
नई दिल्ली। जनजातीय अध्ययन और सांस्कृतिक संरक्षण के क्षेत्र में महत्वपूर्ण कार्य करने वाले शिक्षाविद् डॉ. अभय सागर मिंज को वर्ष 2026 का प्रतिष्ठित ‘ग्लोबल अवॉर्ड’ प्रदान किया जाएगा। यह सम्मान नेपाल स्थित Bagmati UNESCO Club द्वारा दिया जाता है, जो दुनिया भर में हाशिए पर पड़े समुदायों के सशक्तिकरण और उनकी सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण के लिए कार्य करने वाले विद्वानों को सम्मानित करता है। यह पुरस्कार 15 मई 2026 को यूनाइटेड नेशन (United Nations) के हेडक्वार्टर में आयोजित वार्षिक समारोह के दौरान प्रदान किया जाएगा।
सम्मान के रूप में डॉ. मिंज को स्मारक पट्टिका और औपचारिक प्रशस्ति पत्र भेंट किया जाएगा। इस घोषणा के बाद शैक्षणिक और सामाजिक क्षेत्रों में इसे एक महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है, क्योंकि यह पुरस्कार वैश्विक स्तर पर उन विद्वानों को दिया जाता है जो स्वदेशी समुदायों के अधिकारों और उनकी सांस्कृतिक पहचान को संरक्षित करने के लिए दीर्घकालिक कार्य करते हैं।
चयन समिति के अनुसार, डॉ. अभय सागर मिंज ने पिछले दो दशकों से अधिक समय से आदिवासी समुदायों के अधिकारों, उनकी पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों और लुप्तप्राय भाषाओं के संरक्षण के लिए निरंतर शोध और कार्य किया है। वर्ष 2006 से अब तक उन्होंने विभिन्न जनजातीय समुदायों की सामाजिक संरचना, जीवन पद्धति और सांस्कृतिक विरासत पर गहन अध्ययन किया है।
उनके शोध का प्रमुख उद्देश्य यह समझना रहा है कि तेजी से बदलते आधुनिक दौर में आदिवासी समाज की पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों को किस प्रकार सुरक्षित रखा जा सकता है और उन्हें वैश्विक विमर्श का हिस्सा बनाया जा सकता है। उनके कार्यों ने न केवल अकादमिक जगत बल्कि नीति निर्माण से जुड़े मंचों पर भी आदिवासी समाज से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता से उठाया है।
डॉ. मिंज की कई पुस्तकें और शोध कार्य अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चित रहे हैं। उनकी प्रमुख कृतियों में ‘आदिवासी दर्पण’, ‘21वीं सदी में आदिवासियत’ और अंग्रेजी में लिखी गई ‘Deciphering the Tribal Wisdom Structure’ शामिल हैं।
इन पुस्तकों में उन्होंने आदिवासी समुदायों की पारंपरिक ज्ञान प्रणाली, प्रकृति के साथ उनके संबंध और आधुनिक विकास मॉडल के बीच उत्पन्न चुनौतियों पर विस्तार से चर्चा की है। विशेषज्ञों के अनुसार, उनके लेखन ने वैश्विक स्तर पर आदिवासी ज्ञान पर नए विमर्श को जन्म दिया है और यह दिखाया है कि पारंपरिक ज्ञान भी टिकाऊ विकास के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
डॉ. अभय सागर मिंज वर्तमान में Dr. Shyama Prasad Mukherjee University (डीएसपीएमयू), रांची के एंथ्रोपोलॉजी विभाग में सहायक प्राध्यापक के रूप में कार्यरत हैं। इसके साथ ही वे विश्वविद्यालय में स्थापित ‘लुप्तप्राय स्वदेशी भाषाओं एवं संस्कृतियों के लिए अंतर्राष्ट्रीय प्रलेखन केंद्र’ के निदेशक भी हैं।
इस केंद्र का उद्देश्य उन भाषाओं और सांस्कृतिक परंपराओं का दस्तावेजीकरण करना है जो धीरे-धीरे समाप्त होने की कगार पर हैं। डॉ. मिंज के नेतृत्व में इस दिशा में कई शोध परियोजनाएं चल रही हैं, जिनका उद्देश्य आने वाली पीढ़ियों के लिए इन सांस्कृतिक धरोहरों को संरक्षित करना है।
