्रकरण जबलपुर जिले में दर्ज किए गए हैं, जहां 909 मामले वर्षों से न्याय की प्रतीक्षा कर रहे हैं।
इन आंकड़ों ने न्यायिक प्रक्रिया की धीमी गति और पीड़ितों को समय पर न्याय नहीं मिलने की स्थिति को उजागर कर दिया है। लगातार बढ़ रही पेंडेंसी को देखते हुए अब मध्य प्रदेश सरकार और लोक अभियोजन विभाग सक्रिय हो गया है। हाल ही में लोक अभियोजन संचालनालय भोपाल द्वारा सभी जिला अभियोजन अधिकारियों को निर्देश जारी कर पुराने मामलों को प्राथमिकता के आधार पर जल्द निपटाने के आदेश दिए गए हैं।
राज्य के आंकड़ों के अनुसार जबलपुर, सागर और रीवा के अलावा छतरपुर, ग्वालियर, गुना, मुरैना और उज्जैन जैसे जिलों में भी बड़ी संख्या में मामले वर्षों से अदालतों में लंबित हैं। इन जिलों में पीड़ित पक्ष लंबे समय से न्याय की उम्मीद लगाए बैठा है।
वहीं दूसरी ओर कुछ जिलों की स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर दिखाई देती है। कटनी, टीकमगढ़, नीमच, मंदसौर, डिंडोरी और धार जिलों में पांच साल से अधिक समय से लंबित मामलों की संख्या पांच से भी कम बताई गई है। जबकि नर्मदापुरम, खंडवा और हरदा में केवल एक-एक मामला पांच साल से अधिक समय से लंबित है।
मध्य प्रदेश में एससी-एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम, 1989 के तहत लंबित मामलों के आंकड़े न्याय व्यवस्था पर बढ़ते बोझ को दर्शाते हैं। सबसे अधिक 909 मामले जबलपुर में लंबित हैं, जबकि सागर में 842, रीवा में 417, छतरपुर में 390 और ग्वालियर में 383 प्रकरण लंबित हैं। इसके अलावा गुना में 303, मुरैना में 247, उज्जैन में 234, शिवपुरी में 212, दमोह में 200, विदिशा में 167, छिंदवाड़ा में 143, देवास में 112, शहडोल में 85, इंदौर और रायसेन में 81-81 मामले लंबित हैं। दूसरी ओर अशोकनगर में 77, बालाघाट में 71, भोपाल और उमरिया में 69-69, खरगोन और सिवनी में 62-62, पन्ना में 33, सतना में 28, रतलाम में 24, भिंड में 21, मंडला में 19, आगर में 15, शाजापुर में 11 तथा बैतूल और सिंगरौली में 10-10 मामले लंबित हैं। सबसे कम लंबित मामले सीधी जिले में दर्ज किए गए हैं, जहां केवल 9 प्रकरण लंबित हैं। वहीं 9 जिले ऐसे हैं जहां पांच साल से अधिक समय से पांच से कम मामले लंबित हैं। कटनी में चार, टीकमगढ़, नीमच, मंदसौर, डिंडोरी और धार में दो-दो तथा नर्मदापुरम, खंडवा और हरदा में एक-एक मामला पांच साल से अधिक समय से लंबित बताया गया है।
सबसे खास बात यह है कि प्रदेश के आठ जिलों, आलीराजपुर, अनूपपुर, बड़वानी, बुरहानपुर, दतिया, झाबुआ, सीहोर और श्योपुर में एससी-एसटी एक्ट से जुड़ा एक भी मामला पांच साल से अधिक समय से लंबित नहीं है। इसे न्यायिक और अभियोजन स्तर पर बेहतर समन्वय का परिणाम माना जा रहा है।
लोक अभियोजन संचालनालय द्वारा जारी निर्देशों के बाद अब प्रदेशभर में पुराने लंबित मामलों के निपटारे के लिए विशेष अभियान चलाया जाएगा। अभियोजन विभाग के अधिकारियों को निर्देश दिए गए हैं कि वे ऐसे मामलों की नियमित मॉनिटरिंग करें और अदालतों में सुनवाई की प्रक्रिया को तेज कराने के प्रयास करें।
इसके तहत गवाहों की समय पर उपस्थिति सुनिश्चित करने, आवश्यक दस्तावेज उपलब्ध कराने, लंबित सबूतों को पूरा करने और अदालतों में प्रभावी पैरवी करने पर विशेष जोर दिया जाएगा। जिन मामलों में कानूनी रूप से संभव होगा, वहां दोनों पक्षों की सहमति से शांतिपूर्ण समाधान और समझौते की दिशा में भी प्रयास किए जा सकते हैं।
