
नई दिल्ली: मेडिकल पीजी कोर्सेज (PG Medical Courses) की काउंसलिंग के पहले राउंड में एक बेहद चौंकाने वाला मामला सामने आया है। आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) के करीब 148 छात्रों ने प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों में महंगी 'मैनेजमेंट' और 'NRI कोटे' की सीटें हासिल की हैं। सीट आवंटन के दस्तावेजों के विश्लेषण से यह विरोधाभासी तस्वीर उभरकर सामने आई है।
इन सीटों की फीस सालाना 1 करोड़ रुपये तक हो सकती है। ऐसे में सवाल उठना लाजमी है कि जो छात्र आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग का सर्टिफिकेट रखते हैं, वे इतनी भारी-भरकम फीस चुकाने में कैसे सक्षम हैं? इस मामले के सामने आने के बाद शीर्ष चिकित्सा शिक्षा नियामक (Medical Education Regulator) के प्रमुख ने राज्य स्तर पर जांच की मांग की है।
क्या है EWS आरक्षण का नियम?
EWS सर्टिफिकेट सामान्य वर्ग के उन छात्रों के लिए 10% सीटें आरक्षित करता है जो गरीब पृष्ठभूमि से आते हैं। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि गरीब छात्र सरकारी कॉलेजों में प्रवेश ले सकें, जहां फीस कम होती है। गौरतलब है कि प्राइवेट कॉलेजों की मैनेजमेंट या NRI सीटों पर EWS छात्रों को फीस में कोई रियायत नहीं मिलती है।
नेशनल मेडिकल कमीशन (NMC) के चेयरमैन डॉ. अभिजात सेठ ने इस मामले पर कहा, "राज्य की काउंसलिंग के दौरान EWS उम्मीदवारों को मैनेजमेंट या NRI कोटे की सीटें आवंटित की गई हैं। यह ऑल इंडिया कोटे का हिस्सा नहीं है। राज्यों को इस मामले की जांच करनी चाहिए और उचित कार्रवाई करनी चाहिए।"
आशंका जताई जा रही है कि मेडिकल काउंसलिंग के अगले चरणों में ऐसे EWS छात्रों की संख्या और बढ़ सकती है जो महंगी सीटें ले रहे हैं।
सिस्टम में कहां है खामी?
EWS सर्टिफिकेट जिला अधिकारियों द्वारा जारी किया जाता है। यह प्रमाणित करता है कि उम्मीदवार की पारिवारिक आय 8 लाख रुपये प्रति वर्ष से कम है और उनके पास 5 एकड़ से अधिक कृषि भूमि या 1,000 वर्ग फुट से बड़ा आवासीय फ्लैट जैसी संपत्ति नहीं है।
महाराष्ट्र के चिकित्सा शिक्षा और अनुसंधान विभाग के पूर्व प्रमुख डॉ. प्रवीण शिंगारे का कहना है कि आय और फीस के बीच यह अंतर शैक्षणिक वर्ष 2021-22 में कोटा लागू होने के बाद से ही बना हुआ है।
डॉ. शिंगारे ने कहा, "यह कोटा शुरू होने के समय से ही हो रहा है। EWS कोटे के पीछे की मंशा अच्छी थी, ताकि उन लोगों को लाभ मिले जो SC/ST या OBC में नहीं आते लेकिन आर्थिक रूप से पिछड़े हैं। लेकिन कई लोग फर्जी सर्टिफिकेट बनवाने में कामयाब हो जाते हैं। यह मामला पहले भी NMC में उठाया गया था, लेकिन इस खामी को रोकने का कोई ठोस तरीका नहीं है।"
कैसे बच निकलते हैं ये छात्र?
विशेषज्ञों के मुताबिक, छात्र EWS कोटे से लाभ की उम्मीद में आवेदन करते हैं, लेकिन रैंक कम आने पर वे मैनेजमेंट सीटें ले लेते हैं। डॉ. शिंगारे बताते हैं, "जब आप मामले की जांच करते हैं, तो उम्मीदवार कहते हैं कि उनके मामा, चाचा या परिवार के अन्य सदस्य उनकी शिक्षा का खर्च उठा रहे हैं, या कोई ट्रस्ट फंडिंग कर रहा है, या उन्होंने लोन लिया है। ऐसी स्थिति में आप क्या कर सकते हैं?"
आंकड़े क्या कहते हैं?
विश्लेषण में पाया गया कि मैनेजमेंट या NRI कोटे की महंगी सीट लेने वाले EWS श्रेणी के पहले उम्मीदवार की रैंक कर्नाटक के जेएसएस मेडिकल कॉलेज (JSS Medical College) में करीब 12,000 है। वहीं, ऐसी सीट पाने वाली आखिरी रैंक कराड के कृष्णा इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (Krishna Institute of Medical Sciences) में करीब 1.13 लाख है। जानकारी के लिए बता दें कि पीजी सीटों की काउंसलिंग के पहले राउंड में सीट पाने वाली अंतिम रैंक लगभग 1.38 लाख थी।
किन विषयों और राज्यों में ज्यादा डिमांड?
इनमें से अधिकांश सीटें हाई-प्रोफाइल स्पेशलिटीज की हैं:
जनरल मेडिसिन: 26 सीटें
जनरल सर्जरी: 20 सीटें
एनेस्थिसियोलॉजी: 17 सीटें
ये सीटें मुख्य रूप से इन राज्यों के प्राइवेट कॉलेजों में हैं:
महाराष्ट्र: 55 सीटें
कर्नाटक: 27 सीटें
तमिलनाडु: 23 सीटें
खास बात यह है कि EWS उम्मीदवारों को आवंटित इन पेड सीटों में सबसे अधिक संख्या (19) कोल्हापुर, नवी मुंबई और पुणे में स्थित डीवाई पाटिल ग्रुप (DY Patil group) के मेडिकल कॉलेजों में है।
द मूकनायक की प्रीमियम और चुनिंदा खबरें अब द मूकनायक के न्यूज़ एप्प पर पढ़ें। Google Play Store से न्यूज़ एप्प इंस्टाल करने के लिए यहां क्लिक करें.