ऊना दलित कांड के 10 साल: न्याय की आस में पाई-पाई को मोहताज पीड़ित परिवार, हाईकोर्ट में लड़ाई के लिए समाज से मांगी मदद

ऊना कांड के 10 साल: निचली अदालत से निराशा के बाद हाईकोर्ट में न्याय की जंग, पीड़ित परिवार ने समाज से मांगी आर्थिक मदद
Una Dalit Flogging Case
ऊना दलित कांड के 10 साल बाद पीड़ित परिवार हाईकोर्ट में कानूनी लड़ाई के लिए समाज से आर्थिक मदद मांग रहा है।(Ai Image)
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गुजरात: गिर सोमनाथ जिले के ऊना में हुए बहुचर्चित दलित उत्पीड़न मामले को एक दशक बीत चुका है। दस साल पहले मरी हुई गायों की खाल उतारने पर गोहत्या का झूठा आरोप लगाकर चार दलित युवकों को सरेआम पीटा गया था। अब इस खौफनाक घटना के पीड़ित न्याय की अपनी लड़ाई को आगे बढ़ाने के लिए समाज के सामने आर्थिक मदद की गुहार लगा रहे हैं।

इसी साल मार्च में वेरावल की एक निचली अदालत ने इस मामले के 35 आरोपियों को बरी कर दिया था। इस फैसले के खिलाफ पीड़ितों ने गुजरात हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। अपील पर अगली सुनवाई 25 अगस्त को होनी है।

Indian Express की रिपोर्ट के अनुसार, सरेआम पिटाई का शिकार हुए पीड़ितों में से एक वशराम सरवैया का कहना है कि पिछले दस सालों में उन्हें मुकदमा लड़ने के लिए भारी कर्ज और खर्च का सामना करना पड़ा है। उनकी आय के साधन बेहद सीमित हैं। एक दशक तक उन्होंने किसी से मदद नहीं मांगी, लेकिन अब कानूनी लड़ाई जारी रखने के लिए उन्हें समाज के आर्थिक सहयोग की सख्त जरूरत है। वशराम ने बताया कि हाईकोर्ट और जरूरत पड़ने पर सुप्रीम कोर्ट तक न्याय की गुहार लगाने के लिए उन्हें धन की आवश्यकता होगी।

गुजरात हाईकोर्ट के समक्ष लंबित वशराम की अपील पर पिछली सुनवाई 20 जुलाई को हुई थी। उस दिन हाईकोर्ट की एक खंडपीठ ने रजिस्ट्री को निचली अदालत की कार्यवाही का पूरा रिकॉर्ड तलब करने का निर्देश देते हुए मामले को 25 अगस्त के लिए सूचीबद्ध कर दिया है।

न्याय पाने के लिए वशराम 11 जुलाई 2026 से अपने परिचितों को व्हाट्सएप पर मैसेज भेज रहे हैं। वह सीधे यूपीआई के जरिए बैंक खाते में आर्थिक मदद भेजने की अपील कर रहे हैं। उन्होंने फोन कॉल और संदेशों के जरिए भी लोगों से संपर्क साधा है।

उनका यह गुजराती संदेश बेहद मार्मिक है। इसमें लिखा गया है कि आज उनका परिवार आर्थिक रूप से पूरी तरह टूट चुका है। यदि समाज एकजुट होकर इस लड़ाई में फूल नहीं तो फूल की पंखुड़ी के बराबर भी मदद करता है, तो वे हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में स्वाभिमान की इस जंग को जीत सकेंगे। संदेश में आगे कहा गया है कि ऊपरी अदालतों में भारी खर्च होता है, इसलिए समाज इसे अपनी सामूहिक जिम्मेदारी समझे और पीड़ित परिवार को न्याय दिलाने में सहयोग करे।

वशराम के अनुसार, 11 जुलाई 2026 से अब तक उन्होंने गुजरात के करीब 30 लोगों को ऐसे संदेश भेजे हैं, जिनमें से 10 लोगों ने कुछ आर्थिक योगदान भी दिया है। मुकदमा लड़ने के लिए उन्हें तुरंत कम से कम दो लाख रुपये की आवश्यकता है। यह कानूनी लड़ाई कितनी लंबी खिंचती है और क्या मामला सुप्रीम कोर्ट तक जाता है, इसके आधार पर यह खर्च काफी बढ़ भी सकता है।

इस पूरे घटनाक्रम ने पीड़ित युवकों के रोजगार के अवसरों को भी बुरी तरह प्रभावित किया है। वशराम बताते हैं कि जब भी वे काम मांगने जाते हैं, तो लोग उन्हें उसी नजरिए से देखते हैं जैसे उन्होंने ही गाय काटी हो। लगातार होने वाले इस तिरस्कार और असहजता के कारण अब उन्होंने बाहर जाकर काम खोजना ही बंद कर दिया है।

मृत पशुओं की खाल उतारना दलित सरवैया समुदाय का पारंपरिक पेशा रहा है। 11 जुलाई 2016 को वशराम और उनके दो रिश्तेदार गिर सोमनाथ जिले की ऊना तहसील के मोटा समधियाला गांव के बाहर मरी हुई गायों की खाल उतार रहे थे। इनमें से एक गाय का शिकार शेर ने किया था। तभी वहां गौरक्षक होने का दावा करने वाले कुछ लोग दो गाड़ियों में सवार होकर आए और उन पर गोहत्या का आरोप लगा दिया।

