अनधिकृत व्यक्ति द्वारा किए समझौते पर क्या आरोपी हो सकता है बरी? 37 साल पुराने मामले में Rajasthan High Court का फैसला

अदालत ने यह भी माना कि तकनीकी रूप से ट्रायल कोर्ट का आदेश कानून के अनुरूप नहीं था, लेकिन मामले की लंबी अवधि को देखते हुए इसे दोबारा खोलना उचित नहीं समझा।
हाईकोर्ट ने कहा, "इतने लंबे समय के बाद पूरे मामले को दोबारा खोलना और नए सिरे से ट्रायल शुरू करना न्याय के हितों की पूर्ति नहीं करेगा। यह एक बासी विवाद को पुनर्जीवित करने और पक्षों को अनावश्यक कठिनाई में डालने जैसा होगा।"
हाईकोर्ट ने कहा, "इतने लंबे समय के बाद पूरे मामले को दोबारा खोलना और नए सिरे से ट्रायल शुरू करना न्याय के हितों की पूर्ति नहीं करेगा। यह एक बासी विवाद को पुनर्जीवित करने और पक्षों को अनावश्यक कठिनाई में डालने जैसा होगा।"फोटो इन्टरनेट
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जोधपुर-  राजस्थान हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में 37 साल पुराने आपराधिक मामले में आरोपी को राहत प्रदान करते हुए कहा कि इतने लंबे समय के बाद मामले को दोबारा खोलना न्याय के हित में नहीं होगा। अदालत ने यह फैसला तब दिया जब राज्य सरकार ने याचिका दायर कर कहा कि ट्रायल कोर्ट में समझौता किसी अनधिकृत व्यक्ति ने किया था।

दरअसल, यह मामला बाड़मेर जिले के रावतसर गांव का है, जहां 1989 में मूलाराम नामक व्यक्ति पर भुराराम की बकरियों को मारने का आरोप लगा था। इस मामले में प्राथमिकी रामाराम ने दर्ज कराई थी। साल 1990 में न्यायिक मजिस्ट्रेट, बाड़मेर ने रामाराम और आरोपी के बीच हुए समझौते के आधार पर मूलाराम को IPC की धारा 429 के तहत आरोपों से बरी कर दिया था।

राज्य सरकार ने हाईकोर्ट में इस आदेश को चुनौती देते हुए तर्क दिया कि समझौता करने वाला रामाराम बकरियों का मालिक नहीं था, बल्कि असली मालिक भुराराम था। सरकार का कहना था कि CrPC की धारा 320 के तहत किसी अपराध को कंपाउंड कराने का अधिकार प्राथमिकी दर्ज कराने वाले को नहीं बल्कि सिर्फ संपत्ति के मालिक को है।

हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की इस दलील से सहमति जताते हुए कहा कि रामाराम कानूनी रूप से समझौता करने के लिए सक्षम व्यक्ति नहीं थे। जस्टिस फरजंद अली ने अपने आदेश में कहा, "सीआरपीसी की धारा 320 के तहत, संपत्ति का मालिक ही समझौता करने का हकदार था, जो कि इस मामले में भुराराम थे। रामाराम के पास ऐसा कोई अधिकार नहीं था और न ही वे कानून की नजर में समझौता करने के लिए सक्षम व्यक्ति थे।"

हालांकि अदालत ने यह भी माना कि तकनीकी रूप से ट्रायल कोर्ट का आदेश कानून के अनुरूप नहीं था, लेकिन मामले की लंबी अवधि को देखते हुए इसे दोबारा खोलना उचित नहीं समझा। कोर्ट ने कहा कि यह घटना 1989 की है और अब 37 साल बीत चुके हैं।

अदालत ने अपने आदेश में कहा, "इतने लंबे समय के बाद पूरे मामले को दोबारा खोलना और नए सिरे से ट्रायल शुरू करना न्याय के हितों की पूर्ति नहीं करेगा। यह एक बासी विवाद को पुनर्जीवित करने और पक्षों को अनावश्यक कठिनाई में डालने जैसा होगा।"

कोर्ट ने अपनी अंतर्निहित शक्तियों (inherent powers) का इस्तेमाल करते हुए कहा, "न्याय के उद्देश्यों को सुरक्षित करने और अदालती प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोकने के लिए हाईकोर्ट को व्यापक अधिकार हैं। इस विशेष परिस्थिति में, पूरे मामले को शांत कर देना ही न्यायसंगत है।" नतीजतन, हाईकोर्ट ने आरोपी मूलाराम के खिलाफ सभी कार्यवाही को रद्द कर दिया और अपील का निपटारा कर दिया।

आरोपी को सरेंडर करने की जरूरत नहीं है और यदि जमानत बांड दिए गए थे तो उन्हें रद्द किया जाए। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि आरोपी को सरेंडर करने की आवश्यकता नहीं है और उसके जमानत बांड रद्द किए जाएं। अदालत ने मामले की पूरी फाइल वापस भेजने के भी निर्देश दिए।

हाईकोर्ट ने कहा, "इतने लंबे समय के बाद पूरे मामले को दोबारा खोलना और नए सिरे से ट्रायल शुरू करना न्याय के हितों की पूर्ति नहीं करेगा। यह एक बासी विवाद को पुनर्जीवित करने और पक्षों को अनावश्यक कठिनाई में डालने जैसा होगा।"
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हाईकोर्ट ने कहा, "इतने लंबे समय के बाद पूरे मामले को दोबारा खोलना और नए सिरे से ट्रायल शुरू करना न्याय के हितों की पूर्ति नहीं करेगा। यह एक बासी विवाद को पुनर्जीवित करने और पक्षों को अनावश्यक कठिनाई में डालने जैसा होगा।"
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