
लखनऊ: उत्तर प्रदेश की अदालतों में लंबित मामलों को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने गहरी चिंता जताई है। अदालत ने पाया है कि केवल लखनऊ जिले की अदालतों में ही पुलिस की करीब 50,000 क्लोजर रिपोर्ट (अंतिम रिपोर्ट) लंबित हैं। इस भारी पेंडेंसी को देखते हुए हाईकोर्ट ने पूरे राज्य के सभी जिला जजों से उनके यहां लंबित ऐसी रिपोर्टों का पूरा ब्योरा तलब किया है। इसके साथ ही देरी के कारणों और उनके निपटारे के लिए उठाए गए कदमों की जानकारी भी मांगी गई है।
यह सख्त निर्देश उस मामले की सुनवाई के दौरान आया, जिसमें एक पुलिस क्लोजर रिपोर्ट लखनऊ की एक अदालत में पिछले छह साल से फैसले के लिए लटकी हुई है। 21 जुलाई को पारित अपने आदेश में जस्टिस तेज प्रताप तिवारी की एकल पीठ ने इस स्थिति पर कड़ी नाराजगी जाहिर की। उन्होंने कहा कि यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि पक्षकारों की कोई गलती न होने के बावजूद पीठासीन अधिकारियों की उदासीनता के कारण अंतिम रिपोर्ट सालों तक लंबित रहती हैं। जज ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यह वह क्षेत्र है जहां सिस्टम समय पर न्याय देने में पूरी तरह विफल रहा है।
अदालत ने अपनी टिप्पणी में यह भी जोड़ा कि यह समझा जा सकता है कि विवादित मुकदमों का फैसला जल्दबाजी में नहीं किया जा सकता। लेकिन जब जांच पूरी होने के बाद अंतिम रिपोर्ट पेश कर दी गई हो, तो उसे इतने लंबे समय तक कैसे लटका कर रखा जा सकता है।
हाईकोर्ट असित वर्मा और अन्य लोगों द्वारा दायर एक याचिका पर सुनवाई कर रहा था। इन लोगों के खिलाफ साल 2019 में लखनऊ के गोसाईंगंज पुलिस स्टेशन में विश्वासघात, जालसाजी और फर्जी दस्तावेजों के इस्तेमाल के आरोप में आपराधिक मामला दर्ज किया गया था। इस मामले में जांच अधिकारी ने जुलाई 2020 में ही अपनी अंतिम रिपोर्ट या क्लोजर रिपोर्ट अदालत में पेश कर दी थी।
याचिकाकर्ताओं के वकील ने अदालत को बताया कि उनके मुवक्किल व्यवसायी हैं और काम के सिलसिले में उन्हें अक्सर विदेश यात्रा करनी पड़ती है। मामला लंबित होने की वजह से वे अपने पासपोर्ट का नवीनीकरण नहीं करा पा रहे हैं, जिससे उनके विदेशी दौरे प्रभावित हो रहे हैं। इससे पहले भी इन लोगों ने राहत के लिए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।
वकील के अनुसार, हाईकोर्ट ने 10 फरवरी के अपने आदेश में संबंधित निचली अदालत को मामले का जल्द से जल्द, संभवतः एक सप्ताह के भीतर निपटारा करने का निर्देश दिया था। नई याचिका में इसी अंतिम रिपोर्ट पर जल्द फैसला सुनाने की गुहार लगाई गई है ताकि याचिकाकर्ताओं को राहत मिल सके।
जस्टिस तिवारी की पीठ ने कहा कि जिला स्तर की अदालतों में अंतिम रिपोर्ट का इतने लंबे समय तक लंबित रहना गहरी चिंता का विषय है। अदालत ने कहा कि इतनी लंबी पेंडेंसी न्याय के हित में नहीं है, क्योंकि यह आपराधिक प्रक्रिया को धीमा कर देती है और दोनों पक्षों के लिए अनावश्यक परेशानी पैदा करती है। इसलिए इस ओर तत्काल ध्यान देने और जल्दी निपटारे के लिए प्रभावी कदम उठाने की जरूरत है।
हाईकोर्ट ने यह भी माना कि दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी), 1973 और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस), 2023 में आपराधिक अदालतों के समक्ष लंबित अंतिम रिपोर्टों के निपटारे के लिए कोई विशिष्ट समय सीमा निर्धारित नहीं की गई है। हालांकि, अदालत ने साफ किया कि इसके बावजूद इन रिपोर्टों को इतने लंबे समय तक लंबित रखने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
अपने आदेश में पीठ ने जिला एवं सत्र न्यायाधीशों को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया कि उनके प्रशासनिक नियंत्रण वाले सभी न्यायालय समय-समय पर लंबित अंतिम रिपोर्टों की समीक्षा करें। खासकर उन मामलों को प्राथमिकता दी जाए जो काफी समय से लंबित हैं और जिनमें शिकायतकर्ता या सूचना देने वाले को पहले ही नोटिस जारी किए जा चुके हैं।
मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (सीजेएम) और अन्य मजिस्ट्रेटों को भी इन मामलों के जल्द निपटारे का प्रयास करने को कहा गया है ताकि बैकलॉग को काफी हद तक कम किया जा सके। अब इस मामले की अगली सुनवाई 20 अगस्त को तय की गई है। तब तक हाईकोर्ट ने रजिस्ट्रार जनरल को पूरे यूपी के सभी जिला एवं सत्र न्यायाधीशों से लंबित अंतिम रिपोर्टों की संख्या पर अपनी विस्तृत रिपोर्ट मंगाने का सख्त निर्देश दिया है।
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