इसके बाद दलित युवकों को बांधकर लाठियों और लोहे की छड़ों से बेरहमी से पीटा गया। वशराम के साथ-साथ बेचर, अशोक और रमेश को ऊना शहर ले जाया गया, जहां उन्हें फिर से सरेआम कोड़े मारे गए और प्रताड़ित किया गया।

इस क्रूर हमले का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद पूरे देश में भारी आक्रोश फैल गया था। तब गुजरात की तत्कालीन मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल ने सरवैया परिवार से मुलाकात की थी। इसी घटना के बाद दलित कार्यकर्ता जिग्नेश मेवाणी ने एक बड़ा विरोध प्रदर्शन किया था, जिसने बाद में उन्हें गुजरात विधानसभा तक पहुंचा दिया।

इस गंभीर मामले में ऊना पुलिस स्टेशन के चार पुलिसकर्मियों सहित कुल 41 लोगों पर मुकदमा चलाया गया था। सुनवाई के दौरान तत्कालीन पुलिस इंस्पेक्टर निर्मलसिंह झाला का निधन हो गया था।

इसी साल 16 मार्च को वेरावल के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश जिग्नेश पंड्या ने फैसला सुनाया। उन्होंने 35 आरोपियों को बरी कर दिया, जिनमें तीन पुलिसकर्मी भी शामिल थे। इन पुलिसकर्मियों पर अपराध के लिए उकसाने, लापरवाही बरतने और सरकारी रिकॉर्ड में फर्जीवाड़ा करने के गंभीर आरोप थे।

अदालत ने केवल पांच लोगों को खतरनाक हथियारों से जानबूझकर चोट पहुंचाने, बंधक बनाने, शांति भंग करने के इरादे से अपमानित करने और अनुसूचित जाति के सदस्यों को जलील करने का दोषी पाया। सजा पाने वालों में रमेश जादव, राकेश जोशी, नागजीभाई वाणिया, प्रमोदगिरि गोस्वामी और बलवंतगिरि गोस्वामी शामिल हैं।

उस वक्त इस फैसले से निराश वशराम सरवैया ने मीडिया से बातचीत में कहा था कि वे इस असंतोषजनक फैसले को ऊपरी अदालतों में चुनौती देंगे। आज वे मानवता में विश्वास रखने वाले हर व्यक्ति से मदद मांग रहे हैं।

घटना के 10 साल पूरे होने पर 11 जुलाई को अहमदाबाद के मंगल पांडे ऑडिटोरियम में राज्य स्तरीय 'न्याय और एकजुटता सम्मेलन' का आयोजन किया गया था। वहां वशराम और रमेश के पिता बालू सरवैया ने ऐलान किया कि वे जब तक जीवित हैं, न्याय के लिए अपनी लड़ाई जारी रखेंगे। उन्होंने कहा कि दस साल के संघर्ष के बाद निचली अदालत में उनके मामले को दबा दिया गया, लेकिन वे सुप्रीम कोर्ट तक जाएंगे और जरूरत पड़ी तो सरकार के खिलाफ भी आंदोलन करेंगे।

वशराम ने यह भी आरोप लगाया कि आरोपियों ने अपनी कानूनी लड़ाई जारी रखने के लिए एक फंड बनाया है और उन्हें राजनीतिक संगठनों से गुप्त समर्थन भी मिल रहा है। इसके जवाब में सरवैया परिवार भी दलित समुदाय के लोगों और मानवता में विश्वास रखने वाले अन्य समुदायों से मदद जुटा रहा है। उन्होंने कहा कि जरूरत पड़ने पर वह सोशल मीडिया पर वीडियो डालकर भी सहयोग मांग सकते हैं।

वशराम का परिवार भूमिहीन है। इनकी आय का एकमात्र विश्वसनीय साधन उनके पास मौजूद एक गाय और एक भैंस का दूध बेचना है। परिवार में वशराम, उनकी पत्नी, एक बेटी, छोटे भाई-बहन और माता-पिता शामिल हैं। दूध की बिक्री से वे हर दिन केवल 350 रुपये ही कमा पाते हैं। कुछ महीने पहले उनके द्वारा पाली जा रही दो गायों में से एक को शेर ने मार दिया था, जिससे उनकी आय और भी कम हो गई।

गौरतलब है कि गिर सोमनाथ जिले की ऊना तहसील के आसपास के इलाकों में साल 2000 के दशक की शुरुआत से ही शेरों की आबादी काफी बढ़ गई है, क्योंकि शेर अब गिर के संरक्षित जंगलों से बाहर तटीय इलाकों का रुख कर रहे हैं। वशराम के परिवार के लिए यह स्थिति सबसे बड़ी विडंबना साबित हुई। 2016 में भी स्वयंभू गौरक्षकों ने उन्हें उसी गाय की हत्या का दोषी मान लिया था, जिसे असल में शेरों ने अपना शिकार बनाया था।

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