एससी-एसटी एक्ट के तहत दर्ज मामले सामाजिक भेदभाव, हिंसा और उत्पीड़न से जुड़े गंभीर अपराधों की श्रेणी में आते हैं। ऐसे मामलों में वर्षों तक फैसला नहीं आना पीड़ितों के संवैधानिक अधिकारों और न्याय व्यवस्था पर सवाल खड़े करता है। सामाजिक संगठनों और अधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि लंबी न्यायिक प्रक्रिया के कारण कई पीड़ित परिवार मानसिक, आर्थिक और सामाजिक दबाव का सामना करते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि इन मामलों में तेजी लाने के लिए स्पेशल कोर्ट की संख्या बढ़ाने, अभियोजन अधिकारियों की जवाबदेही तय करने और समयबद्ध ट्रायल सुनिश्चित करने की आवश्यकता है। साथ ही गवाह संरक्षण और डिजिटल केस मॉनिटरिंग व्यवस्था को मजबूत करना भी जरूरी माना जा रहा है।
द मूकनायक से बातचीत में राज्य अनुसूचित जाति आयोग के पूर्व सदस्य और एससी कांग्रेस के प्रदेशाध्यक्ष प्रदीप अहिरवार ने कहा कि एससी-एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम के मामलों का वर्षों तक लंबित रहना बेहद चिंताजनक है। उन्होंने कहा कि दलित और आदिवासी समाज के पीड़ित न्याय की उम्मीद लेकर अदालतों तक पहुंचते हैं, लेकिन मामलों के लंबे समय तक लंबित रहने से उनका न्याय व्यवस्था पर भरोसा कमजोर होता है। अहिरवार ने आरोप लगाया कि सरकार और प्रशासन इन मामलों के त्वरित निराकरण को लेकर गंभीर नहीं हैं, जबकि कानून में विशेष अदालतों और शीघ्र सुनवाई का प्रावधान है। उन्होंने मांग की कि लंबित मामलों के जल्द निपटारे के लिए विशेष अभियान चलाया जाए और पीड़ितों को समय पर न्याय सुनिश्चित किया जाए।
सूत्रों के अनुसार अब जिला स्तर पर पुराने मामलों की समीक्षा नियमित रूप से की जाएगी। अभियोजन विभाग अदालतों में लंबित प्रकरणों की सूची तैयार कर प्राथमिकता के आधार पर उनकी सुनवाई कराने का प्रयास करेगा। सरकार का उद्देश्य यह है कि वर्षों से लंबित मामलों का जल्द निपटारा हो और पीड़ितों को समय पर न्याय मिल सके।
द मूकनायक से बातचीत में विधि विशेषज्ञ, अधिवक्ता मयंक सिंह ने कहा कि एससी-एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम, 1989 सामाजिक न्याय से जुड़ा एक महत्वपूर्ण कानून है, जिसका उद्देश्य दलित और आदिवासी समुदाय को उत्पीड़न और भेदभाव से संरक्षण देना है। उन्होंने कहा कि इस कानून के मामलों का वर्षों तक लंबित रहना न्याय व्यवस्था के लिए गंभीर चिंता का विषय है, क्योंकि “विलंबित न्याय, न्याय से वंचित करने के समान है।” मयंक सिंह ने कहा कि विशेष अदालतों में पर्याप्त संख्या में न्यायाधीशों की नियुक्ति, नियमित सुनवाई और प्रभावी जांच व्यवस्था के बिना लंबित मामलों को कम करना संभव नहीं होगा।
एससी-एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम, 1989 (Scheduled Castes and Scheduled Tribes Prevention of Atrocities Act, 1989) एक विशेष कानून है, जिसे अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) समुदायों के लोगों पर होने वाले अत्याचार, भेदभाव और उत्पीड़न को रोकने के लिए बनाया गया था। इस कानून का उद्देश्य दलित और आदिवासी समाज को सामाजिक अन्याय, हिंसा, जातिगत अपमान, जमीन कब्जाने, आर्थिक शोषण और मानवाधिकार हनन जैसी घटनाओं से सुरक्षा देना है। अधिनियम के तहत जातिसूचक गालियां देना, सार्वजनिक रूप से अपमानित करना, जमीन से बेदखल करना, महिलाओं के साथ हिंसा या उत्पीड़न करना और सामाजिक बहिष्कार जैसे कृत्यों को गंभीर अपराध माना गया है।
इस कानून में पीड़ितों को त्वरित न्याय दिलाने के लिए विशेष अदालतों के गठन, आरोपियों की जल्द गिरफ्तारी और पीड़ितों को मुआवजा व सुरक्षा देने का प्रावधान किया गया है। एससी-एसटी एक्ट के मामलों में कई अपराध गैर-जमानती होते हैं और पुलिस को तत्काल एफआईआर दर्ज करने की जिम्मेदारी दी गई है। समय-समय पर इस कानून में संशोधन भी किए गए हैं, ताकि इसे और अधिक प्रभावी बनाया जा सके। 2018 में केंद्र सरकार ने संशोधन कर यह स्पष्ट किया था कि एससी-एसटी एक्ट के मामलों में बिना प्रारंभिक जांच के भी एफआईआर दर्ज की जा सकती है, ताकि पीड़ितों को तुरंत कानूनी संरक्षण मिल सके।
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