"आरक्षण की समीक्षा का समय आ गया": IIT पटना रजिस्ट्रार की आरक्षण और दलित विरोधी पोस्ट पर बवाल, शिकायतों के बाद जांच शुरू

संस्थान को फैकल्टी सदस्यों और दलित अधिकार कार्यकर्ताओं से कई शिकायतें मिली हैं, जिनमें 24 सितंबर को लिंक्डइन और फेसबुक पर प्रो. अवलेन्द्र के. ठाकुर द्वारा की गई कथित टिप्पणियों का जिक्र है।
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आईआईटी पटना के रजिस्ट्रार पर कथित आरक्षण-विरोधी और दलित-विरोधी पोस्ट का आरोप, जांच शुरूद मूकनायक ग्राफिक
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पटना- आईआईटी पटना के रजिस्ट्रार और डीन (एडमिनिस्ट्रेशन) प्रो. अवलेन्द्र के. ठाकुर के नाम से लिंक्डइन पर एक पोस्ट ने संस्थान में हलचल मचा दी है। पोस्ट में आरक्षण की समीक्षा की बात कही गई है। इसके बाद फैकल्टी सदस्यों और अधिकार कार्यकर्ताओं ने शिकायतें भेजीं, जिन पर संस्थान ने जांच शुरू कर दी है। दूसरी ओर, ठाकुर का कहना है कि पोस्ट उनकी नहीं है। उन्होंने इसे "फर्जी, गढ़ी हुई और छेड़छाड़ की गई" बताया है।

24 सितंबर को ठाकुर के नाम से लिंक्डइन पर अंग्रेजी भाषा में कथित तौर पर यह पोस्ट साझा की गई थी :

"भारत सरकार को संविधान में केवल 10 वर्षों के लिए प्रावधानित आरक्षण और छूट की नीति की समीक्षा पर गंभीरता से विचार कर कार्रवाई करनी चाहिए, जिसमें 10 साल बाद तथ्यों के आधार पर समीक्षा की गुंजाइश हो। लेकिन यह सत्ता में रहने वाले सभी दलों के लिए 'वोट बैंक' बनाने और बनाए रखने का राजनीतिक हथियार बन गया। अब युवाओं के भविष्य, समाज के हित और देश को मजबूत करने के लिए इसकी समीक्षा का सही समय आ गया है।"

यह पोस्ट सोमवार तक ठाकुर के लिंक्डइन खाते पर दिख रही थी। वहीं, फेसबुक पर 24 सितंबर को दलितों के बारे में की गई एक कथित टिप्पणी अब उपलब्ध नहीं है। संस्थान के एक फैकल्टी सदस्य ने निदेशक को पत्र लिखकर शिकायत दर्ज कराई है। उन्होंने ठाकुर के फेसबुक खाते पर दिखी जिस पोस्ट का हवाला दिया, उसमें लिखा था:

"काबिल मत बनो, दलित बनो, कामयाबी झक मारकर पीछे आयेगी - भारतीय संविधान"

फेकल्टी सदस्य ने अपने पत्र में कहा है कि उनकी राय में ऐसा सार्वजनिक बयान अनुसूचित जाति समुदाय के सदस्यों के प्रति अपमानजनक है, उन्हें मिले संवैधानिक संरक्षण का उपहास उड़ाता है और राष्ट्रीय महत्व के संस्थान के किसी वरिष्ठ पदाधिकारी से अपेक्षित गरिमा, तटस्थता और जिम्मेदारी के अनुरूप नहीं है।

उन्होंने मांग की है कि संस्थान:

  • इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों को तुरंत सुरक्षित रखे,

  • औपचारिक जांच बैठाए,

  • आईआईटी पटना के आचरण नियमों के तहत अनुशासनात्मक कार्यवाही शुरू करे।

शिकायत में यह भी अनुरोध किया है कि मामले को सक्षम वैधानिक या कानून-प्रवर्तन प्राधिकरण को भेजा जाए, ताकि अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 की धारा 3(1)(यू) और भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 196 के तहत परीक्षण हो सके। उन्होंने साफ लिखा है कि यह इन धाराओं के वैधानिक तत्वों के पूरे होने की शर्त पर हो।

