इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला: यूपी में गैर-मान्यता प्राप्त मदरसे नहीं होंगे बंद, लेकिन सरकारी सुविधाओं का लाभ नहीं मिलेगा
लखनऊ: इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने उत्तर प्रदेश के मदरसों को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और राहत भरा फैसला सुनाया है। अदालत ने मंगलवार को स्पष्ट किया कि केवल मान्यता न होने के आधार पर किसी मदरसे को बंद नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने फैसला सुनाया कि 'उत्तर प्रदेश गैर-सरकारी अरबी और फारसी मदरसा मान्यता, प्रशासन और सेवा नियमावली, 2016' के तहत गैर-मान्यता प्राप्त मदरसों को बंद करने का कोई प्रावधान नहीं है।
इस आदेश के साथ ही अदालत ने राज्य सरकार के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसके तहत श्रावस्ती जिले के एक मदरसे को मान्यता न होने के कारण कारण बताओ नोटिस (Show Cause Notice) जारी किया गया था।
सरकारी अनुदान और डिग्री पर स्थिति स्पष्ट
हलांकि, कोर्ट ने मदरसों के संचालन की अनुमति तो दी है, लेकिन कुछ शर्तें भी स्पष्ट की हैं कि, जब तक मदरसा मान्यता प्राप्त नहीं कर लेता, वह किसी भी प्रकार के सरकारी अनुदान (Grant) का हकदार नहीं होगा। मदरसा शिक्षा बोर्ड ऐसे मदरसों के छात्रों को अपनी परीक्षाओं में शामिल करने के लिए बाध्य नहीं होगा। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इन मदरसों से पढ़ाई करने वाले छात्र अपनी योग्यता या डिग्री का लाभ राज्य सरकार से जुड़ी किसी भी नौकरी या अन्य उद्देश्य के लिए नहीं मांग सकेंगे।
क्या था पूरा मामला?
यह फैसला न्यायमूर्ति सुभाष विद्यार्थी की बेंच ने 'मदरसा अहले सुन्नत इमाम अहमद रजा' द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए सुनाया। कोर्ट ने कहा कि गैर-मान्यता प्राप्त मदरसों को बंद करना अवैध है। इसके साथ ही, कोर्ट ने 1 मई, 2025 को जिला अल्पसंख्यक कल्याण अधिकारी द्वारा जारी किए गए कारण बताओ नोटिस को भी खारिज कर दिया।
याचिकाकर्ता की ओर से दलील देते हुए वकील सैयद फारूक अहमद ने सुप्रीम कोर्ट के वर्गीकरण का हवाला दिया। उन्होंने कहा कि शीर्ष अदालत ने अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों को तीन श्रेणियों में बांटा है:
वे जो सरकार से न तो मदद चाहते हैं और न ही मान्यता।
वे जो सहायता चाहते हैं।
वे जो केवल मान्यता चाहते हैं लेकिन सहायता नहीं।
वकील ने तर्क दिया कि पहली श्रेणी के संस्थान भारत के संविधान के अनुच्छेद 30(1) के तहत संरक्षित हैं, इसलिए उन्हें बंद नहीं किया जा सकता।
सीमावर्ती जिलों में कार्रवाई
इस मामले की पृष्ठभूमि अप्रैल 2025 में उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा चलाए गए एक विशेष अभियान से जुड़ी है। सरकार ने भारत-नेपाल सीमा से सटे जिलों—बहराइच, श्रावस्ती, सिद्धार्थनगर, महराजगंज और बलरामपुर—में अवैध अतिक्रमण के खिलाफ बड़ी कार्रवाई शुरू की थी।
इस दौरान सैकड़ों अनधिकृत संरचनाओं को तोड़ा गया था, जिनमें गैर-मान्यता प्राप्त धार्मिक संस्थान भी शामिल थे। श्रावस्ती और बहराइच में अवैध निर्माण ढहाए गए, जबकि सिद्धार्थनगर में 12 अवैध संरचनाओं की पहचान कर नोटिस जारी किए गए। लखीमपुर खीरी में भी सर्वेक्षण हुआ, लेकिन वहां कोई अतिक्रमण नहीं मिला।
योगी सरकार का उद्देश्य सीमावर्ती इलाकों की बेशकीमती जमीन से पुराने अवैध कब्जों को हटाना था। इसी क्रम में मदरसों को भी नोटिस जारी कर वहां धार्मिक शिक्षा देने से रोका गया था।
अगस्त 2025 का संदर्भ
इससे पहले, अगस्त 2025 में भी लखनऊ बेंच ने श्रावस्ती जिले के करीब ढाई दर्जन मदरसों को बंद करने के लिए जारी किए गए नोटिसों को रद्द कर दिया था। हालांकि, उस समय कोर्ट ने अधिकारियों को यह छूट दी थी कि वे कानून के दायरे में रहते हुए नए सिरे से नोटिस जारी कर सकते हैं।
ताजा फैसला मदरसा संचालकों के लिए बड़ी राहत लेकर आया है, क्योंकि अब यह स्पष्ट हो गया है कि मान्यता न होने का मतलब मदरसे की तालाबंदी नहीं है, बशर्ते वे सरकारी सुविधाओं की मांग न करें।
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