
नई दिल्ली: भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) जस्टिस सूर्यकांत ने रविवार को एक अहम बयान देते हुए कहा कि न्यायपालिका में महिलाओं की अधिक भागीदारी कोई पसंद या प्राथमिकता का विषय नहीं है, बल्कि यह कानूनी पेशे में समान अवसर और निष्पक्ष शुरुआत सुनिश्चित करने के बारे में है।
नई दिल्ली स्थित सुप्रीम कोर्ट के एडिशनल बिल्डिंग कॉम्प्लेक्स ऑडिटोरियम में 'इंडियन वुमेन इन लॉ' (iWiL) द्वारा आयोजित "ब्रिजिंग द बेंच गैप: वुमेन एंड ज्यूडिशियल लीडरशिप" नामक राष्ट्रीय सम्मेलन को संबोधित करते हुए उन्होंने यह बात कही। जस्टिस कांत ने जोर देकर कहा कि न्याय प्रणाली को देश की लगभग 65 करोड़ माताओं, बहनों और बेटियों के मन में विश्वास जगाना चाहिए। उन्होंने कहा कि जब भारत की आधी आबादी अपने संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करने वाले संस्थानों की ओर देखती है और वहां उसे अपना अनुभव और प्रतिनिधित्व सीमित मिलता है, तो यह चिंता केवल आंकड़ों तक सीमित नहीं रह जाती।
हर न्यायाधीश के लिए संविधान, शपथ और पद एक समान होते हैं, इस बात का जिक्र करते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि जो चीज बदलाव लाती है, वह है नया अनुभव जो न्यायिक दृष्टिकोण को दिशा देता है। अक्सर महिलाएं अपने साथ ऐसे विशिष्ट दृष्टिकोण लेकर आती हैं, जो इस बात से आकार लेते हैं कि घर, कार्यस्थल और रोजमर्रा की जिंदगी की वास्तविकताओं में कानून किस तरह काम करता है।
जस्टिस कांत ने उच्च न्यायालयों के कॉलेजियम से प्रतिनिधित्व सुधारने के लिए ठोस कदम उठाने का भी आह्वान किया। उनका मानना है कि अब केवल संस्थागत इरादा ही काफी नहीं है, बल्कि इसके साथ संस्थागत कल्पनाशीलता का होना भी जरूरी है। सीजेआई ने सुझाव दिया कि यदि किसी विशिष्ट आयु वर्ग में उपयुक्त उम्मीदवार आसानी से उपलब्ध नहीं हैं, तो कॉलेजियम को अपने विचार के दायरे को बढ़ाना चाहिए और सुप्रीम कोर्ट में प्रैक्टिस कर रही उन महिला वकीलों को शामिल करना चाहिए जो संबंधित राज्य से ताल्लुक रखती हैं।
इसके साथ ही उन्होंने कानूनी पेशे में महिलाओं की 'पाइपलाइन' को मजबूत करने के उद्देश्य से किए गए संस्थागत उपायों की ओर भी इशारा किया, जिसमें राज्य बार काउंसिल में महिलाओं के लिए कम से कम 30 प्रतिशत सीटें आरक्षित करने का निर्देश शामिल है। उनका कहना था कि यदि स्रोत पर ही पाइपलाइन संकरी होगी, तो बाद में बेंच को व्यापक नहीं बनाया जा सकता।
इसी सम्मेलन की एक पैनल चर्चा के दौरान जस्टिस बी. वी. नागरत्ना ने एक अलग चुनौती की ओर ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने कहा कि मुख्य समस्या महिलाओं का इस पेशे में प्रवेश करना नहीं है, बल्कि पदोन्नति के स्तर तक पहुंचने के लिए उनका लंबे समय तक मुकदमेबाजी (लिटिगेशन) में टिके रहना है। जब महिलाएं एक, दो या तीन दशक तक इस पेशे में अपनी निरंतरता बनाए नहीं रख पाती हैं, तो स्वाभाविक रूप से बार से बेंच तक पहुंचने का स्रोत कम हो जाता है।
उन्होंने इस गिरावट का कारण पेशे के भीतर और बाहर मौजूद संरचनात्मक बाधाओं को बताया, जो केवल पुरुष सदस्यों की तरफ से ही नहीं, बल्कि कभी-कभी बेंच की ओर से भी आ सकती हैं।
सम्मेलन में मौजूद कई अन्य वक्ताओं की तरह जस्टिस उज्जल भुइयां ने भी इस बात पर सहमति जताई कि जब चयन प्रक्रिया वस्तुनिष्ठ होती है, तो महिलाएं बड़ी संख्या में इस पेशे में आती हैं। उन्होंने कहा कि न्यायपालिका की संरचना इस बात को काफी हद तक प्रभावित करती है कि न्याय को किस नजरिए से देखा जाता है।
वहीं, सुप्रीम कोर्ट की पूर्व न्यायाधीश जस्टिस हिमा कोहली ने एक चिंताजनक तथ्य साझा करते हुए कहा कि साल 2021 के बाद से किसी भी महिला न्यायाधीश को सुप्रीम कोर्ट में पदोन्नत नहीं किया गया है। उन्होंने अपनी बात रखते हुए कहा कि जब उन्हें, जस्टिस नागरत्ना और जस्टिस बेला एम. त्रिवेदी को सुप्रीम कोर्ट का न्यायाधीश बनाया गया था, तब कॉलेजियम में कुछ सही लोग मौजूद थे। इसके बाद लगभग 34 नियुक्तियां हुईं, लेकिन उनमें एक भी महिला शामिल नहीं थी। उन्होंने सवाल उठाया कि ऐसा करके हम महिलाओं की विश्वसनीयता के बारे में आखिर क्या संदेश दे रहे हैं।
इस मुद्दे पर जस्टिस पी. एस. नरसिम्हा का मानना था कि समस्या प्रतिभा की उपलब्धता में नहीं है, बल्कि इस बात में है कि संस्थान उसे किस तरह पहचानते और महत्व देते हैं।
इस महत्वपूर्ण सम्मेलन में सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस एन. कोटिस्वर सिंह और जस्टिस दीपांकर दत्ता के साथ-साथ कई उच्च न्यायालयों की महिला न्यायाधीशों ने भी हिस्सा लिया। इनमें सिक्किम उच्च न्यायालय की कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश जस्टिस मीनाक्षी मदन राय और मेघालय उच्च न्यायालय की मुख्य न्यायाधीश जस्टिस रेवती मोहिते डेरे प्रमुख रूप से उपस्थित रहीं।
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