हाईकोर्ट का केंद्र से सवाल: वन कर्मियों को हथियार दिए, लेकिन चलाने का अधिकार क्यों नहीं?

मोबाइल डेटा, सीडीआर और आत्मरक्षा के अधिकार पर भी मांगा जवाब; बाओबाब पेड़ों की सुरक्षा मामले में सुनवाई के दौरान उठे अहम मुद्दे, 17 अगस्त को अगली सुनवाई
हाईकोर्ट का केंद्र से सवाल: वन कर्मियों को हथियार दिए, लेकिन चलाने का अधिकार क्यों नहीं?
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भोपाल। मध्य प्रदेश में वन अधिकारियों और कर्मचारियों की सुरक्षा तथा वन अपराधों पर प्रभावी कार्रवाई को लेकर जबलपुर हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार से महत्वपूर्ण जवाब तलब किया है। कोर्ट ने केंद्रीय गृह मंत्रालय को नोटिस जारी कर पूछा है कि जब वन कर्मियों को हथियार उपलब्ध कराए गए हैं तो उन्हें उनका उपयोग करने का अधिकार क्यों नहीं दिया गया है। इसके साथ ही वन अपराधों की जांच के लिए मोबाइल डेटा, कॉल डिटेल रिकॉर्ड (सीडीआर) और अन्य तकनीकी संसाधन उपलब्ध कराने के मुद्दे पर भी केंद्र से जवाब मांगा गया है।

मामले की सुनवाई जस्टिस आनंद पाठक और जस्टिस बी.पी. शर्मा की युगलपीठ के समक्ष हुई। सुनवाई के दौरान अदालत के सामने यह तथ्य रखा गया कि प्रदेश में वन कर्मियों पर अवैध खनन करने वालों, शिकारियों, लकड़ी तस्करों और अतिक्रमणकारियों द्वारा लगातार हमले किए जाते हैं। इसके बावजूद आत्मरक्षा या जंगल की सुरक्षा के लिए उन्हें दिए गए हथियारों का उपयोग करने का कानूनी अधिकार नहीं है। ऐसी स्थिति में कई बार वन कर्मी गंभीर रूप से घायल हो जाते हैं, जबकि अपराधी मौके से फरार हो जाते हैं।

पेड़ों की सुरक्षा से जुड़ी सुनवाई में उठा व्यापक मुद्दा

यह पूरा मामला धार जिले में संरक्षित बाओबाब (खुरासानी इमली) के पेड़ों की अवैध कटाई, बिक्री और परिवहन से संबंधित खबर पर हाईकोर्ट द्वारा लिए गए स्वतः संज्ञान से जुड़ा है। इसी जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान वन विभाग की कार्यप्रणाली, वन अपराधों की जांच और वन कर्मियों की सुरक्षा जैसे व्यापक मुद्दे भी अदालत के समक्ष रखे गए।

सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता अंशुमान सिंह ने अदालत को बताया कि प्रदेश में जैव विविधता संरक्षण कानून का प्रभावी पालन नहीं हो रहा है। उन्होंने कहा कि वन अधिकारियों के पास आधुनिक तकनीकी संसाधनों का अभाव है। उन्हें मोबाइल लोकेशन, कॉल डिटेल रिकॉर्ड (सीडीआर) या अन्य डिजिटल साक्ष्य जुटाने का अधिकार नहीं है, जिससे संगठित वन अपराधों की जांच प्रभावित होती है।

राज्य जैव विविधता बोर्ड को भी दिए निर्देश

हाईकोर्ट ने राज्य जैव विविधता बोर्ड को निर्देश दिए हैं कि मध्य प्रदेश में मौजूद सभी बाओबाब (खुरासानी इमली) के पेड़ों का विस्तृत स्टेटस रिपोर्ट तैयार कर अदालत में प्रस्तुत की जाए। इस रिपोर्ट में प्रत्येक पेड़ की वर्तमान स्थिति और उसके फोटोग्राफ भी शामिल किए जाएं, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि संरक्षित प्रजातियों के संरक्षण के लिए क्या कदम उठाए गए हैं।

वन कर्मियों को मिले कानूनी सुरक्षा और तकनीकी अधिकार: अधिवक्ता

सुनवाई के दौरान अधिवक्ता अंशुमान सिंह ने अदालत से मांग की कि वन अधिकारियों और कर्मचारियों को ड्यूटी के दौरान आत्मरक्षा और वन संरक्षण के लिए हथियारों के उपयोग का वैधानिक अधिकार दिया जाए। उन्होंने कहा कि वर्तमान व्यवस्था में यदि कोई वन कर्मी आत्मरक्षा में भी हथियार का इस्तेमाल करता है तो उसके खिलाफ पुलिस कार्रवाई होने का डर बना रहता है।

उन्होंने यह भी मांग रखी कि वन अधिकारियों को सीआरपीसी की धारा 197 के तहत वैधानिक सुरक्षा प्रदान की जाए, ताकि सरकारी कर्तव्य निभाते समय उनके खिलाफ अनावश्यक आपराधिक कार्रवाई न हो। इसके अलावा वन अपराधों की जांच के लिए मोबाइल लोकेशन, डेटा, कॉल डिटेल रिकॉर्ड और अन्य तकनीकी सुविधाएं उपलब्ध कराने की भी आवश्यकता बताई गई।

खंडवा हमले का दिया गया उदाहरण

अदालत के समक्ष हाल ही में खंडवा जिले में वन कर्मियों पर हुए हमले का उदाहरण भी रखा गया। बताया गया कि अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई के दौरान अतिक्रमणकारियों ने धारदार हथियारों से वन अमले पर हमला कर दिया था, जिसमें कई कर्मचारी घायल हुए थे। अधिवक्ता ने कहा कि यदि वन कर्मियों को आत्मरक्षा के लिए कानूनी अधिकार और पर्याप्त सुरक्षा उपलब्ध होती तो ऐसी घटनाओं में वे अधिक प्रभावी ढंग से कार्रवाई कर सकते थे।

केंद्र और राज्य को मिलकर निकालना होगा समाधान

हाईकोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि पर्यावरण संरक्षण, जैव विविधता और वन्यजीवों की सुरक्षा केवल राज्य सरकार की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि इसमें केंद्र सरकार की भी महत्वपूर्ण भूमिका है। अदालत ने कहा कि केंद्र और राज्य दोनों सरकारों को साझा मंच पर आकर वन अपराधों की रोकथाम, वन कर्मियों की सुरक्षा और आधुनिक जांच व्यवस्था को लेकर ठोस एवं सकारात्मक समाधान निकालना चाहिए।

चूंकि मोबाइल डेटा, कॉल डिटेल रिकॉर्ड और संचार संबंधी अधिकार केंद्र सरकार के अधिकार क्षेत्र में आते हैं, इसलिए हाईकोर्ट ने केंद्रीय गृह मंत्रालय को नोटिस जारी कर अगली सुनवाई तक विस्तृत जवाब प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं।

17 अगस्त को होगी अगली सुनवाई

हाईकोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई 17 अगस्त को निर्धारित की है। तब तक केंद्र सरकार को नोटिस का जवाब देना होगा, जबकि राज्य जैव विविधता बोर्ड को प्रदेश के सभी बाओबाब पेड़ों की स्थिति संबंधी रिपोर्ट अदालत में पेश करनी होगी। इस सुनवाई पर वन विभाग, पर्यावरण संरक्षण और वन कर्मियों की सुरक्षा से जुड़े महत्वपूर्ण नीतिगत फैसलों की उम्मीद की जा रही है।

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