डॉ. मिंज के हालिया शोध कार्यों में झारखंड के असुर समुदाय पर किया गया अध्ययन विशेष रूप से उल्लेखनीय माना जा रहा है। इस शोध में उन्होंने इस समुदाय की सामाजिक संरचना, पारंपरिक धातुकर्म ज्ञान और बदलती सामाजिक परिस्थितियों का अध्ययन किया।
इस अध्ययन को झारखंड सरकार के मानव संसाधन विभाग ने विशेष स्वीकृति प्रदान की थी। विशेषज्ञों का मानना है कि यह शोध आदिवासी समुदायों के पारंपरिक ज्ञान और उनकी जीवन शैली को समझने में महत्वपूर्ण योगदान देता है।
डॉ. मिंज का योगदान केवल अकादमिक शोध तक सीमित नहीं है, बल्कि उन्होंने कई अंतरराष्ट्रीय संगठनों के साथ विशेषज्ञ सलाहकार के रूप में भी कार्य किया है। उन्होंने नेपाल में YFEED Foundation में अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञ सलाहकार के रूप में सेवाएं दी हैं, जबकि फिलीपींस में Asian Indigenous Peoples Network (AYIPN) के साथ भी सलाहकार के रूप में जुड़े रहे हैं।
इसके अलावा वे ICCAs Consortium के सदस्य भी रहे हैं। वर्ष 2020 में उन्होंने United Nations Environment Programme (यूएनईपी) के ग्लोबल एनवायरनमेंट आउटलुक (GEO) के सलाहकार के रूप में पारिस्थितिक नृविज्ञान पर महत्वपूर्ण सुझाव दिए थे।
उन्होंने 2013-2014 के दौरान ग्लोबल इंडिजिनस यूथ कॉकस के पूर्व एशिया क्षेत्रीय फोकल प्वाइंट के रूप में भी कार्य किया, जहां उन्होंने स्वदेशी युवाओं के अधिकारों और पर्यावरणीय संरक्षण से जुड़े मुद्दों को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाया।
डॉ. मिंज की इस उपलब्धि पर विश्वविद्यालय प्रशासन ने प्रसन्नता व्यक्त की है। विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. राजीव मनोहर और कुलसचिव डॉ. धनंजय वासुदेव द्विवेदी ने इसे विश्वविद्यालय और राज्य के लिए गर्व का विषय बताया है।
उन्होंने कहा कि डॉ. मिंज का यह सम्मान न केवल उनके व्यक्तिगत शोध कार्य की उपलब्धि है, बल्कि यह भारत में जनजातीय अध्ययन के क्षेत्र में किए जा रहे गंभीर अकादमिक प्रयासों की भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता है।
Bagmati UNESCO Club के चेयरमैन इंजीनियर निश्चल बानिया ने इस अवसर पर कहा कि डॉ. मिंज अपने क्षेत्र में असाधारण कार्य कर रहे हैं। उनके अनुसार, “डॉ. अभय सागर मिंज ने स्वदेशी समुदायों के ज्ञान, संस्कृति और परंपराओं को वैश्विक मंच पर पहचान दिलाने का महत्वपूर्ण कार्य किया है। पारंपरिक स्वदेशी ज्ञान हमारी पृथ्वी की एक अमूल्य विरासत है और इसे संरक्षित करना पूरी मानवता के लिए आवश्यक है।”
विशेषज्ञों का मानना है कि डॉ. अभय सागर मिंज का यह सम्मान आदिवासी अध्ययन के क्षेत्र में भारत की बढ़ती वैश्विक उपस्थिति का संकेत है। उनके शोध और लेखन ने यह स्थापित करने में मदद की है कि आदिवासी समुदायों की परंपराएं, ज्ञान और जीवन-दृष्टि केवल सांस्कृतिक धरोहर ही नहीं, बल्कि सतत विकास और पर्यावरणीय संतुलन के लिए भी महत्वपूर्ण हैं।
15 मई को न्यूयॉर्क में होने वाला यह सम्मान समारोह न केवल डॉ. मिंज के लिए बल्कि भारत के जनजातीय अध्ययन और स्वदेशी ज्ञान पर काम करने वाले शोधकर्ताओं के लिए भी एक महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में देखा जा रहा है।
द मूकनायक की प्रीमियम और चुनिंदा खबरें अब द मूकनायक के न्यूज़ एप्प पर पढ़ें। Google Play Store से न्यूज़ एप्प इंस्टाल करने के लिए यहां क्लिक करें.