
नई दिल्ली- दलित शोषण मुक्ति मंच (DSMM) ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को एक पत्र लिखकर अनुरोध किया है कि वे सर्वोच्च न्यायालय में अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के बीच 'क्रीमी लेयर' (आर्थिक रूप से संपन्न वर्ग) को आरक्षण के लाभों से बाहर करने की मांग वाली याचिकाओं पर हस्तक्षेप करें।
पूर्व सांसद और DSMM की उपाध्यक्ष सुभाषिनी अली ने इस पत्र में कहा कि 12 फरवरी को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत मिश्रा की अध्यक्षता वाली सर्वोच्च न्यायालय की पीठ (जिसमें जस्टिस जॉयमाला बागची और जस्टिस एन.वी. अंजारिया शामिल थे) ने केंद्र सरकार से SC/ST में 'क्रीमी लेयर' की पहचान के लिए मानदंड प्रस्तुत करने को कहा है। पीठ ने केंद्र को जवाब दाखिल करने के लिए छह सप्ताह का समय दिया है।
यह सुनवाई ओ.पी. शुक्ला और उनके संगठन 'समता आंदोलन समिति' द्वारा दायर जनहित याचिका पर हो रही थी। DSMM ने बताया कि ऐसी कई अन्य याचिकाएं भी सर्वोच्च न्यायालय में लंबित हैं।
पत्र में उल्लेख किया गया है कि अगस्त 2024 के पंजाब राज्य बनाम देविंदर सिंह मामले में सात न्यायाधीशों की संविधान पीठ के बहुमत ने SC/ST के भीतर उप-वर्गीकरण की अनुमति देते हुए स्पष्ट किया था कि 'क्रीमी लेयर' का फॉर्मूला इन समुदायों पर लागू नहीं होगा। DSMM ने इस फैसले का स्वागत किया था, लेकिन साथ ही चेतावनी दी थी कि SC/ST पर 'क्रीमी लेयर' लागू करना सामाजिक न्याय की मूल अवधारणा को नकार देगा।
संगठन का तर्क है कि SC/ST समुदाय अभी भी भेदभाव, अपमान, हिंसा और अस्पृश्यता जैसी क्रूर प्रथाओं का शिकार हैं। इन समुदायों में आर्थिक समृद्धि नगण्य है और आरक्षण से लाभान्वित हुए छोटे वर्ग भी जाति के कारण असुरक्षित हैं। इसलिए, आर्थिक आधार पर उन्हें आरक्षण से वंचित करना अकल्पनीय है।
DSMM ने राष्ट्रपति से मांग की है कि:
वे सर्वोच्च न्यायालय से ऐसी सभी याचिकाओं को तुरंत खारिज करने का आग्रह करें।
केंद्र सरकार को निर्देश दें कि वह कोर्ट में हलफनामा दाखिल कर 'क्रीमी लेयर' के विरोध में रुख अपनाए।
न्यायालयों और सरकारों को नौकरियों व शिक्षा में आरक्षण के प्रभावी क्रियान्वयन पर ध्यान केंद्रित करने के लिए प्रेरित करें, ताकि संवैधानिक उद्देश्य पूरा हो और सामाजिक-आर्थिक न्यायपूर्ण समाज बने।
यह पत्र ऐसे समय आया है जब 2024 के फैसले के बाद SC/ST में 'क्रीमी लेयर' और उप-वर्गीकरण को लेकर बहस तेज है। दलित संगठनों में इस मुद्दे पर गहरी चिंता है कि इससे ऐतिहासिक रूप से उत्पीड़ित समुदायों के संरक्षण कमजोर हो सकते हैं।
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