
भोपाल। एमपी में पन्ना जिले के मझगांव डैम से प्रभावित आदिवासी परिवारों के पूर्ण मुआवजे, उचित पुनर्वास और वैधानिक अधिकारों की मांग को लेकर चल रहा चिता आंदोलन 23वें दिन भी जारी रहा। आंदोलन के नेतृत्वकर्ता अमित भटनागर पिछले सात दिनों से पन्ना जेल में आमरण अनशन पर थे। रविवार को उन्हें पन्ना जेल से रीवा स्थित संजय गांधी मेमोरियल अस्पताल ले जाकर भर्ती कराया गया।
अमित भटनागर को अस्पताल ले जाने के बाद आंदोलन को लेकर एक बार फिर प्रशासन और आंदोलनकारियों के बीच टकराव की स्थिति सामने आई है। जहां प्रशासन की ओर से उनके स्वास्थ्य को देखते हुए अस्पताल में उपचार की व्यवस्था किए जाने की बात कही जा रही है, वहीं अमित भटनागर का कहना है कि उन्हें अस्पताल में भर्ती कराकर उनके आमरण अनशन को खत्म कराने का प्रयास किया जा रहा है।
जेल में सात दिन से जारी था आमरण अनशन
मझगांव डैम से प्रभावित परिवारों की मांगों को लेकर आंदोलन कर रहे अमित भटनागर को जेल भेजे जाने के बाद उन्होंने वहीं आमरण अनशन शुरू कर दिया था। आंदोलनकारियों के अनुसार, पिछले सात दिनों से वह जेल में भोजन नहीं ले रहे थे और अपनी मांगों को लेकर अनशन पर थे।
रविवार को प्रशासन ने उन्हें पन्ना जेल से रीवा के संजय गांधी मेमोरियल अस्पताल पहुंचाया। अस्पताल में भर्ती किए जाने के बाद उनके स्वास्थ्य की जांच और उपचार की व्यवस्था की गई है।
हालांकि, अस्पताल पहुंचने के बाद अमित भटनागर ने अपने संदेश में कहा कि उनका संघर्ष समाप्त नहीं हुआ है। उन्होंने कहा कि उन्हें किसी दूसरे स्थान पर ले जाने से आंदोलन की मांगें खत्म नहीं हो जातीं।
अस्पताल में भी जारी रहेगा आमरण अनशन
अमित भटनागर ने अस्पताल से संदेश जारी करते हुए कहा कि उनका स्वास्थ्य ठीक है और उन्हें जबरन अस्पताल लाकर भर्ती कराया गया है। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रशासन उनके आमरण अनशन को समाप्त करवाना चाहता है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि जब तक मझगांव डैम से प्रभावित सभी ग्रामीण आदिवासी परिवारों, महिलाओं और किसानों को पूर्ण मुआवजा, उचित पुनर्वास और उनके वैधानिक अधिकार नहीं मिलते, तब तक उनका आमरण अनशन जारी रहेगा।
अमित भटनागर ने कहा कि यदि प्रशासन उन्हें अस्पताल में रखता है तो वह अस्पताल में भी अपना अनशन जारी रखेंगे। उनके मुताबिक, आंदोलन का उद्देश्य किसी व्यक्ति विशेष के लिए नहीं बल्कि डैम से प्रभावित परिवारों के अधिकारों और न्याय की मांग को लेकर है।
मझगांव डैम स्थल पर भी जारी है आंदोलन
अमित भटनागर को अस्पताल ले जाने के बावजूद मझगांव डैम स्थल पर प्रभावित ग्रामीणों का आंदोलन जारी है। आंदोलनकारी परिवारों का कहना है कि डैम परियोजना से प्रभावित लोगों को उनकी जमीन, घर और अन्य संपत्तियों के बदले घोषित नियमों के अनुसार पूरा मुआवजा दिया जाना चाहिए।
ग्रामीण उचित पुनर्वास की भी मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि केवल मुआवजे की घोषणा पर्याप्त नहीं है, बल्कि विस्थापित होने वाले परिवारों के रहने, आजीविका और भविष्य की सुरक्षा से जुड़े अधिकारों को भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
आंदोलनकारियों का कहना है कि प्रभावित परिवारों की समस्याओं का समाधान किए बिना परियोजना से जुड़े काम आगे बढ़ाना उनके साथ अन्याय होगा।
गिरफ्तार आंदोलनकारियों की रिहाई की मांग
चिता आंदोलन से जुड़े ग्रामीणों और संगठनों की ओर से जेल में बंद आंदोलनकारियों की रिहाई की मांग भी लगातार उठाई जा रही है। आंदोलनकारियों ने अमित भटनागर के साथ दिव्या अहिरवार, हिसाबी राजपूत सहित अन्य ग्रामीणों को रिहा करने की मांग की है।
आंदोलनकारियों का कहना है कि आंदोलन को दबाने या आंदोलनकारियों को गिरफ्तार करने से उनकी मूल समस्याएं समाप्त नहीं होंगी। उनका कहना है कि सरकार को आंदोलनकारियों के साथ बातचीत कर उनकी मांगों का समाधान करना चाहिए।
सरकार और प्रशासन से बातचीत की मांग
आंदोलनकारियों ने सरकार और प्रशासन से तत्काल संवाद स्थापित करने की अपील की है। उनका कहना है कि मुआवजा, पुनर्वास और वैधानिक अधिकारों से जुड़े मुद्दों पर प्रभावित परिवारों के प्रतिनिधियों के साथ बैठकर स्पष्ट निर्णय लिया जाना चाहिए।
आंदोलनकारियों के अनुसार, प्रभावित परिवार लंबे समय से अपनी मांगों को लेकर संघर्ष कर रहे हैं। ऐसे में सरकार को मामले को गंभीरता से लेते हुए प्रभावित ग्रामीणों की शिकायतों और मांगों का स्थायी समाधान करना चाहिए।
न्याय मिलने तक आंदोलन जारी रहेगा
चिता आंदोलन के 23वें दिन आंदोलनकारियों ने एक बार फिर स्पष्ट किया कि अमित भटनागर को अस्पताल में भर्ती किए जाने या अन्य आंदोलनकारियों की गिरफ्तारी से आंदोलन समाप्त नहीं होगा।
आंदोलनकारियों का कहना है कि जब तक मझगांव डैम से प्रभावित परिवारों को पूर्ण मुआवजा, उचित पुनर्वास और उनके सभी वैधानिक अधिकार नहीं मिल जाते, तब तक उनका संघर्ष जारी रहेगा।
आंदोलनकारियों ने अपने संघर्ष का नारा दोहराते हुए कहा- “न्याय दो या मार दो।”
उनका कहना है कि यह आंदोलन केवल मुआवजे की राशि का सवाल नहीं है, बल्कि विस्थापित होने वाले आदिवासी और ग्रामीण परिवारों के सम्मान, आजीविका, अधिकार और भविष्य से जुड़ा हुआ मुद्दा है।
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