नई दिल्ली: केंद्र सरकार द्वारा भारत के 80वें स्वतंत्रता दिवस के आधिकारिक कार्यक्रमों में 'वंदे मातरम' का संशोधित संस्करण गाने या बजाने के आदेश का नागालैंड बैपटिस्ट चर्च काउंसिल (एनबीसीसी) ने कड़ा विरोध किया है। चर्च का स्पष्ट रूप से मानना है कि देश के प्रति प्रेम और देशभक्ति की भावना पूरी तरह से स्वैच्छिक होनी चाहिए। इसे किसी भी नागरिक पर जबरन नहीं थोपा जा सकता है।
चर्च के इस कड़े रुख से ठीक पहले नागा स्टूडेंट्स फेडरेशन ने भी इस मुद्दे पर एक बड़ा आह्वान किया था। छात्र संगठन ने स्कूलों और अन्य शैक्षणिक संस्थानों से अपील की थी कि वे अपने छात्रों को स्वतंत्रता दिवस के कार्यक्रमों में हिस्सा लेने के लिए न भेजें। इसके साथ ही, फेडरेशन ने यह भी मांग रखी थी कि जो छात्र अपनी धार्मिक मान्यताओं या अंतरात्मा की आवाज पर 'वंदे मातरम' गाने से इनकार करते हैं, उनके खिलाफ किसी भी तरह की अनुशासनात्मक कार्रवाई या भेदभाव नहीं होना चाहिए।
गुरुवार, 13 अगस्त की शाम को जारी किए गए एक आधिकारिक बयान में, एनबीसीसी ने अपना रुख बिल्कुल साफ कर दिया। परिषद ने कहा कि वह ऐसे किसी भी निर्देश या नियम के सख्त खिलाफ है जो नागरिकों, विशेष रूप से ईसाइयों को 'वंदे मातरम' गाने के लिए मजबूर करता हो। उनका तर्क है कि राष्ट्र के प्रति साझा प्रेम स्वाभाविक रूप से उभरना चाहिए, न कि किसी मजबूरी या दबाव के तहत।
हालांकि, अपना विरोध जताते हुए चर्च निकाय ने सभी संबंधित पक्षों से शांति और रचनात्मक तरीके से अपनी बात रखने की अपील भी की है। परिषद ने आगाह किया है कि राष्ट्रीय प्रतीकों या देशभक्ति से जुड़ी प्रथाओं पर असहमति किसी भी कीमत पर सांप्रदायिक तनाव या सामाजिक विभाजन का कारण नहीं बननी चाहिए।
एनबीसीसी ने अपने बयान में यह भी स्पष्ट किया कि वह भारत के राष्ट्रीय प्रतीकों, देशभक्ति की भावनाओं और संवैधानिक मूल्यों का पूरी तरह से सम्मान करता है। लेकिन इसके साथ ही परिषद ने इस बात पर जोर दिया कि आस्था, अंतरात्मा, धार्मिक विश्वास और गहरी पहचान से जुड़े मामलों में सर्वोच्च स्तर की संवेदनशीलता, समझदारी और सम्मान की आवश्यकता होती है।
चर्च ने केंद्र सरकार को भारत की बहुलवादी और विविध संस्कृति की याद दिलाते हुए कहा कि आस्था या अंतरात्मा के कारणों से जो लोग इस तरह की अभिव्यक्ति को नहीं अपना सकते, उन पर दबाव डालकर राष्ट्रीय एकता को मजबूत नहीं किया जा सकता है।
बयान के अंत में इस बात पर जोर दिया गया कि देश की एकता तभी सबसे अधिक मजबूत होगी जब हर नागरिक, चाहे उसकी आस्था, समुदाय या संस्कृति कुछ भी हो, पूरे विश्वास के साथ कह सके कि इस राष्ट्र में उसका एक उचित स्थान है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि देश में उसकी अंतरात्मा का पूरा सम्मान किया जाएगा।
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