
उत्तर प्रदेश: अलीगढ़ की एक विशेष एससी/एसटी अदालत ने 2007 के एक अपहरण मामले में पांच दोषियों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई है। इन अपराधियों ने एक 19 वर्षीय दलित युवती का अपहरण सिर्फ इसलिए किया था ताकि वह अपने साथ हुए दुष्कर्म के मामले में गवाही न दे सके। अदालत ने इसे एक मुख्य गवाह को रास्ते से हटाने और मुकदमे को भटकाने की सोची-समझी साजिश करार दिया है। हालांकि, सबसे दुखद पहलू यह है कि करीब दो दशक की लंबी तलाश और जांच के बावजूद वह पीड़िता आज तक नहीं मिल सकी है।
इस खौफनाक वारदात को अंजाम देने वाले दोषियों की उम्र अब 40 से 50 वर्ष के बीच है। इन सभी को भारतीय न्याय संहिता (आईपीसी) की धारा 364 यानी हत्या के इरादे से अपहरण और एससी/एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम की धारा 3(2)(v) के तहत दोषी ठहराते हुए सजा सुनाई गई है।
गुरुवार को इस अहम मामले में फैसला सुनाते हुए विशेष न्यायाधीश-II (एससी/एसटी एक्ट) प्रतिभा सक्सेना ने एक बेहद कड़ी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि 19 साल बीत जाने के बाद भी अपहृत लड़की को बरामद नहीं किया जा सका है। अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसे संगीन मामलों में किसी भी तरह की अनुचित सहानुभूति दिखाना अपराधियों के हौसले बुलंद करेगा और इससे पीड़ितों तथा गवाहों को आगे आने से हतोत्साहित होना पड़ेगा।
इस दर्दनाक घटना की शुरुआत 28 सितंबर 2007 को हुई थी। उस दिन पीड़िता के पिता ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराते हुए बताया था कि आरोपी हथियार लेकर अलीगढ़ जिले के उनके गांव स्थित घर में घुस आए थे। देसी तमंचों से लैस इन लोगों में हाथरस के रहने वाले अमर सिंह, लेखराज, बाबूलाल, सुरेश और अलीगढ़ की उषा देवी शामिल थीं। पिता के अनुसार, इन लोगों ने उनकी बेटी का जबरन अपहरण कर लिया ताकि वह अपने ही बलात्कार के मुकदमे में इन आरोपियों के खिलाफ गवाही न दे पाए।
अपहरण के इस मामले की सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष की ओर से सात गवाह पेश किए गए। सरकारी वकीलों ने अदालत में मजबूती से यह तर्क रखा कि आरोपियों ने जानबूझकर इस दलित परिवार को निशाना बनाया ताकि उन्हें डरा-धमका कर न्याय की प्रक्रिया में बाधा डाली जा सके।
शुक्रवार को विशेष लोक अभियोजक चमन कुमार शर्मा ने मामले की जानकारी देते हुए एक चौंकाने वाला तथ्य साझा किया। उन्होंने बताया कि जिस बलात्कार के मामले को लेकर यह अपहरण हुआ था, उसमें आरोपी इसी साल की शुरुआत में बरी हो गए थे। इसका सबसे बड़ा कारण यही था कि पीड़िता कभी अदालत में पेश नहीं हो सकी और बाकी गवाह अपने बयानों से मुकर गए। बलात्कार का मुकदमा दर्ज होने के ठीक छह महीने बाद पिता ने यह अपहरण का मामला दर्ज कराया था।
अब इस अपहरण कांड में अदालत ने हर दोषी को आईपीसी की धारा 364 और एससी/एसटी एक्ट के तहत उम्रकैद की सजा के साथ-साथ हर अपराध के लिए 10,000 रुपये का जुर्माना भी लगाया है। वहीं, पर्याप्त सबूतों के अभाव में सतीश पांडे नामक एक सह-आरोपी को बरी कर दिया गया है।
दोषियों की ओर से अदालत में नरमी बरतने की गुहार लगाई गई थी, जिसे न्यायाधीश ने सिरे से खारिज कर दिया। अदालत ने अपने फैसले में यह कड़ा संदेश दिया है कि न्याय प्रणाली को समाज के कमजोर और अतिसंवेदनशील वर्गों को यह भरोसा दिलाना ही होगा कि उनके खिलाफ होने वाले अपराधों पर कड़ी से कड़ी सजा मिलेगी, चाहे आरोपी कितने भी रसूखदार क्यों न हों।
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