
गिर सोमनाथ- गुजरात के गिर सोमनाथ जिले की वेरावल विशेष अदालत (SC/ST अत्याचार निवारण) ने 2016 के चर्चित ऊना दलित फ्लॉगिंग मामले में 17 मार्च को फैसला सुनाया। इससे एक दिन पहले अदालत ने इस मामले में पांच आरोपियों को दोषी ठहराया था, जबकि अन्य को बरी कर दिया गया था। एक पुलिसकर्मी की मौत के चलते उसके खिलाफ मामला समाप्त हो गया, जबकि एक नाबालिग के खिलाफ सुनवाई अभी भी लंबित है।
कुल 42 आरोपियों में से 5 को दोषी ठहराया गया, जबकि 37 को बरी कर दिया गया। दोषियों को प्रत्येक को 5 वर्ष की सश्रम कारावास की सजा के साथ ₹5,000 का जुर्माना लगाया गया। यह सजा आईपीसी की धाराओं 323, 324, 342, 504 तथा अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम की धाराओं के तहत दी गई।
अदालत के फैसले के बाद पीड़ित और शिकायतकर्ता वशराम सरवैया ने इस निर्णय को "दुखद" बताया और कहा: "हम इसे हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक चुनौती देंगे।" वडगाम के विधायक जिग्नेश मेवानी ने भी अदालत के निर्णय पर दुःख जाहिर किया और बोले कि पीड़ितों को ना तो सरकार से खेती की जमीन औरनौकरी मिली ना ही अदालत से न्याय।
ज़िला सरकारी वकील केतनसिंह वाला ने बताया कि अदालत ने पाँचों लोगों को भारतीय दंड संहिता की धारा 323 (साधारण चोट पहुँचाना), 324 (खतरनाक हथियारों से जान-बूझकर चोट पहुँचाना), 342 (गलत तरीके से कैद करना) और 504 (जान-बूझकर अपमान करना) के तहत दोषी ठहराया है। उन्हें अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम की धारा 3(1)(D) और 3(1)(E)(R)(S)(U) के तहत भी दोषी करार दिया गया।
हालाँकि, अदालत ने उन्हें IPC के उन प्रावधानों के तहत दोषी नहीं पाया जो हत्या के प्रयास (धारा 307), लूट (धारा 397), अपहरण (धारा 365), दंगा (धारा 147), किसी व्यक्ति का अपमान करने के इरादे से हमला (धारा 355) और आपराधिक साज़िश (धारा 120-B) से संबंधित हैं। अदालत ने सुनवाई के दौरान 260 गवाहों की जाँच की थी।
बचाव पक्ष के वकील विजय कुमार ने कहा कि इन पाँचों दोषियों में से चार पहले ही जेल में छह साल से अधिक समय बिता चुके हैं, जबकि एक अन्य पिछले चार साल और दो महीने से जेल में है, और उसे शेष जेल अवधि पूरी करनी होगी।
11 जुलाई 2016 को ऊना तालुका के मोटा समढियाला गांव में सरवैया परिवार के चार दलित युवकों को कथित गौ-रक्षकों ने गोकशी के आरोप में सरेआम पीटा था। युवक मृत गाय की खाल उतार रहे थे, जो उनका पारंपरिक चर्मकारी काम था लेकिन आरोपियों ने उन्हें गाय मारने का झूठा आरोप लगाया। पीड़ितों को लाठी-डंडों से मारा गया, कार से बांधा गया और गांव में घुमाया गया।
स्थानीय लोगों ने पीड़ितों को बचाने के लिए बीच-बचाव करने की कोशिश की, लेकिन हमलावरों ने उन्हें धमकाया। बाद में उन्होंने मदद के लिए गांधीनगर और अहमदाबाद में पुलिस कंट्रोल रूम से संपर्क किया। पिटाई के वीडियो क्लिप बाद में सोशल मीडिया पर तेज़ी से फैल गए, जिससे पूरे देश में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए और गौरक्षकों के समूहों की गतिविधियों को लेकर लोगों में भारी गुस्सा भड़क उठा। दलित अत्याचार और जातिगत हिंसा के खिलाफ भारी विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए थे। इस घटना ने सामाजिक न्याय और गौ-रक्षा के नाम पर हो रहे अत्याचारों को राष्ट्रीय मुद्दा बना दिया था। मायावती ने इस मुद्दे पर संसद चलने नही दी थी,
आरोपियों पर हमले का वीडियो कथित तौर पर रिकॉर्ड करने और उसे फैलाने के आरोप में सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 66A और 66B के तहत भी मामला दर्ज किया गया। मामले में शुरू में 42 लोगों पर मुकदमा दर्ज किया गया था। 10 वर्ष की लंबी सुनवाई के दौरान विशेष अदालत ने साक्ष्यों के आधार पर फैसला लिया। दोषी ठहराए गए पांच आरोपियों के नाम हैं: रमेश जादव, राकेश जोशी, नागजी वानिया, प्रमोदगिरी गोस्वामी और बलवंतगिरी गोस्वामी। एक पुलिसकर्मी की मृत्यु के कारण उसका मामला समाप्त हो गया था। अदालत ने हत्या के प्रयास, डकैती और अन्य गंभीर आरोपों में अधिकांश आरोपियों को बरी कर दिया।
फैसले पर गहरी निराशा जाहिर करते हुए वडगाम के विधायक जिग्नेश मेवानी ने कहा कि "घटना के बाद विपक्ष के बड़े बड़े नेता ऊना पहुंचे थे और पीड़ितों के साथ सरोकार जताया था. मैं खुद भी अपनी टीम के साथ 400 किलोमीटर की एतिहासिक यात्रा करके ऊना गये थे लेकिन अदालत के इस फैसले से हम बहुत निराश हैं। 37 लोग जो आरोपी थे, उन्हें बाईज्जत बरी कर दिया गया। अगर गुजरात सरकार वाकई इन आरोपियों को सजा दिलाना चाहती है तो सरकार को बेस्ट लॉयर्स लगाकर सेशन कोर्ट के इस फैसले की आगे अपील करनी चाहिए। यदि सरकार ऐसा नहीं करती तो यह माना जाएगा कि भाजपा सरकार दलित विरोधी है।" विधायक ने आगे यह भी कहा कि घटना के वक्त आनंदीबेन गुजरात की मुख्यमंत्री थी जिन्होंने पीड़ितों को खेती की जमीन आवंटित करने और सरकारी नौकरी देने का आश्वासन दिया था लेकिन दस साल बाद ना तो पीड़ितों को जमीन मिली, ना नौकरी और ना ही न्याय ही मिला।"
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