
नई दिल्ली: देश में आपराधिक न्याय प्रणाली को पूरी तरह से आधुनिक और पारदर्शी बनाने की तैयारी अब अपने अंतिम चरण में है। गृह मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने मंगलवार (30 जून 2026) को स्पष्ट किया कि 1 जनवरी 2027 से नए आपराधिक कानूनों के तहत होने वाली सभी जांच और अदालती कार्यवाही डिजिटल रूप से दर्ज की जाएंगी। यह कदम देश की न्यायिक प्रक्रिया को तेज और जवाबदेह बनाने की दिशा में एक बड़ा मील का पत्थर साबित होगा।
एक ही प्लेटफॉर्म पर जुड़ेगी पूरी न्याय प्रणाली
अधिकारी के अनुसार, इंटरऑपरेबल क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम (ICJS) का राष्ट्रव्यापी रोलआउट जल्द ही पूरा होने की उम्मीद है। यह आधुनिक प्रणाली पुलिस, अदालत, जेल, फॉरेंसिक और अभियोजन पक्ष को एक ही डिजिटल प्लेटफॉर्म पर ले आएगी। इस एंड-टू-एंड डिजिटल वर्कफ्लो का सारा कीमती डेटा सरकार के अपने सुरक्षित क्लाउड प्लेटफॉर्म 'मेघराज' पर स्टोर किया जाएगा। हालांकि, राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के मौजूदा आंकड़े बताते हैं कि अदालतों द्वारा इलेक्ट्रॉनिक रूप से एफआईआर प्राप्त करने की प्रक्रिया अभी 46 प्रतिशत पर है, जिसे तेजी से आगे बढ़ाने की आवश्यकता है।
नए कानूनों ने बदली तस्वीर
अंग्रेजों के जमाने की भारतीय दंड संहिता (1860), भारतीय साक्ष्य अधिनियम (1872) और आपराधिक प्रक्रिया संहिता (1898) की जगह लेने वाले तीन नए कानून 1 जुलाई 2024 को लागू हुए थे। इन नए कानूनों— भारतीय न्याय संहिता (BNS), भारतीय साक्ष्य संहिता (BSS), और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS)— के तहत पिछले दो वर्षों में अकेले बीएनएस (BNS) में 74.66 लाख एफआईआर दर्ज की जा चुकी हैं। इन आधुनिक कानूनों के लिए अपग्रेडेड बुनियादी ढांचे की दरकार है, इसलिए सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को सिस्टम के सभी पहलुओं को पूरी तरह लागू करने के लिए पांच साल का समय दिया गया है।
जीरो-एफआईआर और भाषाओं की बाधा खत्म
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) ने जीरो-एफआईआर (ऐसी एफआईआर जो अधिकार क्षेत्र से बाहर भी दर्ज की जा सकती है) के प्रावधान को वैधानिक दर्जा दिया है। इसके तहत अब तक 63,572 जीरो-एफआईआर दर्ज हो चुकी हैं। अधिकारी ने बताया कि इनमें से करीब 13,000 मामले एक ही राज्य के अलग-अलग जिलों के थे, जिन्हें 'इंट्रा-स्टेट ट्रांसफर' की श्रेणी में रखा गया। देश के 16,000 थानों में एफआईआर दर्ज करने के लिए इस्तेमाल हो रहे CCTNS प्लेटफॉर्म में 23 भाषाओं का विकल्प मौजूद है। इसके अलावा 'भाषिणी ऐप' की मदद से जीरो-एफआईआर को संबंधित अधिकार क्षेत्र की स्थानीय भाषा में आसानी से अनुवाद किया जा सकता है।
मामला दर्ज करने से इनकार नहीं कर सकती पुलिस
नए सिस्टम के तहत कोई भी पुलिसकर्मी किसी भी शिकायतकर्ता को जीरो-एफआईआर दर्ज करने से मना नहीं कर सकता। एक बार मामला दर्ज होने के बाद इसे संबंधित थाने में ट्रांसफर कर दिया जाता है। इसके बाद वह थाना अपनी प्रारंभिक जांच करके यह तय करता है कि मामले को बंद करना है या आगे की तफ्तीश जारी रखनी है।
राज्यों का प्रदर्शन
देश के 36 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में से हरियाणा, गोवा, असम, पंजाब और चंडीगढ़ ने न्याय प्रणाली के सभी मापदंडों को शत-प्रतिशत लागू कर लिया है। वहीं, दिल्ली सहित 23 राज्य इस समय राष्ट्रीय औसत से ऊपर चल रहे हैं। हालांकि, अधिकारी ने बताया कि खराब इंटरनेट कनेक्टिविटी के कारण पूर्वोत्तर के कुछ राज्य अभी भी इस तकनीकी दौड़ में थोड़े पीछे हैं।
फॉरेंसिक लैब और जांच का दायरा बढ़ा
चूंकि नए कानूनों के तहत सात साल या उससे अधिक सजा वाले अपराधों में फॉरेंसिक जांच को अनिवार्य कर दिया गया है, इसलिए पिछले दो सालों में 25 नई फॉरेंसिक लैब (FSL) स्थापित की गई हैं। इससे साल 2023 की 129 लैब के मुकाबले 2025 में इनकी संख्या बढ़कर 154 हो गई है। साल 2023 में 8,44,589 मामले फॉरेंसिक जांच के लिए आए थे, जिनमें से 4,64,879 लंबित थे। जबकि 2025 में 11,11,798 मामले प्राप्त हुए और लंबित मामलों की संख्या घटकर 3,90,786 रह गई। त्वरित जांच के लिए अब तक 700 से अधिक मोबाइल फॉरेंसिक यूनिट भी तैनात की जा चुकी हैं।
अनुपालन और विशाल डेटाबेस का निर्माण
नए कानूनों के लागू होने के बाद जनवरी 2025 के 46.47 प्रतिशत की तुलना में जून 2026 तक राष्ट्रीय क्रियान्वयन स्कोर 70.06 प्रतिशत तक पहुंच गया है। साठ दिनों में चार्जशीट दाखिल करने का अनुपालन 51 प्रतिशत से बढ़कर 67 प्रतिशत और 90 दिनों का अनुपालन 40 प्रतिशत से 61 प्रतिशत हो गया है। इसके अलावा 46.5 लाख डिजिटल साक्ष्य (Sakshya) आईडी बनाए गए हैं और 56.74 लाख ई-समन जारी किए जा चुके हैं। 31 मई 2026 तक के आंकड़ों के अनुसार, पुलिस डेटाबेस में 37.68 करोड़ रिकॉर्ड दर्ज हो चुके हैं, जिनमें 9.9 करोड़ एफआईआर और 7.64 करोड़ चार्जशीट शामिल हैं, जिन तक जांच एजेंसियों की सीधी पहुंच है।
भविष्य की चुनौतियां
गृह मंत्रालय के अधिकारी ने यह भी स्वीकार किया कि इस महाअभियान में अभी कुछ चुनौतियां बाकी हैं। दूरदराज और पूर्वोत्तर के इलाकों में इंटरनेट कनेक्टिविटी में सुधार करना, सभी राज्यों में प्रक्रियाओं का मानकीकरण करना, सभी डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के बीच 100% तालमेल सुनिश्चित करना और पुलिसकर्मियों की उचित ट्रेनिंग कुछ ऐसे अहम काम हैं, जिन पर आने वाले समय में तेजी से काम करना होगा।
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