बस्तर में 'घर वापसी' के नाम पर क्या-क्या हो रहे हैं आदिवासी ईसाई परिवारों के साथ जुल्म

आदिवासी परिवारों पर अत्याचार, हिंदू धर्म अपनाने का दबाव
इंटरनेशनल क्रिश्चियन कंसर्न की एक हालिया रिपोर्ट में बताया गया है कि छत्तीसगढ़ के कांकेर जिले के 32 गांवों में 180 से अधिक ईसाई परिवारों को पिछले तीन हफ्तों से सामुदायिक जल स्रोतों और आजीविका के अवसरों से वंचित रखा गया है, क्योंकि उन्होंने अपने ईसाई धर्म को छोड़ने से इनकार कर दिया था।
इंटरनेशनल क्रिश्चियन कंसर्न की एक हालिया रिपोर्ट में बताया गया है कि छत्तीसगढ़ के कांकेर जिले के 32 गांवों में 180 से अधिक ईसाई परिवारों को पिछले तीन हफ्तों से सामुदायिक जल स्रोतों और आजीविका के अवसरों से वंचित रखा गया है, क्योंकि उन्होंने अपने ईसाई धर्म को छोड़ने से इनकार कर दिया था।(Ai Image)
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बस्तर/छत्तीसगढ़- बस्तर के बदेपारोदा गांव (थाना बदनजी) के रहने वाले 50 वर्षीय गोविंद मंडावी का जीवन पिछले दो सालों में पूरी तरह से उजड़ गया है। आरएसएस और बजरंग दल के उत्पीड़न और जान से मारने की धमकियों के चलते मंडावी और उनके परिवार को अपना घर-बार और पुश्तैनी जमीन छोड़कर दूसरी जगह जाकर नई जिंदगी शुरू करने को मजबूर होना पड़ा है।

मंडावी ने बताया कि वह मूल रूप से इसी क्षेत्र के निवासी हैं। 2017 में उन्होंने, उनके परिवार और करीब 15-20 अन्य परिवारों ने बिना किसी दबाव के ईसाई धर्म अपना लिया था। मंडावी के मुताबिक, "पहले हालात ठीक थे, लेकिन पिछले दो सालों से आरएसएस और बजरंग दल ने हमारे जीवन का नरक बना दिया है।"

2024 में मंडावी और तीन अन्य परिवारों को लगातार हिंसक धमकियों के चलते गांव छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा। मंडावी ने बताया, "उन्होंने हमें बहुत पीटा। हम घायल हो गए और दिनों तक दर्द से कराहते रहे।" ये परिवार आदिवासी ईसाई समुदाय से हैं और खेती-बाड़ी करते हैं। मंडावी कहते हैं, "हम सिर्फ किसान हैं, अपनी जमीन पर खेती करते हैं। हमारा धर्म हमारी अपनी पसंद है।"

गोविंद मंडावी ने आरोप लगाया कि बजरंग दल के बदमाशों ने उनसे कहा कि या तो वे हिंदू धर्म अपना लें या फिर गांव छोड़ दें। "उन्होंने हमसे कई बार घर वापसी करने को कहा और जब हमने इनकार कर दिया, तो धमकी देकर गांव छोड़ने को कहा।"

लगातार धमकियों के कारण 10 से अधिक परिवारों ने डर के कारण ईसाई धर्म छोड़कर हिंदू धर्म स्वीकार कर लिया। मंडावी कहते हैं, "हम उन्हें दोष नहीं देते, हालात इतने खराब हैं।"

जब मंडावी और दूसरों ने धर्म बदलने से इनकार किया, तो उन्हें पानी तक नहीं दिया गया। उनके बोरवेल तोड़ दिए गए, जिससे पीने के पानी के लिए भी तरसना पड़ा। इस सब के चलते 2024 में परिवार को गांव छोड़ना पड़ा। हाल ही में (एक साल से अधिक समय बाद) परिवार वापस लौटा, लेकिन तीन महीने के भीतर फिर से धमकियां शुरू हो गईं।

इंटरनेशनल क्रिश्चियन कंसर्न की एक हालिया रिपोर्ट में बताया गया है कि छत्तीसगढ़ के कांकेर जिले के 32 गांवों में 180 से अधिक ईसाई परिवारों को पिछले तीन हफ्तों से सामुदायिक जल स्रोतों और आजीविका के अवसरों से वंचित रखा गया है, क्योंकि उन्होंने अपने ईसाई धर्म को छोड़ने से इनकार कर दिया था।
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वायलेंस का पैटर्न: पिटाई, फसलें बर्बाद और दफनाने से रोकना

