नए आपराधिक कानून: लड़कों की खरीद-फरोख्त भी अपराध की श्रेणी में, यौन अपराधों में लैंगिक समानता के आधार पर होगी कार्रवाई

नए कानून में कहा गया है कि अपराधी यौन शोषण के लिए लड़के और लड़कियों दोनों की खरीद-फरोख्त करते हैं। ऐसे मामलों में समानता के आधार पर सजा का प्रावधान किया गया है। इसके अलावा बीएनएसएस कानून के तहत अब संज्ञेय अपराधों को रोकने के निर्देशों की अवहेलना करने वाले को पुलिस हिरासत में ले सकती है।
भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस)
भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस)

नई दिल्ली: सालों पुराने ब्रिटिश काल की भारतीय दंड संहिता की जगह लेने वाले नए कानून भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) के तहत यौन अपराधों में अब लैंगिक समानता के आधार पर कार्रवाई होगी। यौन अपराधों को पीड़ितों और अपराधियों के लिए लैंगिक संदर्भ में तटस्थ बनाने के प्रावधान किए गए हैं।

नए कानून में कहा गया है कि अपराधी यौन शोषण के लिए लड़के और लड़कियों दोनों की खरीद-फरोख्त करते हैं तो ऐसे मामलों में समानता के आधार पर राजा का प्रावधान किया गया है। इसके अलावा भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) कानून के तहत अब संज्ञेय अपराधों को रोकने के निर्देशों की अवहेलना करने वाले को पुलिस हिरासत में ले सकती है। 

भारतीय दंड संहिता की धारा 366ए में नाबालिग “लड़की” शब्द को बीएनएस के खंड 96 में “बच्चे” शब्द से बदल दिया गया है, जिसमें 18 साल से कम उम्र के लड़के और लड़कियों को शामिल किया गया है और उनकी खरीद-फरोख्त के अपराध को दंडनीय बना दिया गया है। 

नए आपराधिक कानून से संबंधित एक व्याख्यात्मक नोट में कहा गया है कि भारतीय दंड संहिता की धारा 366बी को विदेश से लड़की लाए जाने संबंधी वाक्यांश को विदेश से लड़की या लड़के लाए जाने से बदलकर 'लैंगिक संदर्भ में तटस्थ' बना दिया गया है। इसे बीएनएस में खंड 141 के रूप में पेश किया गया है, ताकि 21 साल से कम उम्र की किसी लड़की या 18 साल से कम उम्र के किसी लड़के को इस इरादे से भारत में लाए जाने संबंधी अपराध को शामिल किया जा सके। कि ऐसे व्यक्ति को किसी अन्य व्यक्ति के साथ अवैध यौन कृत्यों के लिए मजबूर किया जाएगा या बहलाया-फुसलाया जाएगा।

बीएनएस में यौन अपराधों से निपटने के लिए महिलाओं और “बच्चों के खिलाफ अपराध” नामक एक नया अध्याय भी पेश किया गया है। बीएनएस में आइपीसी और यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (पाक्सो) अधिनियम से बलात्कार पीड़ितों का आयु आधारित वर्गीकरण किया गया है। 

18, 16 एवं 12 वर्ष से कम उम्र के नाबालिगों के साथ बलात्कार के मामलों में अलग- अलग सजा के विकल्प निर्धारित किए गए हैं। 

व्याख्यात्मक नोट के अनुसार, विभिन्न उम्र के नाबालिगों के साथ बलात्कार के मामलों में दंड की सीमा आइपीसी, पाक्सो और बीएनएस में काफी हद तक समान है। इसमें कहा गया है कि धारा 64(1) बलात्कार के दोषी को 10 साल से लेकर आजीवन कारावास तक की सजा का प्रावधान करती है, जबकि धारा 64 (2) बलात्कार के गंभीर मामलों में 10 साल से लेकर दोषी को शेष जिंदगी के लिए आजीवन कारावास तक की सजा का प्रावधान करती है। 

इसके अतिरिक्त, बीएनएस का खंड 70(2) 18 वर्ष से कम उम्र की किशोरी के साथ सामूहिक बलात्कार संबंधी अपराध को नए सिरे से पारिभाषित करता है। बीएनएस के इस खंड में आइपीसी की धारा 376 डीए और 376 डीबी को मिला दिया गया है और किशोरी के साथ सामूहिक बलात्कार को गंभीर अपराध मानने के लिए उम्र-आधारित मानदंड को हटा दिया गया है।

दस्तावेज में कहा गया है कि नए कानून के तहत सभी नाबालिग लड़कियों के साथ सामूहिक बलात्कार के लिए मौत या आजीवन कारावास की सजा दी जाएगी। 

नए कानून में एक और महत्त्वपूर्ण बदलाव यह है कि बलात्कार की परिभाषा (खंड 63 बीएनएस और धारा 375 आइपीसी) के तहत किसी विवाहित महिला के लिए सहमति की आयु 15 से बढ़ाकर 18 वर्ष कर दी गई है। इसमें कहा गया है कि आइपीसी की धारा 375 के अपवाद 2 में प्रावधान है कि किसी पुरुष और उसकी पत्नी के बीच यौन संबंध, जिसकी पत्नी 15 वर्ष से कम उम्र की न हो, बलात्कार नहीं है। 

बीएनएस के खंड 63 में वैवाहिक बलात्कार संबंधी अपवाद को बरकरार रखा गया है। बीएनएस के तहत बच्चों के खिलाफ होने वाले अपराधों के मामलों को लेकर भी कुछ बदलाव किए गए हैं। दस्तावेज के अनुसार, बीएनएस में नया जोड़ा गया खंड 95 उस व्यक्ति को दंडित करता है, जो 18 वर्ष से कम उम्र के किसी भी व्यक्ति को अपराध करने के लिए काम पर रखता है। 

व्याख्यात्मक नोट के अनुसार, बीएनएस के खंड 135 में 18 वर्ष से कम उम्र के सभी बच्चों के अपहरण को अपराध माना गया है। वहीं, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) कानून के तहत कोई पुलिस अधिकारी किसी संज्ञेय अपराध को रोकने के कानूनी निर्देशों का प्रतिरोध करने या अवहेलना करने वाले व्यक्ति को हिरासत में ले सकता है। यह प्रावधान किसी पुलिस अधिकारी को ऐसे व्यक्ति को हिरासत में लेने और मजिस्ट्रेट के सामने पेश करने या छोटे मामलों में 24 घंटे के भीतर जितनी जल्दी हो सके व्यक्ति को रिहा करने की अनुमति देता है। 

बीएनएसएस के तहत पुलिस अधिकारियों को गैरकानूनी तरीके से जमा हुए लोगों को तितर-बितर करने के किसी कार्यकारी मजिस्ट्रेट के आदेश पर लापरवाही के मामलों में छूट का एक स्तर प्रदान किया गया है। ऐसे मामलों में पुलिस अधिकारी पर सरकार की मंजूरी के बिना मुकदमा नहीं चल सकता। बीएनएसएस के खंड 58 के तहत पुलिस कर्मी किसी गिरफ्तार व्यक्ति को 24 घंटे के अंदर किसी मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश कर सकता है, भले ही उस मजिस्ट्रेट का वह अधिकार क्षेत्र नहीं हो।

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