उन्होंने यह भी कहा कि ठाकुर के वरिष्ठ प्रशासनिक पदों पर होने के कारण ऐसे सार्वजनिक बयान से एससी/एसटी विद्यार्थियों, शिक्षकों और कर्मचारियों का प्रशासन की निष्पक्षता में भरोसा गंभीर रूप से डगमगा सकता है। उन्होंने जांच ऐसे प्राधिकरण से कराने की मांग की है जिसका हितों का कोई टकराव न हो, और अपनी शिकायत को अत्यावश्यक मानकर की गई कार्रवाई की जानकारी देने का अनुरोध किया है।

आईआईटी पटना के एक फैकल्टी सदस्य ने नाम न छापने की शर्त पर कहा कि आरक्षण पर की गई टिप्पणियां "बेहद समस्याजनक" हैं, क्योंकि ठाकुर प्रशासनिक पदों पर हैं। उनके मुताबिक, रजिस्ट्रार और डीन (एडमिनिस्ट्रेशन) ऐसे पद हैं जिन पर बैठा व्यक्ति आरक्षण के संवैधानिक प्रावधान को लागू कराने में अहम भूमिका निभाता है। यदि ऐसा व्यक्ति सार्वजनिक मंच पर आरक्षण-विरोधी विचार रखे, तो विद्यार्थियों और अन्य शिक्षकों का उस पर भरोसा नहीं रह पाएगा।

आईआईएम एलुमनाई ग्लोबल नेटवर्क के संस्थापक सदस्य और अधिकार कार्यकर्ता अनिल वागड़े ने आईआईटी पटना के चेयरमैन टी.वी. नरेंद्रन और निदेशक अमित पात्रा को शिकायत भेजी है। उन्होंने लिखा कि ये पोस्ट दलित समुदाय का स्पष्ट अपमान हैं और संस्थान के एक प्रोफेसर की ओर से आने के कारण ऐसा लगता है मानो इन्हें संस्थान का समर्थन प्राप्त हो। उन्होंने दोनों अधिकारियों से पूछा है कि वे क्या कार्रवाई करने वाले हैं। वागड़े ने ठाकुर के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग की है, जिसमें एससी/एसटी एक्ट के तहत एफआईआर भी शामिल है।

द मूकनायक से बातचीत में अंबेडकर सेंटर फॉर जस्टिस एंड पीस (ACJP) के नेशनल प्रेसिडेंट नागसेन सोनारे ने इसे "अत्यंत गंभीर" मामला बताते हुए ठाकुर के निलंबन और एफआईआर दर्ज करने की मांग की है। उनका कहना है कि देशभर में बहुजन समुदाय के लोग इस मामले से आक्रोशित हैं। उन्होंने सभी संगठनों से आगे आने और संस्थान के विजिटर, यानी राष्ट्रपति से कार्रवाई की अपील करने का आह्वान किया है।

इधर, ठाकुर ने इन पोस्ट को अपना मानने से इनकार किया है। द टेलीग्राफ की रिपोर्ट के मुताबि, उन्होंने व्हाट्सऐप पर लिखा कि ये "फर्जी, गढ़ी हुई, छेड़छाड़ की गई और झूठी" हैं। उन्होंने यह भी कहा कि हो सकता है उनके विरोधियों ने ऐसी और भी चीजें बनाई हों, जिनकी उन्हें जानकारी नहीं है, क्योंकि वे न तो ऐसी गतिविधियों में शामिल होते हैं और न ही इन पर ध्यान देते हैं। ठाकुर ने कहा कि जिन लोगों ने उनके नाम से ये टिप्पणियां पोस्ट की हैं, उनके खिलाफ वे कार्रवाई करेंगे।

निदेशक अमित पात्रा ने व्हाट्सऐप संदेश में बताया कि मामले की जांच की जा रही है। उन्होंने लिखा, "आरोप साबित होने पर आवश्यक कार्रवाई की जाएगी।"

फिलहाल पोस्ट की प्रामाणिकता को लेकर संस्थान की जांच जारी है। ठाकुर पर लगे आरोप अभी साबित नहीं हुए हैं, और वे इन्हें सिरे से खारिज कर रहे हैं। जांच के नतीजे और संस्थान या सक्षम प्राधिकरण की ओर से किसी कार्रवाई की घोषणा का इंतजार है।

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