
नई दिल्ली- सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत ने 29 जनवरी को दो अहम सुनवाइयों के दौरान की गई टिप्पणियों से वंचित और हाशिए पर पड़े समुदायों में गहरा आक्रोश पैदा किया है। पहला मामला घरेलू कामगारों के लिए न्यूनतम मजदूरी और कानूनी सुरक्षा की मांग वाली जनहित याचिका (PIL) से जुड़ा था, जिसे खारिज करते हुए CJI ने ट्रेड यूनियनों पर उद्योग विकास रोकने का आरोप लगाया।
दूसरा मामला यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (UGC) के 2026 के 'प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशंस रेगुलेशंस' पर था, जिसे स्टे देते हुए CJI ने इन नियमों को 'समाज को बांटने वाला' और 'पीछे ले जाने वाला' बताया, जिससे दलित, बहुजन और आदिवासी छात्रों के खिलाफ भेदभाव रोकने के प्रयासों पर सवाल उठे।
इन टिप्पणियों पर कैंपेन फॉर ज्यूडिशियल अकाउंटेबिलिटी एंड रिफॉर्म्स (CJAR) ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। CJAR ने एक बयान जारी कर CJI सूर्यकांत की इन टिप्पणियों को "अनुचित" (unconscionable) करार दिया है। संगठन का कहना है कि ये टिप्पणियां लोगों के काम करने के मौलिक अधिकार और समानता के अधिकार पर हमला हैं तथा सुप्रीम कोर्ट में विश्वास को कमजोर करती हैं। CJAR ने कहा कि उच्चतम न्यायालय के प्रमुख पद पर बैठे न्यायाधीश से संवैधानिक अनुशासन, विद्वता और संयम की अपेक्षा की जाती है, लेकिन ये बयान उससे विपरीत हैं।
एक PIL में घरेलू कामगारों के लिए व्यापक कानूनी ढांचा और न्यूनतम मजदूरी लागू करने की मांग की गई थी, जिसे CJI की बेंच ने खारिज कर दिया। CJI सूर्यकांत ने मौखिक टिप्पणियां कीं कि "ट्रेड यूनियनवाद देश में औद्योगिक विकास को रोकने के लिए बड़े पैमाने पर जिम्मेदार है", कई फैक्टरियां बंद हो गईं। उन्होंने कहा कि न्यूनतम मजदूरी तय करने से लोग नौकरी देने से इनकार कर सकते हैं, हर घर मुकदमेबाजी में फंस सकता है और अंत में कामगार ही नुकसान उठाएंगे। CJAR ने PUDR vs Union of India, 1982 केस का हवाला देते हुए, इसे तथ्यात्मक रूप से गलत और संरचनात्मक शोषण को नजरअंदाज करने वाला बताया। संगठन ने याद दिलाया कि न्यूनतम मजदूरी मजदूरों का मौलिक अधिकार है, और ट्रेड यूनियनों ने ही मजदूरों के लिए न्यूनतम मजदूरी और बेहतर काम की स्थितियां हासिल की हैं।
CJAR ने यह भी उल्लेख किया कि जनवरी 2025 में Ajay Malik vs State of Uttarakhand केस में CJI सूर्यकांत ने ही घरेलू कामगारों के शोषण पर संज्ञान लेते हुए सरकार को विशेषज्ञ समिति गठित करने का निर्देश दिया था, लेकिन अब ये टिप्पणियां उस फैसले से पूरी तरह पलटवार हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने UGC के 2026 के नए नियमों को स्टे कर दिया, जो उच्च शिक्षा संस्थानों में दलित, बहुजन और आदिवासी छात्रों के खिलाफ जातिगत भेदभाव रोकने के लिए थे। CJI सूर्यकांत ने कहा कि ये नियम "बहुत व्यापक" हैं, "समाज को बांटेंगे" और "जातिविहीन समाज" के लक्ष्य को पीछे ले जाएंगे। CJAR ने इसे संविधान के खिलाफ बताया, क्योंकि कानून को संवैधानिक मानकर चलना चाहिए जब तक स्पष्ट दोष न हो। संगठन ने कहा कि ये स्टे काल्पनिक परिदृश्यों पर आधारित है। CJI की टिप्पणियां दलित-बहुजन छात्रों के दुरुपयोग की आशंका जताती हैं, जबकि जातिगत हिंसा के शिकार छात्रों के प्रति कोई सहानुभूति नहीं दिखाई गई।
CJAR ने कहा कि ये टिप्पणियां जाति आधारित भेदभाव से पीड़ितों के लिए विशेष सुरक्षा की संवैधानिक प्रतिबद्धता को कमजोर करती हैं। जातिविहीन समाज ऐसे बयानों से नहीं बल्कि तभी बनेगा जब पीड़ितों को प्रभावी उपाय मिलें।
CJAR ने CJI सूर्यकांत से अपील की है कि वे अदालती कार्यवाही में संयम बरतें, न्यायिक आचरण के मानकों का पालन करें और गरीब-वंचितों को हतोत्साहित करने वाली टिप्पणियां न करें। संगठन ने कहा कि ये बयान व्यक्तिगत पूर्वाग्रह दर्शाते हैं और न्यायपालिका की सामाजिक-आर्थिक न्याय की भूमिका को कमजोर करते हैं।
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