
भोपाल। मध्यप्रदेश के इंदौर शहर में साइबर ठगी का एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जिसमें 10वीं कक्षा के एक छात्र की फोटो का दुरुपयोग कर डीपफेक वीडियो बनाया गया और परिवार से 1 लाख 2 हजार रुपये की ठगी कर ली गई। पूरा मामला तब शुरू हुआ जब स्कूल की छुट्टियों के दौरान घरवालों ने किसी बात पर छात्र को डांट दिया। इसके बाद वह ट्यूशन के लिए घर से निकला, लेकिन देर रात तक वापस नहीं लौटा। चिंतित परिजनों ने उसकी गुमशुदगी की सूचना सोशल मीडिया पर फोटो और संपर्क नंबर के साथ साझा कर दी और साथ ही स्थानीय थाने में शिकायत भी दर्ज कराई।
इसी सार्वजनिक जानकारी का फायदा उठाते हुए एक बदमाश ने छात्र की फोटो से फर्जी वीडियो तैयार किया। आरोपी ने वीडियो कॉल के माध्यम से परिवार को यह विश्वास दिलाने की कोशिश की कि बच्चे का अपहरण कर लिया गया है। वीडियो में छात्र को चाकू मारते हुए दिखाया गया और धमकी दी गई कि यदि मांग पूरी नहीं की गई तो उसकी जान ले ली जाएगी। अचानक आए इस कॉल और भयावह दृश्य से परिवार घबरा गया।
घबराए परिवार से आरोपी ने क्यूआर कोड के जरिए 1 लाख 2 हजार रुपये ट्रांसफर करवा लिए। रकम भेजने के बाद भी परिवार दहशत में रहा। लेकिन अगले ही दिन स्थिति तब बदली जब छात्र ने अपने एक दोस्त को फोन कर बताया कि वह सुरक्षित है और सांवरिया सेठ क्षेत्र में मौजूद है। जब परिवार ने उससे सीधे बात की तो स्पष्ट हो गया कि उसका अपहरण हुआ ही नहीं था। तब जाकर यह खुलासा हुआ कि वीडियो फर्जी था और परिवार साइबर ठगी का शिकार बन चुका है।
परिजनों ने तुरंत इस संबंध में शिकायत दर्ज कराई, जिसके बाद मामले की जांच क्राइम ब्रांच को सौंपी गई। प्रारंभिक जांच में यह स्पष्ट हुआ कि आरोपी ने डीपफेक तकनीक का इस्तेमाल कर वीडियो तैयार किया था, जिससे परिजन भ्रमित हो गए।
क्राइम ब्रांच की प्रारंभिक जांच में चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। जिस मोबाइल नंबर से वीडियो कॉल किया गया, वह सिम हरियाणा राज्य की पाई गई है। वहीं जिस क्यूआर कोड के माध्यम से पैसे मंगवाए गए, वह उत्तर प्रदेश के एक बैंक खाते से जुड़ा था। इसके अलावा यह भी जानकारी मिली है कि ठगी की गई रकम बिहार के एक एटीएम से निकाली जा चुकी है। इससे स्पष्ट है कि यह मामला एक अंतरराज्यीय साइबर गिरोह से जुड़ा हो सकता है।
क्राइम ब्रांच ने संबंधित बैंक से खाते की डिटेल और एटीएम फुटेज उपलब्ध कराने के लिए ई-मेल के जरिए संपर्क किया है। फुटेज और बैंकिंग ट्रेल के आधार पर आरोपियों की पहचान और लोकेशन ट्रैक करने की कोशिश की जा रही है।
एडिशनल डीसीपी क्राइम ब्रांच राजेश दंडोतिया ने बताया कि इस मामले में टेक्निकल एविडेंस जुटाए जा रहे हैं। कॉल डिटेल रिकॉर्ड (CDR), बैंक ट्रांजेक्शन ट्रेल, आईपी एड्रेस और डिजिटल फुटप्रिंट की गहन जांच की जा रही है। टीम को कई महत्वपूर्ण सुराग मिले हैं और उन पर तेजी से काम किया जा रहा है। संभावना है कि अगले सप्ताह अलग-अलग राज्यों में संदिग्ध ठिकानों पर छापेमारी की कार्रवाई की जा सकती है।
उन्होंने यह भी संकेत दिया कि डीपफेक तकनीक का उपयोग कर ठगी के मामलों में वृद्धि हो रही है, जिससे आम नागरिकों को सतर्क रहने की आवश्यकता है।
यह मामला इस बात का उदाहरण है कि सोशल मीडिया पर साझा की गई संवेदनशील जानकारी का गलत इस्तेमाल किस तरह किया जा सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार, गुमशुदगी की सूचना साझा करते समय केवल आवश्यक जानकारी ही सार्वजनिक की जानी चाहिए और किसी भी संदिग्ध कॉल या वीडियो की तुरंत पुलिस से पुष्टि करनी चाहिए। बिना सत्यापन के पैसे ट्रांसफर करना भारी नुकसान का कारण बन सकता है।
इंदौर में सामने आया यह मामला न केवल साइबर अपराध के नए तरीके को उजागर करता है, बल्कि यह भी दिखाता है कि तकनीक का दुरुपयोग कर किस तरह भावनात्मक दबाव बनाकर लोगों को ठगा जा रहा है। अब सबकी नजर क्राइम ब्रांच की कार्रवाई पर टिकी है कि इस अंतरराज्यीय गिरोह तक पुलिस कब तक पहुंच पाती है।
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