
वाशिंगटन/नई दिल्ली: आज की दुनिया शोर, तनाव और आपाधापी से भरी है, लेकिन अमेरिका की सड़कों पर इन दिनों एक बेहद शांत और अनोखी क्रांति चल रही है। भगवा वस्त्र पहने बौद्ध भिक्षुओं का एक समूह 'शांति' (Peace) की तलाश में हजारों मील पैदल चल रहा है। लेकिन इस पदयात्रा का सबसे बड़ा आकर्षण कोई इंसान नहीं, बल्कि भारत की सड़कों से बौद्ध भिक्षुओं के साथ चल पड़ा एक कुत्ता है—जिसका नाम है 'आलोका' (Aloka)।
एक समय भारत में लावारिस घूमने वाला यह कुत्ता आज अमेरिका में 'Peace Dog' (शांति दूत) के नाम से मशहूर हो चुका है और हजारों अमेरिकियों को करुणा और प्रेम का पाठ पढ़ा रहा है।
आलोका की कहानी किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं है। इसकी शुरुआत भारत में हुई, जब बौद्ध भिक्षुओं का एक समूह 112 दिनों की पदयात्रा पर था। कोलकाता के पास एक हाईवे पर एक साधारण सा दिखने वाला 'इंडियन पैरिया' (देसी कुत्ता) उनके पीछे चलने लगा।
भिक्षुओं के मुताबिक, "सफर के दौरान कई कुत्ते हमारे पीछे आते थे और कुछ दूर चलकर लौट जाते थे, लेकिन आलोका अलग था। उसने हमें अपना परिवार चुन लिया था।"
इस वफादारी का सबसे बड़ा सबूत तब मिला जब भारत में पदयात्रा के दौरान आलोका घायल हो गया। भिक्षुओं ने उसकी हालत देखकर उसे आराम देने के लिए एक ट्रक में बैठा दिया। लेकिन आलोका ने हार नहीं मानी—वह ट्रक से कूद गया और वापस भिक्षुओं के साथ पैदल चलने लगा। उसकी इसी जिजीविषा ने भिक्षुओं को यह फैसला लेने पर मजबूर कर दिया कि वे उसे पीछे नहीं छोड़ सकते। भारी कागजी कार्रवाई और क्वारंटीन के बाद, उसे अमेरिका ले जाया गया।
आज आलोका टेक्सस के 'ह्योंग दाओ विपश्यना भावना सेंटर' (Huong Dao Vipassana Bhavana) के 19 भिक्षुओं के साथ एक ऐतिहासिक मिशन पर है। उनका लक्ष्य, टेक्सस के फोर्ट वर्थ से अमेरिका की राजधानी वाशिंगटन डीसी तक पैदल यात्रा करना है। यह दूरी लगभग 2,300 मील (3,700 किलोमीटर) है। यह यात्रा अक्टूबर में शुरू हुई थी और फरवरी में व्हाइट हाउस पर समाप्त होगी।
भिक्षु धीरे-धीरे चलते हैं, वे टाउन हॉल, चर्च और पार्कों में रुकते हैं। जब वे वहां से गुजरते हैं, तो लोग अपनी गाड़ियाँ रोक देते हैं। भिक्षुओं और आलोका को देखकर लोगों को एक अजीब सा सुकून मिलता है। भिक्षुओं का कहना है, "यह यात्रा किसी जगह पहुँचने के लिए नहीं है, यह मन की शांति (Mindfulness) के लिए है।"
अमेरिका की इस कठिन यात्रा में भी चुनौतियां कम नहीं थीं। आलोका के पुराने पैर की चोट (जो उसे भारत में लगी थी) फिर से उभर आई, जिसके बाद साउथ कैरोलिना में उसकी सर्जरी करानी पड़ी। कुछ दिन तक वह यात्रा से दूर रहा, लेकिन हाल ही में शेर्लोट (Charlotte) में उसका भिक्षुओं के साथ भावुक पुनर्मिलन हुआ।
जैसे ही आलोका ने अपने साथी भिक्षुओं को देखा, वह खुशी से झूम उठा। भले ही वह अभी पूरी तरह से ठीक होकर लंबी दूरी नहीं चल पा रहा है, लेकिन उसका हौसला अब भी भिक्षुओं के लिए प्रेरणा का स्रोत बना हुआ है।
आलोका सिर्फ एक कुत्ता नहीं, बल्कि भारत की उस प्राचीन संस्कृति का प्रतीक है जो 'वसुधैव कुटुम्बकम' में विश्वास करती है। आलोका के सोशल मीडिया पर लाखों फॉलोअर्स हैं। इंस्टाग्राम और फेसबुक पर लोग उसकी यात्रा को लाइव ट्रैक कर रहे हैं।
टेक्सस की पत्रकार निकोल कोलिंजर कहती हैं, "ऐसे समय में जब दुनिया बंटी हुई है और नफरत का शोर है, यह यात्रा दिलों को छू रही है। यह दिखाता है कि एकता और शांति कैसी दिखती है।"
भारत, जहाँ 2,500 साल पहले भगवान बुद्ध ने ज्ञान प्राप्त किया और सम्राट अशोक ने पशु-प्रेम और अहिंसा के संदेश पत्थरों पर उकेरे थे—आज उसी भारत का एक 'देसी कुत्ता' अमेरिका की सड़कों पर उन संदेशों को जीवंत कर रहा है। आलोका ने बिना एक शब्द बोले दुनिया को बता दिया है कि शांति के लिए भाषा की नहीं, बस साथ चलने की जरूरत होती है।
आलोका की यह यात्रा हमें याद दिलाती है कि चाहे इंसान हो या जानवर, प्रेम और शांति की भाषा हर कोई समझता है। वाशिंगटन डीसी की ओर बढ़ते उसके कदम उम्मीद की एक नई किरण हैं।
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