
नई दिल्ली: दिल्ली हाई कोर्ट ने न्यूज़ पोर्टल न्यूज़क्लिक (NewsClick) और इसके प्रधान संपादक प्रबीर पुरकायस्थ को एक बड़ी कानूनी राहत दी है। अदालत ने विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (FDI) नियमों के कथित उल्लंघन के मामले में दिल्ली पुलिस और प्रवर्तन निदेशालय (ED) द्वारा दर्ज किए गए सभी मामलों को सिरे से खारिज कर दिया है।
जस्टिस नीना बंसल कृष्णा ने 29 मई को दिए अपने अहम फैसले में जांच एजेंसियों पर सख्त टिप्पणी की। उन्होंने स्पष्ट किया कि दिल्ली पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा (EOW) द्वारा दर्ज एफआईआर को आगे बढ़ाना 'कानूनी प्रक्रिया के घोर दुरुपयोग' के अलावा और कुछ नहीं है। अदालत ने कहा कि जब मुख्य अपराध की एफआईआर ही रद्द कर दी गई है, तो ईडी की ईसीआईआर (ECIR) को भी बंद किया जाना चाहिए।
गौरतलब है कि ईओडब्ल्यू ने साल 2020 में इस मामले को लेकर एक एफआईआर दर्ज की थी। इसमें आरोप लगाया गया था कि न्यूज़क्लिक की मूल कंपनी 'पीपीके न्यूज़क्लिक स्टूडियो प्राइवेट लिमिटेड' ने वित्तीय वर्ष 2018-19 के दौरान विदेशी निवेश कानून का गंभीर उल्लंघन किया है।
इस एफआईआर में दावा किया गया था कि कंपनी ने अमेरिका की 'वर्ल्डवाइड मीडिया होल्डिंग्स एलएलसी' से 9.59 करोड़ रुपये का एफडीआई प्राप्त किया, जिससे सरकारी खजाने को भारी नुकसान पहुंचा। जांच एजेंसियों का यह भी आरोप था कि डिजिटल समाचार वेबसाइटों में एफडीआई की 26% सीमा से बचने के लिए कंपनी के शेयरों का अधिक मूल्यांकन किया गया था।
पुलिस का दावा था कि गलत इरादों के साथ इस निवेश का 45% से अधिक हिस्सा वेतन, परामर्श शुल्क और किराए आदि के रूप में डाइवर्ट किया गया। इसी एफआईआर को आधार बनाते हुए बाद में ईडी ने भी न्यूज़क्लिक और प्रबीर पुरकायस्थ के खिलाफ मनी लॉन्ड्रिंग का मामला दर्ज कर लिया था।
अपने बचाव में पीपीके न्यूज़क्लिक स्टूडियो ने इन सभी आरोपों को पूरी तरह से अस्पष्ट बताते हुए एफआईआर रद्द करने की गुहार लगाई थी। अदालत ने अपने फैसले में माना कि कंपनी द्वारा प्राप्त किया गया निवेश महज एक आर्थिक निर्णय था, जिसमें कोई भी आपराधिक कृत्य नजर नहीं आता है।
हाई कोर्ट ने केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के एक जवाब का भी हवाला दिया। इस जवाब के अनुसार, उस समय डिजिटल मीडिया में एफडीआई प्राप्त करने पर कोई सीमा या विशेष प्रतिबंध लागू नहीं था। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह निवेश स्वीकार्य व्यावसायिक प्रथाओं के अनुरूप ही किया गया था।
अदालत ने कहा कि इस मामले में धोखाधड़ी या आपराधिक विश्वासघात के अपराध साबित ही नहीं होते। न्यायाधीश ने टिप्पणी की कि धोखाधड़ी के लिए किसी व्यक्ति के साथ 'धोखा' होना आवश्यक है, जो इस मामले में 'वर्ल्डवाइड मीडिया होल्डिंग्स' होनी चाहिए थी। हालांकि, निवेशक की ओर से कोई शिकायत नहीं की गई, बल्कि एक मुखबिर की सूचना पर यह मामला दर्ज कर लिया गया।
जस्टिस कृष्णा ने इस बात पर भी गौर किया कि डिजिटल प्रिंट मीडिया के कारोबार से जुड़ी किसी भी कंपनी को वेतन, परामर्श शुल्क और किराए जैसे खर्चे उठाने ही पड़ते हैं। इसलिए, कंपनी पर पैसों की हेराफेरी (siphoning) का आरोप लगाना पूरी तरह से निराधार है।
इसके साथ ही, अदालत ने आपराधिक साजिश के आधार पर मनी लॉन्ड्रिंग के मामले को बनाए रखने के ईडी के प्रयास को भी खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि जांच एजेंसी को यह साबित करना होता है कि न्यूज़क्लिक ने किस 'अवैध उद्देश्य' या 'माध्यम' का सहारा लिया, जो वह साबित नहीं कर पाई।
हाई कोर्ट ने अपनी तल्ख टिप्पणी में कहा कि ईडी ने लगभग डेढ़ साल तक मामले की गहन जांच की है। इस दौरान याचिकाकर्ताओं और उनके कर्मचारियों को कई बार समन भेजकर पूछताछ की गई, लेकिन आज तक रिकॉर्ड में कोई भी आपत्तिजनक बात सामने नहीं आई। अदालत ने कहा कि खोखले दावों के अलावा ऐसा कुछ नहीं मिला जो पीएमएलए की धारा 4 के तहत अपराध का संकेत देता हो।
इन सभी तथ्यों को ध्यान में रखते हुए, अदालत ने अंततः एफआईआर संख्या 0116/2020 और ईसीआईआर (ECIR/14/HIU/2020) को पूरी तरह से रद्द कर दिया। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि जब ईसीआईआर ही खारिज हो चुकी है, तो उसकी कॉपी उपलब्ध कराने की मांग भी अब निरर्थक हो गई है।
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