
नई दिल्ली- केंद्रीय सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता राज्य मंत्री, राज्यसभा सांसद और रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया (अठावले) के अध्यक्ष रामदास अठावले ने एक महत्वपूर्ण बयान दिया है। x पर किए एक पोस्ट में उन्होंने कहा कि जिस तरह अयोध्या में भव्य राम मंदिर के निर्माण का पूरे देश ने खुले दिल से स्वागत किया, क्योंकि यह करोड़ों हिंदुओं की आस्था से जुड़ा था, उसी तरह बोधगया के महाबोधि महाविहार का प्रबंधन पूरी तरह बौद्ध समाज को सौंपने की मांग का भी स्वागत होना चाहिए।
अठावले ने कहा कि अयोध्या में भगवान राम के भव्य मंदिर का निर्माण भारत के करोड़ों लोगों की आस्था और विश्वास से जुड़ा विषय था। जब यह सपना साकार हुआ, तब पूरे देश ने उसका स्वागत किया। अलग-अलग विचारधाराओं और धर्मों के लोगों ने भी इसे सकारात्मक दृष्टि से स्वीकार किया, क्योंकि यह करोड़ों हिंदुओं की आस्था और पहचान से जुड़ा प्रश्न था। यह भारत की लोकतांत्रिक परंपरा और धार्मिक सह-अस्तित्व की भावना का प्रतीक भी बना।
अठावले ने तर्क दिया कि उसी प्रकार बिहार के बोधगया स्थित महाबोधि महाविहार पूरी दुनिया के बौद्ध अनुयायियों के लिए सबसे पवित्र तीर्थस्थल है। यहीं भगवान बुद्ध को ज्ञान की प्राप्ति हुई और यहीं से शांति, करुणा और समता का संदेश पूरी दुनिया में फैला। इसलिए यह स्वाभाविक है कि इस पवित्र स्थल के प्रबंधन में बौद्ध समाज की निर्णायक भूमिका हो। यदि राम मंदिर के निर्माण को हिंदू समाज की आस्था के सम्मान के रूप में स्वीकार किया गया, तो महाबोधि महाविहार का प्रबंधन बौद्धों के हाथों में देने की मांग भी उसी सम्मान और समानता की भावना से देखी जानी चाहिए।
"वर्तमान में बोधगया मंदिर अधिनियम 1949 के तहत महाबोधि महाविहार के संचालन के लिए एक प्रबंधन समिति बनाई गई है, जिसमें हिंदू और बौद्ध दोनों समुदायों की भागीदारी का प्रावधान है और जिला अधिकारी (DM) को अध्यक्ष बनाया जाता है। समय के साथ यह बहस तेज हुई है कि दुनिया के सबसे पवित्र बौद्ध स्थल के प्रबंधन में बौद्धों की निर्णायक भूमिका होनी चाहिए। जब अन्य धर्मों के प्रमुख धार्मिक स्थलों का संचालन उनके अपने समुदायों के हाथों में होता है जैसे सिखों के लिए गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी या मुसलमानों के लिए वक्फ बोर्ड तो महाबोधि महाविहार के मामले में भी समान सिद्धांत लागू होने चाहिए।"
अठावले ने कहा कि इस विषय का एक महत्वपूर्ण पहलू संवैधानिक अधिकारों से भी जुड़ा है। भारत का संविधान अनुच्छेद 25 और अनुच्छेद 26 के तहत प्रत्येक धर्म को अपनी आस्था का पालन करने और अपने धार्मिक संस्थानों का प्रबंधन करने की स्वतंत्रता देता है। अनुच्छेद 25 नागरिकों को धर्म की स्वतंत्रता प्रदान करता है, जबकि अनुच्छेद 26 धार्मिक संप्रदायों को अपने धार्मिक मामलों का संचालन और संस्थाओं का प्रबंधन करने का अधिकार देता है। ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि जब महाबोधि महाविहार बौद्ध धर्म का सबसे महत्वपूर्ण स्थल है, तो उसके प्रबंधन में बौद्ध समाज को पूर्ण अधिकार क्यों नहीं दिया जाना चाहिए।
केन्द्रीय राज्य मंत्री ने कहा , " आज आवश्यकता इस बात की है कि इस मुद्दे को किसी विवाद या टकराव के रूप में नहीं, बल्कि संवैधानिक समानता और धार्मिक सम्मान के दृष्टिकोण से देखा जाए। जिस प्रकार देश ने राम मंदिर के निर्माण को सकारात्मक रूप से स्वीकार किया, उसी प्रकार यदि महाबोधि महाविहार का प्रबंधन बौद्ध समाज को सौंपा जाता है, तो उसका भी स्वागत होना चाहिए। यह कदम न केवल बौद्ध समाज के विश्वास को मजबूत करेगा, बल्कि भारत की धार्मिक स्वतंत्रता और समावेशी लोकतांत्रिक परंपरा को भी और सशक्त बनाएगा। भारत की असली ताकत उसकी विविधता और परस्पर सम्मान में है। जब हम एक-दूसरे की आस्था और अधिकारों का सम्मान करते हैं, तभी संविधान की भावना मजबूत होती है। इसलिए महाबोधि महाविहार के प्रश्न का समाधान भी उसी संवैधानिक भावना समान अधिकार, धार्मिक स्वतंत्रता और न्याय के आधार पर होना चाहिए।"
इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट में बोधगया मंदिर अधिनियम 1949 की वैधता को चुनौती देने वाली याचिका पर अंतिम सुनवाई 28 अप्रैल को निर्धारित है। अठावले की यह टिप्पणी बौद्ध समुदाय की लंबे समय से चली आ रही मांग को और बल देती है।
आपको बता दें, महाबोधि मुक्ति आंदोलन 12 फरवरी 2025 से तेज हुई थी, जब बौद्ध भिक्षुओं और अनुयायियों ने बोधगया स्थित महाबोधि महाविहार मंदिर को गैर-बौद्धों के नियंत्रण से मुक्त करने की मांग को लेकर आमरण अनशन शुरू किया। उनकी मांग है कि मंदिर का प्रबंधन पूरी तरह से बौद्ध समुदाय को सौंपा जाए और 1949 के बोधगया टेंपल एक्ट को रद्द किया जाए।
द मूकनायक की प्रीमियम और चुनिंदा खबरें अब द मूकनायक के न्यूज़ एप्प पर पढ़ें। Google Play Store से न्यूज़ एप्प इंस्टाल करने के लिए यहां क्लिक करें.