नई दिल्ली: मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार की मुश्किलें जल्द ही बढ़ सकती हैं। करीब दो दशक पुराने मलेशियाई इंजीनियर के सुसाइड केस ने एक बार फिर तूल पकड़ लिया है। केरल सरकार को इस मामले में ज्ञानेश कुमार के खिलाफ आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोप में कानूनी कार्रवाई आगे बढ़ाने की हरी झंडी मिल गई है।
अभियोजन महानिदेशक (डायरेक्टर जनरल ऑफ प्रॉसिक्यूशन) टी. आसफ अली ने राज्य सरकार को अपनी कानूनी सलाह सौंप दी है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि ज्ञानेश कुमार के खिलाफ कानूनी प्रक्रिया शुरू करने में कोई बाधा नहीं है। इस कथित अपराध के साबित होने पर अधिकतम दस साल तक की सजा का प्रावधान है।
यह पूरा मामला मलेशियाई नागरिक ली सी बीन की आत्महत्या से जुड़ा है। बीन विश्व बैंक द्वारा वित्त पोषित केरल राज्य परिवहन परियोजना (केएसटीपी) के तहत एम.सी. रोड के पुनर्निर्माण कार्य में पूर्व मुख्य परियोजना अधिकारी थे। इस 127 किलोमीटर लंबे प्रोजेक्ट का जिम्मा मलेशिया की पैटी और कोच्चि की भगीरथ कंस्ट्रक्शन्स के संयुक्त उद्यम पैटी-बेल को सौंपा गया था।
कानूनी नोट के अनुसार, ज्ञानेश कुमार द्वारा किए गए कथित उत्पीड़न के कारण ली सी बीन अत्यधिक मानसिक तनाव से गुजर रहे थे। इसी भारी दबाव में आकर उन्होंने अपनी जान दे दी। यह बात मृतक द्वारा छोड़े गए सुसाइड नोट से भी पूरी तरह स्पष्ट होती है।
केरल से लौटने के बाद बीन ने कुआलालंपुर में आत्महत्या कर ली थी। मौत को गले लगाने से पहले उन्होंने दो सुसाइड नोट छोड़े थे, जिनमें से एक पैटी के निदेशक और दूसरा उनकी पत्नी के नाम था।
इस सड़क निर्माण प्रोजेक्ट की कुल लागत 215 करोड़ रुपये तय की गई थी। लेकिन, फंड जारी होने और बिलों के भुगतान में लगातार हो रही देरी ने कंस्ट्रक्शन कंपनी को गहरे आर्थिक संकट में धकेल दिया था। इसी परेशानी ने बीन को खौफनाक कदम उठाने पर मजबूर कर दिया।
मृतक ने भुगतान में अड़चन डालने और प्रताड़ना के लिए लोक निर्माण विभाग (पीडब्ल्यूडी) और सरकारी अधिकारियों को जिम्मेदार ठहराया था। उस समय की तत्कालीन राज्य सरकार ने ज्ञानेश कुमार के खिलाफ जांच के आदेश भी दिए थे, जो उस वक़्त पीडब्ल्यूडी सचिव के पद पर कार्यरत थे।
अली ने अपनी राय में दर्ज किया है कि परिस्थितियों और तथ्यों की गहन जांच से यह साफ होता है कि आत्महत्या का मुख्य कारण ज्ञानेश कुमार द्वारा किया गया उत्पीड़न ही था। भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 306 के तहत यह एक गंभीर दंडनीय अपराध है, जो एक विस्तृत जांच की मांग करता है।
कानूनी राय में यह भी कहा गया है कि एक वरिष्ठ नौकरशाह होने के नाते ज्ञानेश कुमार ने कानून की गिरफ्त से बचने के लिए अपने अधिकारों और रसूख का भरपूर इस्तेमाल किया। हालांकि, कानूनी जानकारों का मानना है कि मामले में देरी होने के बावजूद कानूनी प्रक्रिया बाधित नहीं होती है और आरोपी को अब भी जवाबदेह ठहराया जा सकता है।
उन पर यह भी गंभीर आरोप है कि लोक निर्माण सचिव रहते हुए उन्होंने अपने चहेते ठेकेदारों को नियमों को ताक पर रखकर काम बांटे। इससे सरकारी खजाने को भारी नुकसान हुआ और उन्होंने खुद को आर्थिक तौर पर समृद्ध किया। कानूनी सलाह में सुझाव दिया गया है कि अगर उपलब्ध सबूत इन आरोपों की पुष्टि करते हैं, तो बंद हो चुकी जांच को दोबारा खोलकर दोषियों को हर हाल में सजा मिलनी चाहिए।
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