नई दिल्ली: स्वतंत्र भारत के इतिहास में पहली बार जातिगत जनगणना होने जा रही है और इसकी शुरुआत देश के सबसे युवा केंद्र शासित प्रदेशों में से एक लद्दाख से होगी। जनगणना के दूसरे चरण यानी जनसंख्या गणना (पीई) का आगाज 17 अगस्त से लद्दाख और बर्फबारी वाले अन्य ऊंचाई वाले क्षेत्रों में होने जा रहा है। इस प्रक्रिया में नागरिकों से लगभग 40 मापदंडों पर सवाल पूछे जाने की संभावना है। इसमें सबसे खास बात यह है कि नागरिकों की जाति दर्ज करने के लिए फॉर्म में एक खुला (ओपन-एंडेड) कॉलम रखा जाएगा।
हाल ही में 1 से 20 जुलाई के बीच 16 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में इस दूसरे चरण का पूर्वाभ्यास या 'प्री-टेस्ट' किया गया था। इस दौरान अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) के अलावा अन्य वर्गों के लोगों ने एक खुले कॉलम में अपनी जाति दर्ज कराई थी। इस पद्धति में गणनाकर्ता वही जाति लिखता है जो नागरिक खुद बताता है। पूरी उम्मीद है कि अंतिम जनगणना प्रक्रिया में भी इसी तरीके को बरकरार रखा जाएगा।
वैसे तो यह भारत की पहली पूरी तरह से डिजिटल जनगणना है, लेकिन लद्दाख के लिए एक विशेष छूट दी जा रही है। यहां पर्याप्त मात्रा में कागज वाले फॉर्म छापे जा रहे हैं। दरअसल, चीन और पाकिस्तान की सीमा से लगे इस इलाके में कई बड़े सैन्य प्रतिष्ठान मौजूद हैं। सुरक्षा कारणों से इन संवेदनशील सैन्य ठिकानों की जियो-टैगिंग नहीं की जा सकती। डिजिटल जनगणना में गणनाकर्ताओं और खुद पोर्टल पर जानकारी देने वाले नागरिकों के लिए मोबाइल ऐप पर इमारतों की जियो-लोकेशन दर्ज करना अनिवार्य होता है, इसलिए कागजी प्रक्रिया को भी विकल्प रखा गया है।
भारत के महापंजीयक और जनगणना आयुक्त (आरजी एंड सीसीआई) ने अभी तक प्रश्नावली की आधिकारिक घोषणा नहीं की है। इसके बावजूद लद्दाख, जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के बर्फीले इलाकों में जनसंख्या गणना की तैयारियां शुरू हो चुकी हैं। इन दुर्गम क्षेत्रों में 17 अगस्त से 30 सितंबर के बीच यह काम पूरा कर लिया जाएगा। वहीं, देश के बाकी हिस्सों में यह महाभियान फरवरी 2027 में आयोजित होगा।
जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के जनगणना संचालन निदेशालय ने 2027 की इस जनसंख्या गणना के लिए तीन दिवसीय मास्टर ट्रेनर्स प्रशिक्षण कार्यक्रम सफलतापूर्वक पूरा कर लिया है। मुख्य प्रधान जनगणना अधिकारी अमित शर्मा के अनुसार, इस ट्रेनिंग में जनगणना की अवधारणाओं, जाति और जनसांख्यिकीय डेटा संग्रह, डिजिटल उपकरणों के उपयोग और लोगों से बातचीत करने की तकनीकों के बारे में विस्तार से सिखाया गया।
लद्दाख का मामला थोड़ा अलग है क्योंकि यह उन 16 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में शामिल नहीं था जहां जुलाई में प्री-टेस्ट हुआ था। एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी ने बताया कि प्री-टेस्ट न होने के कारण मास्टर-ट्रेनर्स को लगभग 40 संभावित सवालों के आधार पर ही प्रशिक्षित किया जा रहा है। इन सवालों की आधिकारिक अधिसूचना इसी सप्ताह जारी होने की संभावना है।
अधिकारी ने स्पष्ट किया कि इस बार सवाल वर्णनात्मक होंगे और इनमें जाति का बिंदु भी प्रमुखता से शामिल होगा। गणनाकर्ता वही जाति दर्ज करेंगे जो नागरिक उन्हें बताएंगे। इसके अलावा, चूंकि जनगणना में सभी संरचनाओं और इमारतों को गिना जाना है, इसलिए वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) के पास स्थित रक्षा संरचनाओं को कागज पर "विशेष प्रभार" (स्पेशल चार्जेज) के रूप में सावधानीपूर्वक दर्ज करने के निर्देश दिए गए हैं।
'ओपन-कॉलम' पद्धति का इस्तेमाल इससे पहले 2011 की सामाजिक-आर्थिक जाति जनगणना (एसईसीसी) में भी हुआ था, जिसमें 46 लाख से अधिक विभिन्न जातियों के नाम सामने आए थे। ऐसा लोगों द्वारा जाति को अलग-अलग तरीके से समझने और उच्चारण के कारण हुआ था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार लगातार यह मानती रही है कि डेटा संग्रह में "त्रुटियों" के कारण 2011 का वह डेटा अविश्वसनीय था। गौरतलब है कि 1931 की जनगणना में देश भर में केवल 4,147 जातियां ही दर्ज की गई थीं। 2011 का वह सर्वेक्षण जनगणना अधिनियम, 1948 के दायरे से बाहर था और सरकार ने उसके आंकड़े कभी आधिकारिक तौर पर जारी नहीं किए।
भारत के महापंजीयक ने 3 अगस्त को राजपत्र में एक अधिसूचना जारी की थी। इसके मुताबिक लद्दाख, जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के बर्फीले इलाकों में 1 सितंबर 2026 से 30 सितंबर 2026 तक जनसंख्या जनगणना की जाएगी। इसके बाद 1 अक्टूबर से 5 अक्टूबर 2026 तक एक संशोधन दौर (रिविजनल राउंड) चलेगा। अधिसूचना में यह भी साफ किया गया है कि घर-घर जाकर होने वाली इस गणना से पहले, 17 से 31 अगस्त के बीच नागरिकों को स्वयं पोर्टल पर अपनी जानकारी (सेल्फ-एन्यूमरेशन) दर्ज करने का विकल्प भी उपलब्ध होगा।
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