
भोपाल। मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल के भीमनगर की संकरी गलियों से निकलकर एक साधारण परिवार की बेटी ने असाधारण उपलब्धि हासिल कर ली है। चांदनी विश्वकर्मा ने 12वीं बोर्ड परीक्षा में वाणिज्य संकाय में प्रदेश में पहला स्थान प्राप्त कर न केवल अपने परिवार का नाम रोशन किया, बल्कि पूरे शहर को गर्व का अवसर दिया है। 500 में से 494 अंक हासिल करने वाली चांदनी की सफलता सिर्फ अंकों की कहानी नहीं है, बल्कि यह संघर्ष, आत्मविश्वास और निरंतर मेहनत की प्रेरक दास्तान है।
चांदनी का जीवन शुरू से ही चुनौतियों से भरा रहा। मंत्रालय की ऊंची-ऊंची इमारतों के सामने स्थित भीमनगर में दो कमरों के छोटे से घर में रहने वाली चांदनी के परिवार की आर्थिक स्थिति बेहद कमजोर रही है। उनके पिता रामभुवन विश्वकर्मा मजदूरी कर परिवार का भरण-पोषण करते हैं, जबकि उनकी मां बिमला स्कूल में मध्यान्ह भोजन बनाने के साथ-साथ घरों में खाना बनाकर परिवार की आय बढ़ाती हैं। सीमित आय के कारण घर में पढ़ाई के लिए आवश्यक सुविधाएं तक उपलब्ध नहीं थीं, न पढ़ने के लिए अलग स्थान, न स्टडी टेबल, और न ही इंटरनेट की नियमित सुविधा।
इन अभावों के बावजूद चांदनी ने शुरुआत से ही अपने लक्ष्य को स्पष्ट रखा। वह बताती हैं कि उन्होंने पहले दिन से ही तय कर लिया था कि उन्हें कुछ बड़ा हासिल करना है और उसी दिशा में उन्होंने लगातार मेहनत की। परीक्षा के दौरान कुछ सवालों को लेकर उन्हें संदेह जरूर हुआ, लेकिन पूरे आत्मविश्वास के साथ उन्होंने अपना प्रदर्शन किया और अंततः सफलता उनके कदम चूमती नजर आई।
तैयारी के दौरान चांदनी को सबसे बड़ा सहारा उनके माता-पिता और शिक्षकों से मिला। जब भी वह मानसिक रूप से कमजोर महसूस करती थीं, उनकी मां उन्हें सकारात्मक बनाए रखने में अहम भूमिका निभाती थीं। वहीं, शिक्षकों ने भी हर स्तर पर उनका मार्गदर्शन किया, जिससे उनका आत्मविश्वास लगातार बना रहा।
उनकी दिनचर्या भी किसी संघर्ष से कम नहीं थी। रोजाना करीब 45 मिनट का सफर तय कर वह ऑटो और बस से स्कूल पहुंचती थीं। स्कूल के बाद कोचिंग और फिर घर लौटकर पढ़ाई यह सिलसिला रोज चलता था। खास बात यह रही कि जब घर पर कोई नहीं होता था, तो वह उसी समय को सबसे ज्यादा उपयोगी बनाते हुए पूरी एकाग्रता के साथ पढ़ाई करती थीं।
आर्थिक तंगी का असर उनकी पढ़ाई पर साफ दिखता था। कई बार किताबें खरीदने के लिए भी उन्हें कई बार सोचना पड़ता था। ऐसे में उन्होंने दूसरों से किताबें लेकर पढ़ाई की, ताकि परिवार पर अतिरिक्त बोझ न पड़े। एक समय ऐसा भी आया जब परिस्थितियां इतनी कठिन हो गईं कि उनके मन में पढ़ाई छोड़कर काम करने का विचार आया, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और अपने लक्ष्य पर डटी रहीं।
परिवार की परिस्थितियां भी उनके लिए बड़ी चुनौती बनीं। छोटे से घर में पढ़ाई के लिए अनुकूल माहौल बनाना आसान नहीं था। इसके अलावा, एक समय उनके पिता के हाथ में चोट लग गई, जिससे परिवार की आर्थिक स्थिति और बिगड़ गई। उस दौर में पढ़ाई जारी रखना और भी मुश्किल हो गया था, लेकिन परिवार और शिक्षकों के सहयोग से उन्होंने हार नहीं मानी। कोचिंग संचालकों ने भी फीस में सहयोग कर उनका हौसला बढ़ाया।
चांदनी का सपना भी उतना ही बड़ा है जितनी उनकी उपलब्धि। वह आगे चलकर भारतीय सेना में लेफ्टिनेंट बनकर देश की सेवा करना चाहती हैं। उनकी यह आकांक्षा बताती है कि उनका लक्ष्य सिर्फ व्यक्तिगत सफलता तक सीमित नहीं है, बल्कि वह देश के लिए भी कुछ करना चाहती हैं।
चांदनी की सफलता के पीछे उनके माता-पिता का त्याग भी साफ झलकता है। उनकी मां बिमला बताती हैं कि कम आय के बावजूद उन्होंने कभी बेटी को आर्थिक कठिनाइयों का अहसास नहीं होने दिया। उन्होंने हर संभव कोशिश की कि चांदनी की पढ़ाई में कोई बाधा न आए। भावुक होते हुए उन्होंने कहा कि जब उनके पति के हाथ में चोट लगी थी, तब हालात और कठिन हो गए थे, लेकिन फिर भी उन्होंने किसी तरह पढ़ाई जारी रखी।
वहीं, उनके पिता रामभुवन विश्वकर्मा अपनी बेटी की उपलब्धि पर गर्व महसूस करते हैं। उनका कहना है कि तमाम परेशानियों के बावजूद उनकी बेटी ने जो मुकाम हासिल किया है, वह उनके लिए किसी सपने के सच होने जैसा है। उन्होंने कहा कि उनका सपना था कि उनकी बेटी कुछ बड़ा करे, और आज उसने वह सपना पूरा कर दिखाया। मोहल्ले के लोगों ने भी इस पूरे सफर में उनका साथ दिया और हमेशा सकारात्मक माहौल बनाए रखा।
चांदनी की यह सफलता सिर्फ एक व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं है, बल्कि यह उन हजारों छात्रों के लिए प्रेरणा है, जो सीमित संसाधनों के बावजूद बड़े सपने देखने का साहस रखते हैं। यह कहानी बताती है कि अगर इरादे मजबूत हों, तो अभाव भी रास्ता नहीं रोक सकते।
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