
भोपाल। खरगोन शहर के बिस्टान नाका तिराहा पर आदिवासी जननायक और क्रांति सूर्य टंट्या मामा की स्थापित की गई मूर्ति को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। संगमरमर या धातु की बजाय फाइबर (एफआरपी मटेरियल) से बनी मूर्ति लगाए जाने का मामला सामने आने के बाद प्रशासनिक हलकों में हड़कंप मच गया। जैसे ही इस गड़बड़ी की पुष्टि हुई, जिला कलेक्टर भव्या मित्तल ने सख्त रुख अपनाते हुए मूर्ति को तत्काल हटाकर मानक के अनुरूप नई मूर्ति लगाने और दोषी अधिकारियों व ठेकेदार के खिलाफ कार्रवाई के निर्देश दिए।
मामले ने जब तूल पकड़ा तो नगर पालिका और जिला प्रशासन को पूरे मामले में यू-टर्न लेना पड़ा। अब नगर पालिका ने फाइबर की मूर्ति को हटाकर संगमरमर या अन्य पत्थर की मूर्ति लगाने का निर्णय लिया है। गुरुवार को इस मुद्दे पर नगर पालिका की बैठक हुई, जिसमें दोबारा टेंडर जारी करने और दोषियों पर कार्रवाई करने का फैसला लिया गया।
गौरतलब है कि बीते 15 नवंबर 2025 को खरगोन के बिस्टान नाका तिराहा पर टंट्या मामा की मूर्ति का लोकार्पण बड़े समारोह के साथ किया गया था। कार्यक्रम में क्षेत्रीय विधायक बालकृष्ण पाटीदार, कलेक्टर भव्या मित्तल, नगर पालिका अध्यक्ष छाया जोशी और भाजपा जिलाध्यक्ष नंदा ब्रह्माणे मौजूद रहे। उस समय किसी को अंदाजा नहीं था कि जिस मूर्ति का लोकार्पण किया जा रहा है, वह कागजों में तो ब्रॉन्ज, मार्बल या संगमरमर की बताई गई थी, लेकिन वास्तव में वह फाइबर से निर्मित थी। मामला उजागर होने के बाद यह सवाल उठने लगे कि आखिर जिम्मेदार अधिकारियों ने बिना जांच-पड़ताल के मूर्ति का लोकार्पण कैसे कर दिया।
नगर पालिका परिषद सम्मेलन में 24 सितंबर 2025 को टंट्या मामा तिराहे के सौंदर्यीकरण कार्य के लिए विचार-विमर्श कर लगभग 40 लाख रुपए की प्रशासनिक एवं वित्तीय स्वीकृति दी गई थी। स्वीकृत आदेश में तिराहे के सौंदर्यीकरण का उल्लेख तो किया गया, लेकिन यह स्पष्ट नहीं किया गया कि किन-किन कार्यों को इसमें शामिल किया जाएगा।
बाद में मूर्ति क्रय करने के आदेशों में स्पष्ट रूप से ब्रॉन्ज, मार्बल या संगमरमर की मूर्ति का जिक्र किया गया था। इसके बावजूद ठेकेदार द्वारा फाइबर की मूर्ति लाकर स्थापित कर दी गई और नगर पालिका के जिम्मेदार अधिकारियों ने बिना आपत्ति के उसे स्वीकार कर लिया।
कार्यालय कलेक्टर एवं जिला दंडाधिकारी खरगोन के पत्र क्रमांक 11106/जी ए डी/2025, दिनांक 12 नवंबर 2025 के अनुसार मूर्ति स्थापना की अनुमति देते हुए साफ लिखा गया था कि प्रतिमा का निर्माण पक्के पत्थर अथवा धातु से होना चाहिए। इसके साथ ही कलेक्टर ने यह भी निर्देश दिए थे कि स्थापना से पहले संबंधित विभागों से एनओसी ली जाए।
लेकिन हैरानी की बात यह है कि नगर पालिका के जिम्मेदार अधिकारियों ने इन आदेशों के पहले ही सारी फॉर्मेलिटी पूरी कर ली थी। यहां तक कि कलेक्टर के आदेश जारी होने से पहले ही जीईएम पोर्टल पर टेंडर जारी कर दिया गया था। इससे यह साफ होता है कि नियमों और प्रक्रियाओं को दरकिनार कर जल्दबाजी में काम निपटाया गया।
