गौरी लंकेश हत्याकांड: चार्जशीट के 8 साल बाद सुनवाई के लिए आया सातवां जज, गवाहों के पलटने के बीच नया मोड़

8 साल, 7 जज और पलटते गवाह: जानिए गौरी लंकेश हत्याकांड की सुनवाई में अब तक क्या-क्या हुआ और इस हाई-प्रोफाइल केस में क्या है नया मोड़।
Gauri Lankesh murder trial
गौरी लंकेश मर्डर केस में बड़ा अपडेट! चार्जशीट के 8 साल बाद 7वें जज ने संभाली सुनवाई। गवाहों के मुकरने से केस में आया नया मोड़।Graphic- Rajan Chaudhary, The Mooknayak
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नई दिल्ली: बेंगलुरु की वरिष्ठ पत्रकार गौरी लंकेश हत्याकांड की कानूनी प्रक्रिया अब एक नए पड़ाव पर पहुंच गई है। दक्षिणपंथी संगठनों से जुड़े 17 आरोपियों के खिलाफ नवंबर 2018 में चार्जशीट दाखिल होने के करीब आठ साल बाद, इस हाई-प्रोफाइल मामले की कमान अब सातवें न्यायाधीश के हाथों में आ गई है।

बेंगलुरु की प्रधान जिला एवं सत्र अदालत के नए न्यायाधीश के. एस. भरत कुमार ने इस मामले की सुनवाई शुरू कर दी है। उन्होंने कार्यभार संभालते ही एक पुलिस कांस्टेबल का बयान दर्ज किया, जो इस मामले में अभियोजन पक्ष के 400 गवाहों में से 216वें गवाह हैं। न्यायाधीश भरत कुमार ने इसी महीने 1 जून को इस विशेष अदालत की जिम्मेदारी संभाली थी।

उनसे पहले इस मामले की सुनवाई देख रहे न्यायाधीश एम. चंद्रशेखर रेड्डी का तबादला कर्नाटक हाईकोर्ट में एक वरिष्ठ प्रशासनिक पद पर कर दिया गया है। चंद्रशेखर रेड्डी को नवंबर 2025 में बेंगलुरु जिला अदालत का प्रधान न्यायाधीश बनाया गया था।

कर्नाटक पुलिस की विशेष जांच टीम (SIT) द्वारा 23 नवंबर 2018 को आरोप पत्र दाखिल किए जाने के बाद, इस मामले का ट्रायल 4 जुलाई 2022 से रोजाना के आधार पर चल रहा है। हालांकि, जजों के लगातार तबादलों और पदोन्नति के कारण इस मामले की कमान कई बार बदली है।

इस मामले की सुनवाई करने वाले पिछले पांच न्यायाधीशों—एस. अमरन्नावर, अनिल कट्टी, सी. एम. जोशी, रामकृष्ण हुद्दार और बी. मुरलीधर पाई को पदोन्नत कर सीधे हाईकोर्ट भेजा जा चुका है। जब सी. एम. जोशी प्रधान न्यायाधीश थे, तब मामले की तेजी से सुनवाई के लिए एक विशेष शेड्यूल तय किया गया था, जिसके तहत हर महीने एक हफ्ते तक लगातार सुनवाई की जाती थी।

मालूम हो कि दक्षिणपंथी विचारधारा की प्रखर आलोचक रहीं 55 वर्षीय पत्रकार गौरी लंकेश की 5 सितंबर 2017 की रात पश्चिमी बेंगलुरु में उनके घर के बाहर गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। मोटरसाइकिल पर आए दो हमलावरों की पहचान बीजापुर में श्री राम सेना के पूर्व सदस्य परशुराम वाघमारे (26) और हुबली के कार्यकर्ता गणेश मिस्किन (27) के रूप में हुई थी।

एसआईटी की जांच के अनुसार, गौरी लंकेश की हत्या एक सोची-समझी साजिश के तहत की गई थी। इसके पीछे एक कट्टरपंथी सिंडिकेट का हाथ था, जिसका मुख्य उद्देश्य साल 2013 से 2018 के बीच कर्नाटक और महाराष्ट्र में वैचारिक विरोधियों और आलोचकों को निशाना बनाना था।

जांच एजेंसी ने कोर्ट को बताया था कि इस संगठन के सदस्य उन लोगों को अपना दुश्मन मानते थे जो उनकी विचारधारा के खिलाफ बोलते थे। इसके लिए वे सनातन संस्था द्वारा प्रकाशित पुस्तक 'क्षत्र धर्म साधना' में दिए गए दिशानिर्देशों और सिद्धांतों का कड़ाई से पालन करते थे।

इस लंबी कानूनी लड़ाई के बीच अदालत में गवाहों के मुकरने का सिलसिला भी लगातार जारी है। मई 2025 में, बेलगावी के एक गवाह ने अदालत में अपने पहले के बयान से पलटते हुए प्रशिक्षण शिविरों में शामिल होने की बात से पूरी तरह इनकार कर दिया था।

इसी तरह, उडुपी के एक अन्य अभियोजन गवाह ने भी सिंडिकेट द्वारा की गई बैठकों और ट्रेनिंग कैंपों में हिस्सा लेने की बात को सिरे से नकार दिया। इसके अलावा, हिंदू जनजागृति समिति से जुड़े एक और गवाह ने भी अपने कदम पीछे खींच लिए हैं, जिस पर आरोप था कि उसने पत्रकार के घर की रेकी करने के लिए अपनी स्प्लेंडर मोटरसाइकिल एक मुख्य आरोपी को उधार दी थी।

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