
दिल्ली/भोपाल। मध्यप्रदेश की राजनीति में एक महत्वपूर्ण और दुर्लभ फैसला सामने आया है। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने विजयपुर विधानसभा सीट से आदिवासी कांग्रेस विधायक मुकेश मल्होत्रा के निर्वाचन को शून्य घोषित कर दिया है। न्यायालय ने यह फैसला चुनावी हलफनामे में आपराधिक मामलों की जानकारी छिपाने के आधार पर दिया है। साथ ही उपचुनाव में दूसरे स्थान पर रहे भाजपा प्रत्याशी रामनिवास रावत को निर्वाचित घोषित कर दिया गया है। हालांकि कोर्ट ने अपने इस आदेश के अमल पर 15 दिनों के लिए रोक भी लगा दी है ताकि मल्होत्रा को सुप्रीम कोर्ट में अपील करने का अवसर मिल सके।
यह फैसला हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ के जस्टिस जी.एस. अहलूवालिया की एकलपीठ ने सुनाया। अदालत ने अपने निर्णय में कहा कि मुकेश मल्होत्रा ने जानबूझकर चुनावी हलफनामे में अधूरी और भ्रामक जानकारी दी, जिससे मतदाताओं को गुमराह किया गया। अदालत ने माना कि उम्मीदवार द्वारा आपराधिक मामलों से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी छिपाना चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता के खिलाफ है और इसे भ्रष्ट आचरण की श्रेणी में रखा जाएगा।
कोर्ट ने इस मामले में जन प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 की धारा 100 और 101 के तहत प्रदत्त शक्तियों का उपयोग करते हुए चुनाव याचिका पर फैसला दिया। इन धाराओं के अंतर्गत यदि यह साबित हो जाए कि किसी उम्मीदवार ने चुनाव के दौरान महत्वपूर्ण तथ्यों को छिपाया है या मतदाताओं को प्रभावित करने का प्रयास किया है, तो उसका निर्वाचन निरस्त किया जा सकता है। इसी आधार पर अदालत ने याचिकाकर्ता रामनिवास रावत को विजयी घोषित किया।
इस मामले में रामनिवास रावत की ओर से दायर चुनाव याचिका में आरोप लगाया गया था कि मुकेश मल्होत्रा ने अपने चुनावी हलफनामे में आपराधिक मामलों से संबंधित सही जानकारी नहीं दी। अदालत में प्रस्तुत दस्तावेजों और तथ्यों के आधार पर यह पाया गया कि मल्होत्रा ने अपने खिलाफ दर्ज मामलों की पूरी जानकारी नहीं दी थी और कुछ मामलों में गलत घोषणा की थी।
कोर्ट में यह भी सामने आया कि वर्ष 2014 के एक वन अपराध मामले में मल्होत्रा को दोषी ठहराया गया था। इस मामले में उन पर 210 पेड़ों को अवैध रूप से काटने का आरोप सिद्ध हुआ था और अदालत ने उन्हें सजा और जुर्माने से दंडित किया था। हालांकि चुनावी हलफनामे में इस सजा का कोई उल्लेख नहीं किया गया। अदालत ने इसे गंभीर तथ्य छिपाने के रूप में माना।
इसके अलावा हलफनामे में दो अन्य आपराधिक मामलों- आरसीटी नंबर 972/2022 और अपराध क्रमांक 93/2023 को लेकर भी गलत जानकारी दी गई थी। मल्होत्रा ने हलफनामे में दावा किया था कि इन मामलों में अभी आरोप तय नहीं हुए हैं, जबकि अदालत में यह तथ्य सामने आया कि इन मामलों में आरोप तय हो चुके थे। इन मामलों में तीन लोगों के साथ मारपीट और गाली-गलौज से जुड़े आरोप शामिल थे।
मल्होत्रा की ओर से बचाव में यह दलील दी गई कि हलफनामे में जानकारी छूट जाना एक अनजाने में हुई त्रुटि थी और उन्हें कानूनी जानकारी का अभाव था। उन्होंने यह भी कहा कि नामांकन पत्र भरने की जिम्मेदारी जेपी धनोपिया नामक व्यक्ति की थी और उन्होंने सभी तथ्य उसे बता दिए थे, लेकिन उसने उन्हें हलफनामे में शामिल नहीं किया।
हालांकि अदालत ने इस दलील को खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि मुकेश मल्होत्रा सामाजिक विज्ञान में एमए और कानून में एलएलबी की डिग्री रखते हैं। ऐसे में यह दावा स्वीकार नहीं किया जा सकता कि उन्हें आरोप तय होने या आपराधिक मामलों की जानकारी देने के महत्व का ज्ञान नहीं था। अदालत ने यह भी कहा कि मल्होत्रा ने जिस व्यक्ति पर फॉर्म भरने की जिम्मेदारी डालने की कोशिश की, उसे गवाह के रूप में अदालत में पेश नहीं किया गया। साथ ही बिना पढ़े हलफनामे पर हस्ताक्षर करने का दावा भी विश्वसनीय नहीं माना गया।
कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में मतदाताओं को उम्मीदवार की आपराधिक पृष्ठभूमि जानने का मौलिक अधिकार है। यदि कोई उम्मीदवार इस तरह की जानकारी छिपाता है तो वह मतदाताओं के निर्णय को प्रभावित करता है। जन प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 की धारा 123 (2) के अनुसार इस तरह की कार्रवाई को मतदाताओं पर अनुचित प्रभाव डालना और भ्रष्ट आचरण माना जाता है।
अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि विजयपुर क्षेत्र आदिवासी बहुल क्षेत्र है, जहां पेड़ों को धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व दिया जाता है। ऐसे में 210 पेड़ों को काटने के मामले में हुई सजा की जानकारी छिपाना केवल एक तकनीकी गलती नहीं बल्कि स्थानीय मतदाताओं को प्रभावित करने वाला महत्वपूर्ण तथ्य था।
हालांकि फैसला सुनाने के बाद अदालत ने अपने आदेश के क्रियान्वयन पर 15 दिनों के लिए रोक लगा दी है। अदालत ने स्पष्ट किया कि यह रोक इसलिए दी गई है ताकि मुकेश मल्होत्रा सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी) दायर कर सकें और वहां से अंतरिम राहत प्राप्त करने का प्रयास कर सकें।
इस संबंध में वरिष्ठ अधिवक्ता विवेक तन्खा का कहना है कि मध्यप्रदेश के इतिहास में यह संभवतः पहला मामला है जब किसी विधायक का चुनाव निरस्त करते हुए दूसरे स्थान पर रहे उम्मीदवार को विजयी घोषित किया गया है। उन्होंने कहा कि विजयपुर के मामले में हलफनामे के शुरुआती तीन कॉलम में जानकारी दी गई थी, जबकि चौथे कॉलम में कुछ जानकारी दर्ज नहीं की गई थी। ऐसे में इतनी छोटी त्रुटि के आधार पर चुनाव शून्य घोषित करना कई कानूनी सवाल खड़े करता है।
विवेक तन्खा ने यह भी कहा कि हलफनामा किसी हारे हुए उम्मीदवार को स्वतः विजयी घोषित करने का आधार नहीं बन सकता। उन्होंने संकेत दिया कि इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की जाएगी।
वहीं रामनिवास रावत की ओर से पैरवी कर रहे अधिवक्ता व्हीके शर्मा ने कहा कि फैसले के खिलाफ यदि सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की जाती है तो उसके मद्देनजर सर्वोच्च न्यायालय में केविएट दाखिल किया जाएगा ताकि उनकी बात भी सुनी जा सके।
गौरतलब है कि नवंबर में हुए विजयपुर विधानसभा उपचुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी मुकेश मल्होत्रा ने भाजपा के रामनिवास रावत को 7,364 वोटों से हराया था। चुनाव परिणाम के अनुसार मल्होत्रा को 50.66 प्रतिशत वोट मिले थे, जबकि रामनिवास रावत को 46.95 प्रतिशत वोट प्राप्त हुए थे। अन्य प्रत्याशियों को कुल मिलाकर 2.39 प्रतिशत वोट मिले थे।
राजनीतिक दृष्टि से यह मामला भी महत्वपूर्ण है क्योंकि लोकसभा चुनाव 2024 के दौरान रामनिवास रावत कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल हो गए थे और इसके बाद हुए उपचुनाव में उन्होंने भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ा था।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला चुनावी पारदर्शिता और मतदाताओं के अधिकारों को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन सकता है। वहीं अब सबकी नजर इस बात पर है कि क्या मुकेश मल्होत्रा सुप्रीम कोर्ट में इस फैसले को चुनौती देते हैं और वहां से उन्हें राहत मिलती है या नहीं।
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