यूनाइटेड क्रिश्चियन फोरम (UCF) के अनुसार, मंडावी का मामला कोई अलग नहीं है, बल्कि यह छत्तीसगढ़, ओडिशा और झारखंड में आदिवासी ईसाई परिवारों पर हो रहे उत्पीड़न का एक बड़ा पैटर्न दिखाता है।

  • मार्च 2024: परिवारों के साथ मारपीट, घरों को नुकसान पहुंचाकर गांव से बाहर निकाला गया।

  • जून 2024: फिर से हमला, पंचायत कार्यालय में घसीटकर ले जाया गया, बेहोश होने तक पीटा गया और ईसाई धर्म छोड़ने का दबाव डाला गया।

  • उनकी फसलें नष्ट कर दी गईं, 40 एकड़ से अधिक की उपज लूट ली गई और उन्हें दफनाने के अधिकार से भी वंचित किया गया।

यूनाइटेड क्रिश्चियन फोरम ने 2025 में दफनाने से जुड़ी 23 घटनाएं दर्ज कीं, जिनमें से 19 अकेले छत्तीसगढ़ में हुईं। 2024 में ऐसे करीब 40 मामले सामने आए, जिनमें छत्तीसगढ़ (30) सबसे आगे था। रिपोर्ट बताती है कि दफन भूमि को लेकर राजनीति की जा रही है और श्मशान घाटों को 'केवल हिंदुओं' के लिए बनाया जा रहा है।

इंटरनेशनल क्रिश्चियन कंसर्न की एक हालिया रिपोर्ट में बताया गया है कि छत्तीसगढ़ के कांकेर जिले के 32 गांवों में 180 से अधिक ईसाई परिवारों को पिछले तीन हफ्तों से सामुदायिक जल स्रोतों और आजीविका के अवसरों से वंचित रखा गया है, क्योंकि उन्होंने अपने ईसाई धर्म को छोड़ने से इनकार कर दिया था।

पुलिस की मिलीभगत और नाकामी

सबसे चौंकाने वाला आरोप मंडावी ने पुलिस के खिलाफ लगाया। उन्होंने बताया, "जब हमें परेशान किया जा रहा था, उस दौरान पुलिस के अधिकारी आरोपियों के साथ मौजूद थे। उन्होंने बदमाशों को जो मर्जी करने दिया और हमें बचाने के लिए कुछ नहीं किया।"

बार-बार शिकायत करने के बावजूद पुलिस ने कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं की। बाद में निजी शिकायत दर्ज कराने पर जनवरी 2025 में जगदलपुर की कोर्ट ने एफआईआर दर्ज करने के आदेश दिए। कुछ गिरफ्तारियां हुईं, लेकिन आरोपी जमानत पर बाहर आ गए।

मकतूब मीडिया से बात करते हुए मंडावी ने बताया कि अब वह अपने परिवार और अन्य परिवारों के साथ दूसरे गांव में शिफ्ट हो चुके हैं। उन्होंने कहा, "हमने उस जगह को हमेशा के लिए छोड़ दिया है।" अपने गांव लौटने की आखिरी कोशिश के बारे में पूछने पर उन्होंने कहा, "उनका तो बस यही चाहिए कि हम हिंदू धर्म अपना लें, लेकिन क्यों? मैं अपने विश्वास पर चलते रहना चाहता हूं।"

उन्होंने उन परिवारों के लिए दुख जताया जो डर के कारण हिंदू धर्म अपनाने को मजबूर हुए। "यह उनकी कोई गलती नहीं है। जीवित रहना जरूरी हो जाता है।"

हालांकि अब वह एक ईसाई बहुल इलाके में हैं, जहां वे अपेक्षाकृत सुरक्षित महसूस करते हैं, लेकिन मंडावी के मन में अपनी पुश्तैनी जमीन और अपने घर को छोड़ने का गम हमेशा रहेगा। वे कहते हैं, "चाहे यहां हालात बेहतर हों, मैं अपनी जमीन और अपने घर के बारे में सोचता हूं। चाहे मैं कहीं भी चला जाऊं, वह जगह कभी मेरा घर नहीं बन सकती।"

(नोट: यह रिपोर्ट मकतूब मीडिया में प्रकाशित निकिता जैन की अंग्रेजी रिपोर्ट का हिंदी अनुवाद है )

इंटरनेशनल क्रिश्चियन कंसर्न की एक हालिया रिपोर्ट में बताया गया है कि छत्तीसगढ़ के कांकेर जिले के 32 गांवों में 180 से अधिक ईसाई परिवारों को पिछले तीन हफ्तों से सामुदायिक जल स्रोतों और आजीविका के अवसरों से वंचित रखा गया है, क्योंकि उन्होंने अपने ईसाई धर्म को छोड़ने से इनकार कर दिया था।
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