MP के जबलपुर में दूषित भोजन बना मौत की वजह: आदिवासी छात्रावास में लापरवाही से गई 14 वर्षीय छात्र की जान, क्या है मामला?

खाद्य विभाग की रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया है कि घटिया भोजन खाने से सिर्फ राजाराम ही नहीं, बल्कि अन्य 12 छात्रों की तबीयत भी बिगड़ी थी।
MP के जबलपुर में दूषित भोजन बना मौत की वजह: आदिवासी छात्रावास में लापरवाही से गई 14 वर्षीय छात्र की जान, क्या है मामला?
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भोपाल। मध्यप्रदेश के जबलपुर जिले के कुंडम तहसील स्थित हरदुली आदिवासी छात्रावास में 21 अगस्त को हुई एक छात्र की मौत अब महज एक हादसा नहीं, बल्कि गंभीर प्रशासनिक लापरवाही और भ्रष्ट व्यवस्था का नतीजा साबित हो रही है। प्रशासनिक जांच रिपोर्ट, पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट और बिसरा जांच से साफ हो गया है कि छात्र की मौत किसी बीमारी से नहीं, बल्कि छात्रावास में परोसे गए दूषित और घटिया भोजन के कारण हुई।

जांच में यह भी उजागर हुआ है कि छात्रावास अधीक्षक गजेंद्र झारिया ही घटिया किस्म की खाद्य सामग्री गांव से मंगवाते थे और कर्मचारियों पर दबाव डालकर उसी से खाना बनवाया जाता था। इसी भोजन को खाने के बाद 13 छात्र बीमार पड़े, जिनमें से एक छात्र की मौत हो गई। रिपोर्ट सामने आने के बाद कुंडम पुलिस ने अधीक्षक के खिलाफ विभिन्न धाराओं में मामला दर्ज कर लिया है और अब यह भी जांच की जा रही है कि इस पूरे मामले में और कौन-कौन जिम्मेदार है।

भोजन के बाद बिगडी थी तबियत

कुंडम के ग्राम बिलटुकरी निवासी छोटेलाल धुर्वे का 14 वर्षीय बेटा राजाराम धुर्वे हरदुली आदिवासी छात्रावास में रहकर नवमीं कक्षा में पढ़ाई कर रहा था। 20 अगस्त को छात्रावास में राजाराम सहित कुल 13 छात्रों ने भोजन किया। भोजन करने के कुछ ही समय बाद अचानक छात्रों की तबीयत बिगड़ने लगी। किसी को तेज उल्टियां होने लगीं, किसी को चक्कर आए और कुछ छात्र बेहोश होकर गिर पड़े। छात्रावास में अफरा-तफरी मच गई। सूचना मिलने पर परिजन छात्रावास पहुंचे और अपने-अपने बच्चों को घर ले गए।

गंभीर रूप से बीमार छात्रों को तुरंत अस्पताल में भर्ती कराया गया। राजाराम की हालत लगातार बिगड़ती गई, जिसके बाद 21 अगस्त को उसे जबलपुर रेफर किया गया, लेकिन रास्ते में ही उसकी मौत हो गई। अगले दिन 22 अगस्त को कुंडम पुलिस ने पोस्टमॉर्टम कराने के बाद शव परिजनों को सौंप दिया, लेकिन उस समय तक यह स्पष्ट नहीं था कि मौत का असली कारण क्या है।

मामले की गंभीरता को देखते हुए पुलिस ने मृत छात्र राजाराम का बिसरा सुरक्षित कर रीजनल फॉरेंसिक साइंस लैब, जबलपुर जांच के लिए भेजा। पोस्टमॉर्टम करने वाले डॉक्टर की क्वेरी पर आरएफएसएल की रिपोर्ट ने स्थिति साफ कर दी। रिपोर्ट में कहा गया कि बच्चे की मौत किसी सामान्य बीमारी से नहीं, बल्कि विषाक्त और दूषित भोजन खाने से हुई है।