जैसे ही यह मामला सामने आया, शहर में विरोध शुरू हो गया। आदिवासी समाज और सामाजिक संगठनों ने इसे टंट्या मामा के सम्मान के साथ खिलवाड़ बताया। दबाव बढ़ता देख नगर पालिका और जिला प्रशासन को अपना रुख बदलना पड़ा। अब तय किया गया है कि फाइबर की मूर्ति हटाकर संगमरमर या अन्य पत्थर की मूर्ति लगाई जाएगी। नगर पालिका की बैठक में यह भी निर्णय लिया गया कि मूर्ति लगाने के लिए नया टेंडर जारी किया जाएगा और पूरे मामले की जांच कर दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।
इस पूरे मामले में जिम्मेदारी तय करने को लेकर सवाल खड़े हो गए हैं। मुख्य नगर पालिका अधिकारी खरगोन कमला कौलका का कहना है, “गलती ठेकेदार की है। ठेकेदार ने अपनी गलती स्वीकार भी कर ली है। इसी बारे में मीटिंग बुलाई गई थी।”
हालांकि सवाल यह भी है कि अगर ठेकेदार ने गलती की, तो नगर पालिका के अधिकारियों ने बिना जांच किए मूर्ति को कैसे स्वीकार कर लिया और लोकार्पण तक कैसे करवा दिया।
द मूकनायक से बातचीत में कांग्रेस विधायक और जयस नेता डॉ. हीरालाल अलावा ने कहा कि टंट्या मामा जैसे आदिवासी जननायक की मूर्ति के साथ इस तरह का खिलवाड़ केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि आदिवासी समाज के सम्मान पर सीधा हमला है। कागजों में संगमरमर या धातु की मूर्ति और जमीन पर फाइबर की प्रतिमा लगाना भ्रष्टाचार और मिलीभगत की ओर साफ इशारा करता है।
उन्होंने कहा कि यह मामला सिर्फ एक मूर्ति का नहीं है, बल्कि यह दिखाता है कि सरकार और स्थानीय प्रशासन आदिवासी नायकों और उनके सम्मान को कितनी गंभीरता से लेता है। अगर समय रहते विरोध नहीं होता तो यह गड़बड़ी दबा दी जाती।
डॉ. अलावा ने मांग की कि इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच हो, ठेकेदार के साथ-साथ जिन अधिकारियों ने आंख मूंदकर गलत मूर्ति स्वीकार की, उन पर भी सख्त कार्रवाई की जाए। उन्होंने कहा कि टंट्या मामा की मूर्ति उसी गरिमा और गुणवत्ता के साथ लगे, जैसा उनके संघर्ष और बलिदान के अनुरूप है, वरना आदिवासी समाज इसे कभी स्वीकार नहीं करेगा।
टंट्या मामा आदिवासी समाज के लिए केवल एक ऐतिहासिक व्यक्तित्व नहीं, बल्कि संघर्ष और स्वाभिमान का प्रतीक हैं। ऐसे में उनकी मूर्ति के साथ इस तरह की लापरवाही और नियमों की अनदेखी को लोग सीधे तौर पर उनके सम्मान से जोड़कर देख रहे हैं।
टंट्या मामा, जिन्हें टंट्या भील के नाम से भी जाना जाता है, मध्यप्रदेश और आसपास के क्षेत्रों में ब्रिटिश शासन के खिलाफ संघर्ष करने वाले एक महान आदिवासी जननायक थे। उनका जन्म 19वीं सदी में निमाड़–मालवा क्षेत्र में एक भील आदिवासी परिवार में हुआ था। अंग्रेजों और देशी रियासतों द्वारा आदिवासियों की जमीन, जंगल और अधिकार छीने जाने के खिलाफ उन्होंने सशस्त्र और जनआंदोलन खड़ा किया। वे गरीबों, किसानों और आदिवासियों के बीच “मामा” के नाम से लोकप्रिय हुए, क्योंकि वे लोगों की मदद करते थे और अन्याय के खिलाफ खुलकर खड़े रहते थे।
टंट्या मामा ने ब्रिटिश शासन, जमींदारों और सूदखोरों के अत्याचारों का डटकर मुकाबला किया। वे लूटे गए धन और अनाज को गरीबों में बांट देते थे, इसी वजह से उन्हें “आदिवासी रॉबिनहुड” भी कहा जाता है। आखिरकार अंग्रेजों ने उन्हें पकड़ लिया और 4 दिसंबर 1889 को जबलपुर जेल में फांसी दे दी। आज टंट्या मामा आदिवासी समाज के स्वाभिमान, संघर्ष और अधिकारों के प्रतीक माने जाते हैं।
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