
बेंगलुरु- कर्नाटक में कॉमन एंट्रेंस टेस्ट (CET) काउंसलिंग के बीच अनुसूचित जाति (SC) के हजारों छात्रों के सामने गंभीर संकट खड़ा हो गया है। 8 जुलाई को ऑप्शन एंट्री (Option Entry) की अंतिम तिथि है, लेकिन 11,086 से अधिक SC छात्र अभी तक आंतरिक आरक्षण (Internal Reservation) के अनुरूप आवश्यक जाति प्रमाणपत्र प्राप्त नहीं कर सके हैं। यदि निर्धारित समय तक प्रमाणपत्र जारी नहीं हुए तो ये छात्र आरक्षित सीटों के लिए अपनी पसंद भरने (Option Entry) से वंचित रह सकते हैं।
यह जानकारी 'द हिन्दू' की एक विस्तृत रिपोर्ट में सामने आई है, जिसमें बताया गया है कि समस्या की मुख्य वजह राज्यभर के तहसील कार्यालयों में नए जाति प्रमाणपत्र जारी होने में हो रही देरी है।
कर्नाटक सरकार ने हाल ही में अनुसूचित जातियों के भीतर आंतरिक आरक्षण लागू किया है। इसके तहत SC समुदाय को अलग-अलग श्रेणियों Category A, Category B और Category C में विभाजित कर आरक्षण का लाभ दिया जा रहा है।
लेकिन जब CET के आवेदन भरे गए थे, उस समय सरकार ने आंतरिक आरक्षण लागू नहीं किया था। इसलिए छात्रों ने अपने पुराने जाति प्रमाणपत्रों के आधार पर आवेदन किया था।
बाद में सरकार द्वारा आंतरिक आरक्षण लागू करने के बाद कर्नाटक परीक्षा प्राधिकरण (KEA) ने निर्देश दिया कि जिन छात्रों को SC के भीतर आंतरिक आरक्षण का लाभ चाहिए, उन्हें नए प्रारूप में जारी जाति प्रमाणपत्र का Revenue Document (RD) नंबर ऑनलाइन पोर्टल पर अपडेट करना होगा। यहीं से संकट शुरू हुआ।
इस परेशानी में 11 हजार से अधिक छात्र फंसे हैं। जानकारी के अनुसार कुल 43,353 अनुसूचित जाति के छात्रों ने आवेदन किया। इनमें से 32,267 छात्रों ने नया RD नंबर दर्ज कर दिया है।जबकि 11,086 छात्र अभी तक नया जाति प्रमाणपत्र प्राप्त नहीं कर पाए हैं।
इन छात्रों का कहना है कि उन्होंने कई सप्ताह पहले आवेदन कर दिया था, लेकिन तहसील कार्यालयों से प्रमाणपत्र जारी नहीं हुए हैं। इसके कारण KEA (कर्नाटक एग्जामिनेशन अथोरिटी) पोर्टल उन्हें ऑप्शन एंट्री करने की अनुमति नहीं दे रहा। कुछ स्टूडेंट्स ने 'द हिन्दू' को बताया रिपोर्ट कि जब आवेदन किए गए थे तब नए प्रमाणपत्र की आवश्यकता नहीं थी।
बाद में KEA ने आंतरिक आरक्षण के तहत नया प्रमाणपत्र मांगा। उन्होंने लगभग एक महीने पहले आवेदन किया, लेकिन अब तक तहसील कार्यालय से प्रमाणपत्र जारी नहीं हुआ। परिणामस्वरूप वे काउंसलिंग की प्रक्रिया पूरी नहीं कर पा रही हैं।
स्थिति की गंभीरता को देखते हुए KEA ने राजस्व विभाग के सचिव को पत्र लिखकर प्रभावित छात्रों के प्रमाणपत्र शीघ्र जारी करने का अनुरोध किया है।
KEA के कार्यकारी निदेशक एच. प्रसन्ना के अनुसार, जिन छात्रों ने अभी तक RD नंबर अपडेट नहीं किया है, उन्हें एसएमएस और समाचार पत्रों के माध्यम से भी सूचना दी गई है ताकि वे जल्द से जल्द प्रक्रिया पूरी कर सकें।
उन्होंने उम्मीद जताई कि सभी पात्र छात्रों को समय रहते प्रमाणपत्र मिल जाएंगे। दूसरी ओर, राजस्व विभाग के एक अधिकारी ने दावा किया कि विभाग की ओर से कोई असामान्य देरी नहीं हो रही है।
उनके अनुसार अधिकांश आवेदन निर्धारित 21 दिनों की समय-सीमा में निपटाए जा रहे हैं। हालांकि कुछ नए आवेदन और पुराने प्रमाणपत्रों में संशोधन से जुड़े मामले अभी भी लंबित हैं।
कर्नाटक में आंतरिक आरक्षण (Internal Reservation) अनुसूचित जाति (SC) के 15% कोटे के भीतर ही "कोटा के अंदर कोटा" की व्यवस्था है। इसके तहत SC की सभी 101 उप-जातियों को उनकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति के आधार पर 3 अलग-अलग समूहों में बांटा गया है ताकि सबसे पिछड़ी जातियों को आरक्षण का सीधा लाभ मिल सके।
इस फॉर्मूले के तहत अप्रैल 2026 में तत्कालीन मुख्यमंत्री सिद्धारमैया सरकार ने SC कोटे का विभाजन इस प्रकार किया:
ग्रुप A (SC लेफ्ट): 5.25% (इसमें सबसे अधिक वंचित जातियां शामिल हैं)
ग्रुप B (SC राइट): 5.25% (इसमें अधिक जागरूक और प्रभावशाली जातियां आती हैं)
ग्रुप C (अन्य SC): 4.5% (घुमंतू जातियां)
सरकार ने यह निर्णय छात्रों और नौकरी की तलाश करने वालों के लगातार विरोध प्रदर्शनों को देखते हुए किया, धारवाड़ समेत कर्नाटक के अन्य इलाकों में भर्ती में देरी के कारण बड़े पैमाने पर अशांति फैल गई थी।
इस पूरे विवाद पर वरिष्ठ IRS अधिकारी नेत्रपाल ने सरकार की प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं।
उन्होंने कहा कि उन्होंने पहले ही चेताया था कि आंतरिक आरक्षण की श्रेणी को सीधे जाति प्रमाणपत्र में जोड़ना अनावश्यक रूप से जटिल और बोझिल व्यवस्था साबित होगी।
नेत्रपाल ने कहा,
"मैं हमेशा कहता रहा हूं कि जाति प्रमाणपत्र के भीतर आंतरिक आरक्षण की श्रेणी जोड़ना गलत फैसला था। सरकार को मूल जाति प्रमाणपत्र बदलने के बजाय अलग से उप-जाति (Sub-caste) प्रमाणपत्र जारी करना चाहिए था।"
उन्होंने आगे कहा कि अब स्क्रूटनी कमेटियों के सामने कई तकनीकी विवाद उत्पन्न होंगे और मासूम विद्यार्थियों को ऐसे सवालों का सामना करना पड़ेगा जिनका उत्तर देना उनके लिए बेहद कठिन होगा।
उनके अनुसार, आंतरिक आरक्षण लागू होने के बाद जाति प्रमाणपत्रों को लेकर पैदा हुआ भ्रम अभी भी समाप्त नहीं हुआ है और इसका सबसे बड़ा नुकसान विद्यार्थियों को उठाना पड़ सकता है।
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