इसी के बाद प्रशासनिक और खाद्य विभाग की जांच को तेज किया गया। खाद्य विभाग की टीम छात्रावास पहुंची और वहां से सूखा गेहूं, आटा, चावल और अरहर दाल के नमूने लिए गए। लैब में जांच के बाद ये सभी नमूने खराब क्वालिटी और खाने योग्य नहीं पाए गए। खाद्य विभाग ने अपनी रिपोर्ट पुलिस को सौंप दी, जिसमें साफ लिखा गया कि इन घटिया खाद्य पदार्थों के सेवन से ही छात्रों की तबीयत बिगड़ी थी।

प्रशासनिक जांच में छात्रावास अधीक्षक गजेंद्र झारिया की भूमिका सबसे ज्यादा संदिग्ध पाई गई। जांच टीम ने पाया कि जुलाई महीने में ही उनकी पदस्थापना हरदुली आदिवासी छात्रावास में हुई थी, लेकिन इसके बावजूद वे नियमित रूप से छात्रावास में नहीं रहते थे। वे 15 दिन में एक-दो बार ही छात्रावास आते थे और छात्रों की पढ़ाई, भोजन और स्वास्थ्य को लेकर कोई गंभीर निगरानी नहीं करते थे। कर्मचारियों और स्थानीय लोगों के बयान में यह बात सामने आई कि अधीक्षक खुद गांव से सस्ती और घटिया किस्म की खाद्य सामग्री मंगवाते थे।

जब कर्मचारी अच्छी क्वालिटी का सामान लाने की बात करते थे तो उन पर दबाव बनाया जाता था कि वही सस्ता सामान इस्तेमाल किया जाए। इसी दबाव में कर्मचारियों ने घटिया सामग्री से भोजन तैयार किया, जिसे बच्चों को परोसा गया और वही भोजन उनकी बीमारी और एक छात्र की मौत का कारण बना।

खाद्य विभाग की रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया है कि घटिया भोजन खाने से सिर्फ राजाराम ही नहीं, बल्कि अन्य 12 छात्रों की तबीयत भी बिगड़ी थी। अगर समय रहते इलाज न मिलता तो और भी जानें जा सकती थीं। रिपोर्ट आने के बाद कुंडम पुलिस ने अधीक्षक गजेंद्र झारिया के खिलाफ अलग-अलग धाराओं में मामला दर्ज कर लिया है। पुलिस का कहना है कि यह सिर्फ लापरवाही नहीं, बल्कि जानबूझकर घटिया सामान इस्तेमाल कराने का मामला भी हो सकता है। इसलिए यह भी जांच की जा रही है कि इस पूरे मामले में और कौन-कौन लोग शामिल थे, क्या किसी ठेकेदार, सप्लायर या अन्य कर्मचारी की भी इसमें भूमिका थी।

कांग्रेस ने उठाए सवाल

द मूकनायक से बातचीत में आदिवासी कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष रामू टेकाम ने कहा कि यह घटना केवल एक बच्चे की मौत नहीं है, बल्कि यह सरकारी सिस्टम की लापरवाही और संवेदनहीनता का जीता-जागता सबूत है। सरकार जिन छात्रावासों को आदिवासी बच्चों के उज्ज्वल भविष्य का आधार बताती है, वहीं अगर बच्चों को घटिया और दूषित भोजन दिया जाएगा तो यह सीधे-सीधे उनके जीवन से खिलवाड़ है।

उन्होंने कहा कि एक गरीब आदिवासी परिवार का बेटा सिर्फ इसलिए मर गया क्योंकि कुछ लोग अपने पद और जिम्मेदारी को भूलकर सस्ती सामग्री के लालच में बच्चों की सेहत से समझौता कर रहे थे। यह सिर्फ अधीक्षक की गलती नहीं हो सकती, इसके पीछे पूरा सिस्टम जिम्मेदार है।

रामू टेकाम ने मांग की कि इस मामले की निष्पक्ष और उच्चस्तरीय जांच हो, ताकि यह साफ हो सके कि गड़बड़ी कहां-कहां तक फैली है। दोषियों को कड़ी से कड़ी सजा दी जाए, ताकि भविष्य में किसी और आदिवासी बच्चे को इस तरह अपनी जान न गंवानी पड़े।

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