बस्तर में उम्मीदों का नया सवेरा: 15 साल से जहां था सुरक्षा बलों का पहरा, वह कैंप अब बना आदिवासी छात्रों का हॉस्टल

नारायणपुर के भटपाल में बदलाव की नई कहानी. 15 साल तक जहां सुरक्षा बलों का कड़ा पहरा था, वहां अब आदिवासी बच्चे अपना सुनहरा भविष्य संवार रहे हैं।
Bastar tribal hostel, security camp converted to school
छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित बस्तर में 15 साल पुराने सुरक्षा कैंप को आदिवासी लड़कों के हॉस्टल में बदला गया है।Pic- The Hindu
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छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित बस्तर इलाके में अब बदलाव की बयार बहने लगी है। नारायणपुर जिले के सुदूर इलाके भटपाल में एक समय जहां जवानों का कड़ा पहरा हुआ करता था, वहां अब आदिवासी बच्चों का भविष्य संवर रहा है। दशकों से उग्रवाद का दंश झेल रहे इस इलाके में स्थिति सुधरने के बाद, पिछले 15 सालों से मौजूद एक सुरक्षा कैंप को अब 150 से अधिक आदिवासी छात्रों के लिए आवासीय परिसर में तब्दील कर दिया गया है।

नारायणपुर की कलेक्टर नम्रता जैन के अनुसार, बस्तर संभाग में अपनी तरह की यह पहली और अनूठी पहल है, जहां किसी पूर्व सुरक्षा शिविर को शैक्षिक और छात्रावास के उद्देश्यों के लिए बदला गया है। उन्होंने कहा कि यह बदलाव सुरक्षा-केंद्रित बुनियादी ढांचे से हटकर बच्चों की शिक्षा और उनके सुनहरे भविष्य की ओर बढ़ते सरकारी कदमों को दर्शाता है।

केंद्र सरकार द्वारा भारत को उग्रवाद से मुक्त घोषित किए जाने के कुछ ही महीनों बाद, इसी साल 11 अगस्त से यह नया परिसर एक छात्रावास के रूप में काम कर रहा है। जिला प्रशासन के बयान के अनुसार, इस पूरे परिसर को दो अलग-अलग हिस्सों में बांटा गया है। पहला हिस्सा प्री-मैट्रिक अनुसूचित जनजाति के लड़कों (कक्षा 6 से 10 तक) के लिए है। इस हॉस्टल की स्वीकृत क्षमता 100 छात्रों की है, लेकिन वर्तमान में यहां 114 छात्र रहकर अपनी पढ़ाई कर रहे हैं।

परिसर का दूसरा हिस्सा पोस्ट-मैट्रिक छात्रों के लिए तैयार किया गया है। कक्षा 11 और 12 के छात्रों के लिए बने इस पोस्ट-मैट्रिक अनुसूचित जनजाति बालक छात्रावास की क्षमता 50 छात्रों की है, जिसमें फिलहाल 39 छात्र रह रहे हैं। यह पूरी व्यवस्था मुख्य रूप से एजुकेशन सिटी, कुतुल में पढ़ने वाले छात्रों की आवासीय जरूरतों को पूरा कर रही है।

इस हॉस्टल ने दूर-दराज के गांवों से आने वाले छात्रों की सबसे बड़ी परेशानी को हमेशा के लिए हल कर दिया है। लगभग 22 किलोमीटर दूर स्थित राजबेड़ा गांव से आने वाले 12वीं कक्षा के छात्र कोमेंद्र बताते हैं कि इस नए पोस्ट-मैट्रिक हॉस्टल के खुलने से उन्हें बहुत बड़ी राहत मिली है। पहले उन्हें स्कूल परिसर के बाहर रहना पड़ता था, जिससे उन पर रहने का अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ता था। अब इस हॉस्टल ने उन्हें स्कूल के बिल्कुल करीब ही एक सुरक्षित और किफायती जगह दे दी है।

कलेक्टर नम्रता जैन बताती हैं कि इस पहल का मुख्य उद्देश्य कोमेंद्र जैसे उन लड़कों के लिए स्कूल के पास सुरक्षित आवास की व्यवस्था करना था, जो दुर्गम और दूरस्थ क्षेत्रों से शिक्षा हासिल करने आते हैं।

यह बदलाव उन इलाकों की नई विकास प्राथमिकताओं को स्पष्ट रूप से दर्शाता है, जिन्होंने दशकों तक सुरक्षा, कनेक्टिविटी और बुनियादी सेवाओं के अभाव जैसी गंभीर चुनौतियों का सामना किया है। जैसे-जैसे यह क्षेत्र शांति और विकास के एक नए चरण की ओर कदम बढ़ा रहा है, यहां के मौजूदा ढांचे का उपयोग अब शिक्षा, सामाजिक विकास और स्थानीय समुदायों के लिए नए अवसर पैदा करने में किया जा रहा है।

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