सिजिमाली बॉक्साइट खनन विवाद: आदिवासियों पर पुलिसिया ज्यादती को लेकर ओडिशा हाईकोर्ट सख्त, दिए जांच के आदेश

ओडिशा हाईकोर्ट ने रायगड़ा और कालाहांडी के सिजिमाली पहाड़ी क्षेत्र में बॉक्साइट खनन का विरोध कर रहे आदिवासियों पर हुई पुलिसिया कार्रवाई की जांच के आदेश दिए हैं और जिला प्रशासन से रिपोर्ट तलब की है।
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ओडिशा हाईकोर्ट
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नई दिल्ली: ओडिशा हाईकोर्ट ने रायगड़ा जिला प्रशासन को सिजिमाली पहाड़ी के पास बॉक्साइट खनन का विरोध कर रहे आदिवासी ग्रामीणों पर कथित पुलिसिया ज्यादती की जांच कर अपनी रिपोर्ट सौंपने का सख्त निर्देश दिया है। इसके साथ ही, अदालत ने पुलिस प्रशासन को यह सुनिश्चित करने की हिदायत दी है कि खनन स्थल से सटे गांवों में शांति व्यवस्था बनी रहे और किसी भी प्रकार की हिंसा न भड़के।

मुख्य न्यायाधीश हरीश टंडन और न्यायमूर्ति चित्तरंजन दास की खंडपीठ ने पुरुषोत्तम हिकाका और सात अन्य लोगों द्वारा दायर एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए यह अहम आदेश दिया। रायगड़ा और कालाहांडी जिलों में स्थित सिजिमाली पहाड़ी में प्रस्तावित खनन का कई ग्रामीण लगातार विरोध कर रहे हैं। स्थानीय लोगों का मानना है कि इस खनन परियोजना से उनके जल स्रोत, पारिस्थितिकी और आजीविका पूरी तरह से नष्ट हो जाएगी।

खनन स्थल तक सड़क बनाने के जिला प्रशासन के प्रयास के बाद ग्रामीणों का यह विरोध और भी उग्र हो गया था। सात अप्रैल को दिया गया अदालत का यह आदेश गुरुवार को ऑनलाइन उपलब्ध कराया गया। याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया है कि 10 मार्च की तड़के पुलिस कर्मियों ने कालाहांडी जिले में ग्रामीणों के घरों पर छापेमारी की। इस दौरान घरों में तोड़फोड़ की गई और 10 महिलाओं सहित 21 ग्रामीणों को गिरफ्तार कर लिया गया।

याचिका में यह भी दावा किया गया है कि ग्रामीणों के खिलाफ गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (UAPA), 1967 के तहत कई गंभीर मामले दर्ज कर उन्हें भवानीपटना जेल में डाल दिया गया। याचिकाकर्ताओं के वकील अनूप कुमार महापात्र ने अदालत में दलील दी कि पुलिस द्वारा दरवाजे तोड़कर घरों की गई यह औचक तलाशी 'डी.के. बसु बनाम पश्चिम बंगाल राज्य' मामले में तय किए गए दिशा-निर्देशों का खुला उल्लंघन है।

याचिकाकर्ताओं ने अदालत को एक 19 वर्षीय गर्भवती महिला और तीन अन्य महिलाओं तथा उनके बच्चों के साथ किए गए अमानवीय व्यवहार से भी अवगत कराया। आरोप है कि इन महिलाओं को उनकी हिरासत का कारण बताए बिना ही जबरन गिरफ्तार कर लिया गया था।

दूसरी ओर, राज्य सरकार के वकील शास्वत दास ने पुलिस कार्रवाई का बचाव करते हुए अपनी दलील पेश की। उन्होंने कहा कि पुलिसकर्मी वास्तव में अदालत द्वारा जारी किए गए गैर-जमानती वारंट की तामील करने वहां गए थे। लेकिन अपनी ड्यूटी निभाने के दौरान उन पर जानलेवा हमला किया गया, जिसके परिणामस्वरूप 58 पुलिसकर्मी घायल हो गए। इस पूरे मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए अब अगली सुनवाई 2 सितंबर को तय की गई है।

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