Dalit History Month: 2 अप्रैल 2018 क्यों है सामाजिक न्याय के आंदोलनों का यादगार दिन?

दलित संगठनों ने इसे एक्ट की मूल भावना पर हमला माना और कहा कि इससे अत्याचारों के शिकार SC/ST सदस्यों को न्याय मिलने में बाधा आएगी।
पूरे भारत में पहली बार इतना बड़ा और सफल भारत बंद आंदोलन रहा था, शोषित, वंचित, पीड़ित वर्ग का यह आंदोलन ऐतिहासिक रूप से सफल हुआ था।
पूरे भारत में पहली बार इतना बड़ा और सफल भारत बंद आंदोलन रहा था, शोषित, वंचित, पीड़ित वर्ग का यह आंदोलन ऐतिहासिक रूप से सफल हुआ था।साभार- दलित दस्तक
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दलित हिस्ट्री मंथ दुनिया भर के बहुजन समुदायों द्वारा अप्रैल माह में मनाया जाता है। डॉ. भीमराव अंबेडकर के जन्मदिन को समर्पित इस माह का उद्देश्य दलित-बहुजन समाज की उन ऐतिहासिक संघर्षों को याद करना और नई पीढ़ी तक पहुंचाना है, जिन्हें मुख्यधारा के इतिहास में अक्सर दबा दिया जाता रहा।

ब्लैक हिस्ट्री मंथ से प्रेरित इस अभियान में बहुजन संगठन, बुद्धिजीवी और सामाजिक कार्यकर्ता दलित समाज की पीड़ाओं, प्रतिरोध और उपलब्धियों पर चर्चा करते हैं। इस माह में समुदाय की लड़ाइयों को याद करना इसलिए जरूरी है क्योंकि ये संघर्ष न सिर्फ जातीय अत्याचारों के खिलाफ खड़े होने की याद दिलाते हैं, बल्कि आज भी सामाजिक न्याय की राह दिखाते हैं।

इस बार दलित हिस्ट्री मंथ के दौरान एक घटना को विशेष रूप से याद किया जा रहा है – 2 अप्रैल 2018 का वह दिन, जब एससी/एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम की रक्षा के लिए देश के इतिहास में सबसे बड़ा सामाजिक आंदोलन देखने को मिला। 20 मार्च 2018 को सुप्रीम कोर्ट ने डॉ. सुभाष काशिनाथ महाजन बनाम महाराष्ट्र राज्य मामले में फैसला सुनाया, जिसमें एससी/एसटी एक्ट के कुछ महत्वपूर्ण प्रावधानों को कमजोर कर दिया गया था।

कोर्ट ने निर्देश दिया कि FIR दर्ज करने से पहले DSP स्तर का प्रारंभिक जांच अनिवार्य हो, पब्लिक सर्वेन्ट्स की गिरफ्तारी के लिए नियुक्ति प्राधिकारी की अनुमति जरूरी हो और कुछ मामलों में अग्रिम जमानत भी दी जा सके। दलित संगठनों ने इसे एक्ट की मूल भावना पर हमला माना और कहा कि इससे अत्याचारों के शिकार SC/ST सदस्यों को न्याय मिलने में बाधा आएगी।

इस फैसले के खिलाफ पूरे देश में गुस्सा भड़क उठा। विभिन्न दलित और बहुजन संगठनों ने 2 अप्रैल 2018 को भारत बंद का आह्वान किया। लाखों लोग सड़कों पर उतरे – ट्रेनें रोकी गईं, सड़कें जाम की गईं और प्रदर्शनकारी सरकार से सुप्रीम कोर्ट के फैसले को रद्द करने की मांग करने लगे। मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, बिहार, पंजाब, हरियाणा, महाराष्ट्र और दिल्ली समेत कई राज्यों में प्रदर्शन हुए। कई जगहों पर प्रदर्शन हिंसक हो गए, जहां पुलिस से झड़पें, वाहनों में आगजनी और पथराव की घटनाएं दर्ज की गईं। कर्फ्यू लगाया गया, इंटरनेट सेवाएं बंद की गईं और सुरक्षा बलों को तैनात किया गया।

इस आंदोलन में हिंसा की चपेट में आकर 14 लोग शहीद हो गए, जबकि सैकड़ों घायल हुए। विभिन्न मीडिया रिपोर्ट्स और आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार मध्य प्रदेश में सबसे ज्यादा 9 मौतें हुईं (ग्वालियर, भिंड, मुरैना सहित), उत्तर प्रदेश में 3 और राजस्थान में 2 मौतें दर्ज की गईं। ये शहीद दलित समाज की सम्मान और सुरक्षा की लड़ाई में अपने प्राणों का बलिदान दे गए।

प्रदर्शनों के दबाव में केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में रिव्यू पिटीशन दायर की। अगस्त 2018 में संसद ने एससी/एसटी (अत्याचार निवारण) संशोधन अधिनियम, 2018 पारित किया, जिसने सुप्रीम कोर्ट के मार्च 2018 के निर्देशों को रद्द कर मूल प्रावधानों को बहाल कर दिया।

2 अप्रैल 2018 का दिन सामाजिक न्याय के संघर्षों में दर्ज हो गया क्योंकि इसने दिखाया कि बहुजन समाज अपने संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए एकजुट हो सकता है। दलित हिस्ट्री मंथ में इस घटना को याद करना उन संघर्षों की याद दिलाता है जिन्होंने कानून की रक्षा की।

पूरे भारत में पहली बार इतना बड़ा और सफल भारत बंद आंदोलन रहा था, शोषित, वंचित, पीड़ित वर्ग का यह आंदोलन ऐतिहासिक रूप से सफल हुआ था।
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